व्यापार
जियो: भारतीय व्यवसायी द्वारा अब तक की सबसे बड़ी बाजी

प्रसंग
  • जियो का सबसे बड़ा असर अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वियों के राजस्व और मुनाफे पडा है: 2018-19 की पहली तिमाही में एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया, तीनों ने राजस्व और मुनाफे में गिरावट दर्ज की।

रिलायंस जियो के लॉन्च के दो साल से भी कम समय में मुकेश अंबानी ने अब तक की सबसे बड़ी बोली लगाई है, जिसके भुगतान के लिए कोई भी निजी भारतीय व्यावसायी शायद ही तैयार हो। सितंबर 2016 में जब उन्होंने बहुत सस्ती (कड़ी प्रतिस्पर्धी) दरों पर अपनी मोबाइल ब्रॉडबैंड सेवाओं की शुरुआत की तो ऐसा लगा था कि उन्होंने एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया सेल्युलर जैसी अग्रणी कंपनियों का अधिग्रहण करने के लिए बोली लगाई थी।

जोखिम बड़ा है,  27 जुलाई को घोषित रिलायंस इंडस्ट्रीज के क्यू 1 के नतीजों से पता चला है कि प्रति उपयोगकर्ता औसत राजस्व (एआरपीयू, जो पहले करीब 154 रुपये था) में तेज गिरावट (अब 134 रुपये है) के बावजूद जियो 612 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहा है। मूल्य में कमी करने के बावजूद जियो बडी मात्रा में बढ़ोत्तरी से अधिक लाभ कमा लेता है।

जून के अंत में, जियो ने 215 मिलियन  ग्राहक बनाए, जिसने 344 मिलियन ग्राहकों के साथ भारती एयरटेल और 222 मिलियन ग्राहकों के साथ वोडाफोन के बाद इसे नंबर 3 पर पहुँचा दिया है। जबकि वोडाफोन-आइडिया विलय एक बार फिर रैंकिंग को बदल देगा, जियो अब नंबर 3 की मजबूत स्थित में है और बाकी दोनो कपनियो को चुनौती दे रहा है।

मई महीने के भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण द्वारा प्राप्त ग्राहक डेटा के अनुसार, उद्योग के 5.93 मिलियन ग्राहकों का शुद्ध लाभ, जियो के 9.35 मिलियन से बहुत पीछे रह गया था।  एयरटेल को छोड़कर, बाकी कपनियो का विकास रुक गया है या फिर कम हो गया है।

जियो का सबसे बड़ा असर इसके मुख्य प्रतियोगियों के मुनाफे और राजस्व पर पड़ा: 2018-19 की पहली तिमाही में तीनों मुख्य कंपनियों, एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया के मुनाफे और राजस्व में गिरावट दर्ज की गई। तिमाही में वोडाफोन का राजस्व 31 फीसदी गिर गया, वहीं एयरटेल का मुनाफा 74 फीसदी नीचे आया। आइडिया ने मुनाफा इसलिए कमाया क्योंकि उसने अपने टावर बिजनेस का असाधारण लाभ उठाते हुए एटीसी टेलीकॉम के हाथों बेच दिया था। अगर इसे छोड़ दें तो कर और असाधारण वस्तुओं से पहले की हानि 2,758 करोड़ रुपये है।

‘मिंट’ की रिपोर्ट से पता चलता है कि मोबाइल ब्रॉडबैंड के बाजार में जियो का हिस्सा अब बाकी कपनियो के बराबर या उनसे अधिक है, भले ही इसका बाजार शेयर सिर्फ 23 प्रतिशत ही हो।

चूंकि जियो तीसरे स्थान पर ही अटके रहने के विचार में नहीं है, इसलिए तीन चीजें अब स्पष्ट हो जाती हैं:

पहलीः इंडस्ट्री कुछ और तिमाहियों तक परेशानी झेलेगी क्योंकि जियो निरन्तर राजस्व बाजार शेयर पर अपनी पकड बनाए रखेगा। क्योंकि पूरा बखेड़ा तो ब्रॉडबैंड के लिए है, इसलिए मौजूदा कंपनियों को ग्राहकों को बनाए रखने के लिए और भी निवेश करना पड़ सकता है।

दूसरीः  एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया दोनों कुछ मार्केट शेयर गंवाकर अपनी वर्तमान दरों को लागू रखने का प्रयास करेंगे, हालांकि रणनीति का नकारात्मक पक्ष यह है कि जियो इसका पूरा लाभ उठाएगा।

तीसरीः भविष्य में सभी कपनियो के लिए ग्राहकों तक पहुँचना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि अब यह शून्य-संचय खेल हो गया है। जिसमें एक व्यक्ति को जितना लाभ होता है किसी अन्य व्यक्ति को ठीक उतनी ही हानि होती है। हाल ही के महीनों में कई कंपनियों द्वारा कमाया गया लाभ रिलायंस कम्यूनिकेशन, टेलीनॉर, एयरसेल तथा टाटा टेलीसर्विस कंपनियों को छोड़ने वाले मौजूदा ग्राहकों  से प्राप्त किया गया था। इन कंपनियों के अधिकांश ग्राहक पहले से ही ‘बिग थ्री’ या सरकारी स्वामित्व वाली बीएसएनएल में स्थानांतरित हो चुके हैं। (टेलीनॉर एयरटेल के साथ विलीन हो गया है,जबकि एयरसेल ने दिवालियापन दर्ज कराया है- टाटा टेली,एयरटेल द्वारा संचालित है,जबकि रिलायंस कम्युनिकेशंस,जियो द्वारा संचालित है)।

चौथीः वास्तविक वृद्धि केवल ग्रामीण ग्राहकों से प्राप्त होगी, और मई में लगभग 80 प्रतिशत उपभोक्ता इसी क्षेत्र से आए थे। इस बदलाव के माध्यम से नए ग्राहक एआरपीयू को और आगे ले जाएंगे।

भारतीय दूरसंचार उद्योग में यह  परिवर्तन जियो के धमाकेदार प्रवेश की वजह से हुआ है।

सवाल यह है कि जियो, किस तरह पूंजी निवेश को बनाए रख पाने में सक्षम हो पाएगा, जिसने अपने प्रतिद्वंद्वियों के दांत खट्टे कर दिए।

इसके दो पहलू हैं- पहला, तेल रिफाइनरी और शैल-       रसायन से उच्च लाभ, दूसरा है स्पष्ट रूप से कर्ज। कुछ साल पहले लगभग कर्ज मुक्त कंपनी होने से पहले,जून 2018 के अंत में रिलायंस,242,116 करोड़ रुपये के कर्ज के तले दबी थी, इसमें से अधिकांश बुनियादी ढांचे में निवेश के कारण था। एक शुद्ध निर्यातक के रूप में इसने विदेश में अपने कर्ज का एक बड़ा हिस्सा कम ब्याज दरों पर निवेश किया, जो फायदेमंद रहा। पेट्रोलियम वस्तुओं का निर्यात इसे, विदेशी मुद्रा जोखिमों के खिलाफ बचाव प्रदान कराता है, यहाँ तक कि रुपये में गिरावट आने पर भी यह ऋण को सस्ता बनाता है।

जगन्नाथ स्वराज के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।