व्यापार
2018 में जेट, 2011 के किंगफिशर से बेहतर नहीं – नरेश गोयल के लिए यह स्पष्ट संकेत है
2018 में जेट, 2011 के किंगफिशर से बेहतर नहीं

प्रसंग
  • सात में से कम से कम तीन कंपनियों को कारोबार से बाहर होने की जरूरत है जिसमें जेट को सबसे पहले जाना चाहिए।
  • गोयल के लिए कठोर कदम उठाने का समय।

जेट एयरवेज की भारतीय एयरलाइन उद्योग में अकेले खड़े रहने की क्षमता दिन प्रति दिन घटती जा रही है। एयरलाइन के एक बड़े हिस्सेदार नरेश गोयल को इस कारोबार से बाहर निकलने पर ध्यान देना चाहिए या इसे बचाने की कोशिश करने के बजाय इसका एक मजबूत इकाई के साथ विलय कर लेना चाहिए।

इस वर्ष की मार्च और जून तिमाहियों में 1,036 करोड़ रुपये और 1,323 करोड़ रुपये के दो बड़े और लगातार त्रैमासिक घाटे का सामना करने वाली इस एयरलाइन ने अपने लॉयल्टी कार्यक्रम, जेट प्रिविलेज में 400 मिलियन डॉलर जुटा लेने के अनुमान के साथ 49 फीसदी हिस्सेदारी बेचकर पैसे जुटाने का वादा किया था, लेकिन अभी तक पैसे के कोई आसार नहीं हैं।

कुछ समय पहले जेट प्रिविलेज लॉयल्टी प्रोग्राम का मूल्यांकन लगभग 900 मिलियन डॉलर किया गया था और गोयल की 49 फीसदी हिस्सेदारी सैद्धांतिक रूप से आधे से थोड़ी ही कम आंकी जानी चाहिए। लेकिन यदि आप एक मायूस विक्रेता हैं तो मूल्यांकन वास्तविकता में नहीं बदलता है;और इसके अलावा, यदि खरीदारों को आपकी व्यवसाय में बने रहने की क्षमता पर शक है तो वे कम कीमत लगा सकते हैं। यदि जेट हाथ खड़े कर देता है, तो इसका लॉयल्टी प्रोग्राम लगभग किसी काम का नहीं है।

एयरलाइन की लॉयल्टी सूची दो मूलभूत स्रोतों से अपना मूल्यांकन प्राप्त करती है: पहला डेटा में सन्निहित मूल्य है, जो आपको उच्च मूल्य वाले ग्राहकों तक पहुँच प्रदान करता है;मूल्य की बड़ी दुकान की संभावना है कि लॉयल्टी कार्यक्रम में लोग अधिक लाभ कमाते हैं (पूरी जानकारी के लिए यहाँ पढ़ें)। चूंकि आप अधिक किराये (और बिना छूट वाले किराए) का भुगतान करने से अधिक लॉयल्टी अंक अर्जित करते हैं, लॉयल्टी ग्राहक वास्तव में बुद्धू होते हैं जो टिकटों के लिए अधिक भुगतान करते हैं और दूरी के अनुसार किराया भी छूट की कीमतों से अधिक दर पर होता है।आम तौर पर, जब आप कॉर्पोरेट खाते पर यात्रा करते हैं और टिकट का भुगतान कंपनी करती है और आपको कुछ दूरी की मुफ्त उड़ान मिलती है। तो कंपनियां कभी-कभी थोड़ा अधिक किराया देकर अपने सर्वश्रेष्ठ कर्मचारियों को संतुष्ट करने में कोई विचार नहीं करती हैं और मुफ्त टिकटों से प्राप्त बाद के लाभों को, जो कुछ निश्चित मील के बाद प्रदान किए जाते हैं, संचित होने देती हैं।

यह दिलचस्प बात है कि भारत में एकमात्र स्पष्ट रूप से व्यवहार्य एयरलाइन इंडिगो, कोई रॉयल्टी कार्यक्रम नहीं देती है और इसके किराए जेट या एयर इंडिया या गो एयर या स्पाइसजेट की तुलना में कम नहीं हैं। आज अधिकांश एयरलाइन टिकट ऑनलाइन खरीदे जाते हैं और यहाँ समय और तारीख के बाद कीमत अपरिहार्य कारक है।

अगर इंडिगो अधिकतर समय तक समयानुकूल रहकर केवल ग्राहकों को लॉयल्टी दे सकती है, और न्यूनतम ईंधन खपत वाले विमान तथा उच्च विमान उपयोगीकरण समय आदि पर तथा इसकी लागत पर ध्यान दिए जाने के कारण इसके लाभ सबसे अच्छे हैं तो किसी को आश्चर्य हो सकता है कि जेट कैसे प्रतिस्पर्धात्मक हो सकता है। यह 2011 में भी विशेष रूप से प्रतिस्पर्धी नहीं था, जब किंगफिशर नष्ट होने की कगार पर था।

‘मिन्ट’ की एक स्टोरी ने कल (10  अक्टूबर) को प्रकट किया कि जेट सुविधा शेयर बिक्री डेढ़ महीने के लिए रोक दी गई है, क्योंकि दो संभावित खरीददारों- ब्लैकस्टोन या टीपीजी समूह- में से कोई भी अंतिम प्रस्ताव तैयार करने और जेट के लिए धन खर्च करने के लिए तैयार नहीं है।

लॉयल्टी शेयर बिक्री के बाद भी भविष्य में जेट उड़ने योग्य हो पाएगा या नहीं, शायद उनकी चिंता का यही कारण है। गोयल ने जून तिमाही में घाटे की घोषणा के बाद लागत में 2,000 करोड़ रुपये की कटौती का वादा किया, लेकिन लागत में कटौती, जो लघु अवधि में नकदी प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण है, मध्यम अवधि में कभी व्यवहार्य रणनीति नहीं हो सकती है। बदलाव के लिए, मूल व्यवसाय को व्यापार बढ़ाने के लिए एक पुनर्निवेश के लिए पर्याप्त लाभ उत्पन्न करने में सक्षम होना चाहिए। इस संदर्भ में, गोयल द्वारा लॉयल्टी योजना को सिर्फ अपने उधारदाताओं को भुगतान करने के लिए बिक्री के लिए निजी शेयर बाज़ार में बेच देना आत्मविश्वास को प्रेरित नहीं करता है। व्यापार में निवेश में वृद्धि की कोई बात नहीं है, और जब तक इसमें बदलाव की कमी है, तब तक हम मान सकते हैं कि जेट की स्थिति बदतर होती जा रही है।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में एक रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2018 के अंत में जेट द्वारा उधार ली गई रकम 9,430 करोड़ रुपये से अधिक है और इसका मतलब है कि जेट की स्थिति आज लगभग ठीक है जैसी कि किंगफिशर की 2011 में थी। दरअसल यह उस समय से बदतर स्थिति में है जब व्यापार में इंडिगो से बढ़कर कोई नहीं था और वह किसी को भी आगे नहीं निकलने देता था।

जेट एयरवेज की कीमत पूरी तरह से घट चुकी है, जिसका अर्थ है कि गोयल के लिए इसे बचाने की अपेक्षा इसे सस्ती कीमत (या कोई इसके लिए जो भी कीमत दे दे) पर बेचना अधिक फायदेमंद रहेगा। वास्तव में, यदि वह एक आदर्श व्यवसायी हैं, तो उन्हें एयरलाइन बेचनी चाहिए और जेट विशेषाधिकार की हिस्सेदारी बरकरार रखनी चाहिए।

हाल की बाजार हिस्सेदारी संख्या इंगित करती है कि भारतीय विमानन क्षेत्र पर इंडिगो का एकाधिकार हो गया है जिसमें व्यवहार्य बाजार शेयरों के लिए छः अन्य संघर्ष कर रहे हैं जिनमें से जेट भी एक है।

जुलाई 2018 में इंडिगो की बाजार हिस्सेदारी 38.7 प्रतिशत से बढ़कर 42.1 प्रतिशत हो गई जबकि इसके तीन मुख्य प्रतियोगियों-जेट, स्पाइसजेट और एयर इंडिया- की हिस्सेदारी कम हो गई। जिसमें जेट की हिस्सेदारी 18.2 प्रतिशत से 15.1 प्रतिशत, एयर इंडिया की 13.5 प्रतिशत से 12.4 प्रतिशत और स्पाइसजेट की 14.2 प्रतिशत से घटकर 12.3 प्रतिशत रह गई। दो छोटे लाभकर्ताओं ने आपस में हाथ मिला लिया जिनमें पहला गो एयर (जो 7.8 प्रतिशत से 8.9 प्रतिशत हो गया) और दूसरा टाटा संयुक्त उद्यम (जिसमें एयरएशिया तथा विस्तार शामिल थे) था जो 7.2 प्रतिशत से बढ़कर 8.7 प्रतिशत हो गया। नवंबर 2011 में यह आंकड़ा 3 से 5 तक गिर गया, जैसा कि किंगफिशर लागत और सेवाएं बरकरार रखने के लिए कीमतों में कटौती कर रही था, जिससे बाजार हिस्सेदारी 14 फीसदी तक गिर गई – अब इसकी हालत जेट की हालत से अलग नहीं है।

जैसे रिलायंस जियो के आने के दो वर्षों बाद ही पांच प्रमुख कंपनियों (टाटा टेलीकॉम, रिलायंस कम्युनिकेशंस, एयरसेल, टेलीनॉर और आइडिया, जिसका वोडाफोन में विलय हो गया) की स्थिति खराब होती हुई देखी गई, उसी प्रकार भारतीय एयरलाइन उद्योग को तुरंत एकत्रीकरण की जरूरत है।

सात में से तीन कंपनियों को इस उद्योग से बाहर निकलने की जरूरत है और इसमें जेट को सबसे पहले बाहर निकलना चाहिए। एक अकेली इकाई के रूप में अपना अस्तित्व बचाने की इसकी संभावना 2011 में किगफिशर की तुलना से भी बदतर है।

गोयल के लिए कठोर कदम उठाने का समय है।

जगन्नाथन ‘स्वराज्य’ के संपादकीय निदेशक हैं। इनका ट्विटर हैंडल @TheJaggi है।