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बीपीसीएल व अन्य कंपनियों के निजीकरण प्रस्ताव में छिपी हैं सरकार की पिछली तैयारियाँ

2003 में भारत पेट्रोलियम लिमिटेड कॉर्पोरेशन (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड कॉर्पोरेशन (एचपीसीएल) में से सरकार के विनिवेश का प्रस्ताव लाया गया था। तब इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी और केंद्र को पीछे हटना पड़ा। लेकिन अब इस प्रस्ताव को फिर लाए जाने पर सचिवों के कोर समूह ने इसे स्वीकार कर लिया है।

आगे भी इस प्रस्ताव में किसी प्रकार का अड़ंगा आने की अपेक्षा नहीं है। तो ऐसा क्या बदल गया इन 16 सालों में कि अब इसके लिए संसद की अनुमति नहीं चाहिए?

2014 से 2019 के बीच सरकार ने छह संशोधन और खंडन अधिनियमों को पारित कर 722 कानूनों को हटाया है। पहले सरकार को इस प्रस्ताव से पीछे इसलिए हटना पड़ा था क्योंकि कानूनी रूप से ये कंपनियाँ सरकार की थीं। इसपर न्यायालय ने कहा था कि बिना कानूनों में परिवर्तन के निजीकरण की दिशा में आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।

अब सरकार ने उन कानूनों को हटा दिया है जो इन कंपनियों पर सरकार का स्वामित्व बताते थे। राष्ट्रीयकरण के भी कुछ कानूनों को हटाया गया। इनमें से कई कानूनों को 2016 में लाए गए संशोधन और खंडन अधिनियम द्वारा हटाया गया है। इसमें बीपीसीएल, एचपीसीएल, ऑइल, कोल इंडिया, एससीआई, आदि कंपनियों से जुड़े अधिनियम थे। ऐसे ही 2017 में दो और अधिनियम पारित हुए जो सेल, पावर ग्रिड आदि के निजीकरण की अनुमति देते हैं।

इस प्रकार सार्वजनिक क्षेत्र की पाँच कंपनियों- बीपीसीएल, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एससीआई), नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (नीपको) और टीएचडीसी व कॉनकोर की 30 प्रतिशत शेयरहोल्डिंग- जिनका निजीकरण प्रस्तावित है, के लिए निजी कंपनी के द्वार खुल जाएँगे।

सिर्फ निजीकरण ही नहीं, हम मोदी सरकार के अन्य निर्णयों में भी यह दूरदर्शिता देख सकते हैं। जुलाई में प्रस्तुत किए गए बजट 2019 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब विदेशी मुद्रा के सोवरीन बॉन्डों का प्रतिशत बढ़ाने की बात कही थी, तब भी कई अर्थशास्त्रियों की त्यौरियाँ चढ़ गई थीं।

लेकिन जब हम इसके पीछे की सरकार की तैयारियाँ देखेंगे तो खुद को आश्वस्त पाएँगे। जीडीपी के अनुपात में ऋण और वित्तीय घाटा (फिस्कल डेफिसीट) पिछले पाँच वर्षों में लगातार घटा है। इस प्रकार यह हमें बाहरी मुद्रा के खतरे से सुरक्षित रखने का कार्य करेगा।

शायद मोदी सरकार की यही दूरदर्शिता है जो उसके छोटे-छोटे कदमों पर ही सबको सजग कर देती है। अनुच्छेद 370 के उन्मूलन से पूर्व जम्मू-कश्मीर में सेना बलों की भारी तैनाती ने भी लोगों को कई संकेत दिए थे।

अब प्रायः लोग ऐसे संकेत सरकार की हर कथनी-करनी में ढूंढ रहे हैं। अमित शाह का “हिंदी राष्ट्र को एक सूत्र में बांधती है” वाला बयान हो या मोदी की मामल्लपुरम में जिनपिंग से भेंट, ये लोगों के समक्ष कल्पना का अथाह सागर खोल देते हैं। आप भी अनुमान लगाते रहिए, जाने कब, क्या सही सिद्ध हो जाए।