व्यापार
नवीन हिन्दू आध्यात्मिक व्यवसाय मॉडल के अग्र में बाबा रामदेव और श्री श्री
Baba Ramdev, Sri Sri Ravshankar

बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर हिन्दू धर्म दो के सबसे बड़े ‘ब्रांड राजदूत’ हैं और दोनों ने सक्षम बिज़नेस मॉडल खड़े करे हैं। यह धार्मिक-व्यावसायिक संस्थानों की दीर्घायु के लिए अच्छा समाचार है। इससे उन्हें अब्राहमी धर्मांतरण-वादी पंथों से प्रतिस्पर्धा में मदद मिलेगी क्योंकि इन पंथों की विस्तारवादी दृष्टि इनकी विपणन शक्ति और बिज़नेस मॉडल पर ही निर्भर हैं।

यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कैथॅलिक और प्रोटेस्टेंट चर्चों का निर्माण व्यावसायिक मॉडल के इर्द-गिर्द ही किया गया है, जोकि सिर्फ़ अनुयायियों के विनयपूर्ण योगदान से सम्भव नहीं है। चर्च, व्यवसायों में करोड़ों डॉलर और यूरो का निवेश करते हैं, और इसी से उनको चाहे कुछ भी हो जाये, अपनी धर्मप्रचार की गतिविधियों को जारी रखने का राजस्व मिलता है। इसी प्रकार, वेटिकन बैंक, आमतौर पर घोटालाग्रस्त, की कुल सम्पत्ति 64 अरब डॉलर है। यहाँ वेटिकन राज्य की आर्थिक स्थिति को नहीं जोड़ा जा रहा है। वहीं अमेरिकी पादरी तो कहीं ज़्यादा अमीर हैं, जो कई बार करोड़पतियों की सूची में शामिल होते हैं। (यहाँ देखें करोड़पति पादरियों की सूची)

इसके विपरीत, सबसे धनी भारतीय मंदिर तिरुपति और दक्षिण भारत में अधिकतर मंदिर राज्य द्वारा नियंत्रित होते हैं। केवल दक्षिणी राज्यों के नियंत्रण में एक लाख से अधिक मंदर चल रहे हैं, जिनसे कई हज़ार करोड़ का राजस्व आता है। इस तरह से राज्य उन मंदिरों से परे अपने उद्देश्यों के लिए अपने राजस्व को विनियमित करता है।

यही पर बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर जैसे गुरुओं के व्यावसायिक मॉडल महत्वपूर्ण हो जाते हैं, क्योंकि मंदिरों के विपरीत ये संस्थान अर्ध-व्यावसायिक संगठन हैं, और मंदिरों की भाँती भक्तों की सेवा के नाम पर राज्यों द्वारा आसानी से अधिकृत नहीं किये जा सकते।

कुछ ही दिन पहले, बाबा रामदेव के एफएमसीजी-सह-आयुर्वेद व्यापार संगठन, पतंजलि आयुर्वेद ने घोषणा की थी कि 2016-17 में इसने 10,000 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल किया – वह भी विमुद्रीकरण के कालखंड में, जबकि एफ़एमसीजी कारोबार साल के आखिर तक बिल्कुल तलहटी में पहुँच कगया था। द इकनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, पतांजलि 10,561 करोड़ रुपये की बिक्री के साथ ऍफ़.एम्.सी.जी क्षेत्र में नं 2 पर है, केवल हिंदुस्तान लीवर 30,782 करोड़ रुपये की बिक्री के साथ इससे आगे है। पतंजलि आयुर्वेद, नेस्ले (9,159 करोड़ रुपये) से आगे निकल चुकी है, साथ ही आईटीसी भी पीछे छूट गयी है, जिसके राजस्व में 10,336 करोड़ रुपये की बिक्री शामिल है।

‘‘अब तक, एफएमसीजी का मतलब भारत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ ही था, हमने उस एकाधिकार को तोड़ा है। ग्लोबल सीईओ ये कहते हुए चैन की नींद सो रहे हैं कि पतंजलि का बाज़ार हिस्सा छोटा है, परंतु यह सच नहीं है। हम पहले से ही कई श्रेणियों में नेतृत्व कर रहे हैं,’’ बाबा रामदेव कहते हैं। उन्होंने बताया कि टूथपेस्ट में भी जहाँ कोलगेट सर्वोच्च है, पतंजलि के दंतकांति का बाज़ार में हिस्सा 14 प्रतिशत है।

पतंजलि अपने टर्नओवर को 2017-18 में दोबारा से दोगुना करने की उम्मीद में है, जोकि मुश्किल होगा, क्योंकि वह आधार बहुत बड़ा है, जहाँ तक इसे पहुँचना होगा। जबकि बाज़ार विश्लेषकों को संदेह है कि ये एक कमज़ोर ग्रामीण बाज़ार और बड़े राजस्व के आधार पर किया जा सके, तो इसका ट्रैक रिकॉर्ड ये बताता है कि यह असम्भव नहीं है।  2015-16 में, पतंजलि में 150 प्रतिशत की वृद्धि हुई, और उसके अगले वर्ष 100 प्रतिशत की। अगले साल यह संख्या भले ही 70 फ़ीसदी हो, राजस्व के मामले में यह 17,000 करोड़ रुपये से अधिक होगा।

इससे बाबा रामदेव अरबपति बन जाएंगे और मार्च 2018 के बाद उनकी कुल सम्पत्ति सम्भवतः एक लाख करोड़ के आस-पास होगी।

2,06,000 करोड़ रुपये के हिसाब से, हिंदुस्तान यूनिलीवर का बाज़ार मूल्यांकन उनकी बिक्री का 6.7 गुना है। अब अगर अगले वर्ष 17,000 करोड़ रुपये के हिसाब से, पतंजलि को हम एक समान बिक्री मूल्य देते हैं, तो बाज़ार मूल्यांकन होगा लगभग 1,13,000 करोड़ रुपये। इस हिसाब से व्यक्तिगत मूल्यांकन के मामले में, लगभग 17 अरब डॉलर के साथ, बाबा रामदेव भारत के दूसरे सबसे धनी व्यक्ति बन जाते हैं। यह मुकेश अम्बानी के मूल्यांकन से (जो की वर्तमान में फोर्ब्स इंडिया लिस्ट में 22.7 अरब डॉलर के साथ प्रथम स्थान पर हैं) 5 अरब डॉलर कम होगा, लेकिन सन फ़ार्मा के बॉस दिलीप सांघवी और विप्रो के अज़ीम प्रेमजी से आगे।

इस मूल्यांकन को वास्तविक बनाने के लिए पतंजलि को सूचीबद्ध कराने की बाबा रामदेव की कोई योजना नहीं है, लेकिन उन्होंने ने यह साफ़ कहा है कि उनकी कम्पनी की अध्यक्षता, ‘‘हमेशा एक संन्यासी के पास रहेगी, किसी व्यापारी के पास नहीं, मेरे बाद भी,’’ – यह द इकनोमिक टाइम्स ने उनके हवाले से बताया।

यह बयान इस बात का संकेत देता है कि पतंजलि इतने कम समय में ही इतनी सफल कैसे रहा। भारत में एक व्यापारी की अपेक्षा संन्यासी पर लोग ज़्यादा आसानी से विश्वास कर लेते हैं। आध्यात्मिक और लौकिक दोनों हितों के बीच संतुलन बनाये रखने के लिए आपको दोनों को संयोजित करने की आवश्यकता है। उनके योग गुरु के रूप में महत्ता के बग़ैर, पतंजलि एफएमसीजी रैंकिंग में कहीं नहीं होती।

बाबा रामदेव की सफलता में कई परतें हैं, जोकि भारत में बड़ी संख्या में मौजूद अन्य आध्यात्मिक उद्यमियों के लिए उपयोगी होंगी।

पहला, उन्होंने ख़ुद को बड़े पैमाने पर बाज़ार में योगी के रूप में स्थापित किया, और योग के लिए उच्च वर्ग के बजाय, जहाँ कि आपको श्री श्री रविशंकर या सद्गुरु जग्गी वासुदेव मिलेंगे, आम जनता में योग के अनुयायी बनाये।

दूसरे, एफएमसीजी में वो आयुर्वेदिक दवाओं में जाने के बाद आये, जिनकी भारत में बड़ी साख़ है, और जहाँ योग गुरु का समर्थन बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसने उनके योग अनुयायियों और आयुर्वेद उपयोगकर्ताओं को उनके एफएमसीजी उत्पादों को मौजूदा ब्रांड वरीयताओं के सरल विस्तार के माध्यम से इस्तेमाल करने का मौक़ा दिया।

तीसरा, वर्जिन समूह के रिचर्ड ब्रैंसन की तरह ख़ुद को ब्रांड बनाकर, वे शुरुआती चरणों में भारी संख्या में लोगों की तारीफ के सहारे ही आगे बढ़े। यह सिर्फ़ अब है कि पतंजलि बड़े पैमाने पर विज्ञापन के लिए मीडिया का इस्तेमाल कर रहा है। उनकी विज्ञापन लागत अब तक उनके प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में बहुत कम थी।

चौथा, बाबा रामदेव बड़े पैमाने पर बाज़ार में स्थापित हैं, जबकि आयुर्वेदिक उत्पादों, जैविक उत्पादों और तेज़ी से एफएमसीजी सामान बेचने में पहले से ही मौजूद श्री श्री रविशंकर अपने श्री श्री ब्रांडों के साथ बाज़ार में और ऊँचे स्तर तक पहुँचने की योजना बना रहे हैं। समूह ने हाल में अपने ‘श्री श्री आयुर्वेद’ नाम से स्थापित ब्रांड को ‘श्री श्री तत्व’ के रूप में रीब्रांड किया है। ये आयुर्वेदिक और अन्य उत्पाद इस वेबसाइट से बेचे जाते हैं। ख़ुदरा वितरकों का विस्तार भी इस वर्ष 2,500 की संख्या से होने की प्रक्रिया में है, मिंट ने कुछ समय पहले बताया था। पिछले ओलिम्पिक मेें बैडमिंटन रजत पदक विजेता पी.वी.सिंधु, श्री श्री के कुछ उत्पादों के लिए ब्रांड एम्बेस्डर होंगी।

बाबा रामदेव और श्री श्री दोनों ही हिंदू धर्म ‘लाइट’ को एक नये राजस्व मॉडल की दिशा में ले जा रहे हैं, जो आध्यात्मिकता और व्यवसाय दोनों के लिए ही शुभ शगुन है। योग और आध्यात्मिकता को मज़बूत आर्थिक ताक़त का सहारा चाहिए और व्यापार बिना अध्यात्त्म के सिर्फ़ व्यापार है।

भारत की ‘धर्मनिरपेक्ष’ वामपंथी ब्रिगेड इनके पीछे ज़रूर पड़ेगी, लेकिन उन्हें अपनी राह पर अडिग रहना चाहिए।