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कृषि निर्यात को बढ़ाने में भारत के लिए बाधा बनी एमएसपी का क्या है समाधान

अगस्त से नवंबर में लगातार चार महीनों तक भारत का निर्यात नीचे गिरा है। इस वित्तीय वर्ष के शुरुआती सात महीनों में निर्यात 1.99 प्रतिशत नीचे रहा।

खाद एवं कृषि संगठन के अनुसार, भारत में 97 अरब डॉलर यानी 7 लाख करोड़ रुपये का कृषि उत्पाद निर्यात सामर्थ्य है। हालाँकि केला, चिकन, दूध उत्पाद, संतरे आदि मिलाकर इसका कुल निर्यात इस क्षमता का एक छोटा भाग ही है। उदाहरण स्वरूप देखें कि 2017 में 19 कृषि उत्पादों का निर्यात 1.5 अरब डॉलर यानी 7 लाख करोड़ रुपये का ही हुआ।

इसके अलावा भारत में प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों जैसे गेहुँ का आटा, सोयाबीन बड़ी, आदि के निर्यात का भी सामर्थ्य है। लेकिन देश इस सामर्थ्य का लाभ नहीं उठा पाया है। दीर्घावधि से कई सरकारें चाह रही हैं कि भारत का निर्यात वैश्विक निर्यात में कम से कम 2 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखे लेकिन इस लक्ष्य को कभी प्राप्त नहीं किया जा सका।

इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय निर्यात वैश्विक निर्यात का 1.71 प्रतिशत था जबकि इससे पहले की तिमाही में 1.58 प्रतिशत।

भारतीय निर्यात के निर्धारित लक्ष्य तक न पहुँच पाने का कारण कृषि उत्पादों की शिपिंग में आने वाली कई बाधाएँ हैं। एक प्रमुख कारण है कि भारत के कृषि उत्पादों का मूल्य वैश्विक बाज़ार की तुलना में अधिक है।

उदाहरण के रूप में गेहुँ का मूल्य देखें। अप्रैल 2020 में शुरू होने वाले रबी क्रय मौसम में केंद्र ने प्रति क्विंटल गेहुँ के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1,925 रुपये तय किया है। नवंबर-दिसंबर में बुआई के बाद मार्च अप्रैल में कटाई होने वाली रबी फसल गेहुँ का 2019 में 1,840 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी था।

साभार इकोनॉमिक टाइम्स

वैश्विक बाज़ार में भारतीय गेहुँ को चारा योग्य माना जाता है। फिर भी यदि कोई इसे बेचने का प्रयास करेगा, जैसे इंडोनेशिया को, तो इसकी न्यूनतम कीमत 340 डॉलर प्रति टन यानी 2,425 रुपये प्रति क्विंटल होती।

वहीं इसी गुणवत्ता वाला यूक्रेन का गेहुँ 210 डॉलर प्रति टन यानी 1,500 रुपये प्रति क्विंटल दाम पर उपलब्ध है। तो यदि भारत की कोई आटा मिल आटा बेचना चाहती है तो वह अपने यूरोपीय या ऑस्टेलियाई प्रतिस्पर्धियों के मूल्य को कैसे टक्कर देगी?

केंद्र एमएसपी इसलिए निर्धारित करता है कि किसी भी किसान को असंतुष्ट होकर अपना उत्पाद न बेचना पड़े। बफर स्टॉक बनाए रखने और खाद आपातकाल, राशन दुकानों में आपूर्ति और कार्य के बदले भोजन योजनाओं को चलाने के लिए सरकार गेहुँ और चावल खरीदती है।

जब मूंगफली, कपास, मक्का और अरहर जैसे उत्पादों का घरोलु मूल्य गिरता है, तब सरकार इन उत्पादों की भी खरीद करती है। एमएसपी सभी किसानों के लिए होती है लेकिन गेहुँ या चावल के मामले में यह पंजाब और हरियाणा तक ही सिमट कर रह जाती है।

उदाहरण देखें कि इस वर्ष भारतीय खाद निगम (एफसीआई) ने कई राज्यों से कुल 3.4 करोड़ टन गेहुँ खरीदा जिसमें से 1,3 करोड़ टन गेहुँ पंजाब व 93 लाख टन गेहुँ हरियाणा से खरीदा गया।

वहीं देश के सबसे बड़े गेहुँ उत्पादक राज्या उत्तर प्रदेश से मात्र 34 लाख टन ही गेहुँ खरीदा गया। मुद्दा यह है कि जब एमएसपी सभी किसानों के लाभ के लिए है तो केवल कुछ किसानों को ही लाभ क्यों मिल रहा है और वह भी केवल पंजाब और हरियाणा के दो राज्यों से?

इसके बाद उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में यह होता है कि निजी व्यापारी और व्यापार संस्थाएँ एमएसपी से कम मूल्य पर किसानों से उत्पाद खरीदती हैं। इस प्रकार शीर्ष समय पर गेहुँ खरीदकर वे मौसम जाने पर इसे उच्च मूल्य पर बेचते हैं।

एफसीआई औद्योगिक उपभोक्ताओं को भी गेहुँ की आपूर्ति करती है जैसे आटा मिलें खुला बाज़ार बिक्री योजना (ओएमएसएस) से गेहुँ खरीद सकती हैं। हालाँकि इससे उत्पाद के मूल्य में इसका ब्याज भी जुड़ जाता है।

उदाहरण स्वरूप, ओएमएसएस के तहत एफसीआई पंजाब के बाहर 2,200 रुपये प्रति क्विंटल पर गेहुँ बेचती है। अगर परिवहन व अन्य शुल्कों को जोड़ा जाए तो औद्योगिक उपभोक्ता तक पहुँचते-पहुँचते इसका मूल्य 2,750 रुपये प्रति क्विंटल हो जाता है।

गेहुँ और चावल पर सरकारी नीतियों में कुछ और समस्याएँ भी हैं। लगभग दो दशक से केंद्र द्वारा राज्यों को प्रस्तावित गेहुँ और चावल का मूल्य कम रहा है। इससे राज्य 1 या 2 रुपये में राशन दुकानों पर समाज कल्याण योजनाओं के तहत अनाज बेचते हैं।

हालाँकि इस कारण यह अनाज अनैतिक तत्वों के हाथों में चला जाता है जैसे तमिलनाडु में मिलने वाले 1 रुपया प्रति किलो चावल की तस्करी केरल में की जाती है। इसके अलावा राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए स्थानीय स्थानीय करों से भी अनाज का मूल्य बढ़ता है।

एफसीआई को भी इन करों से छूट नहीं दी गई है और विकास शुल्क, मंडी उपकर, आदि मिलाकर यह गेहुँ के एमएसपी का 11-13 प्रतिशत हो जाता है जिससे इसपर आर्थिक भार बढ़ता है।

एमएसपी के कारण प्रसंस्करण करने वालों पर बढ़ने वाला भार सोयाबीन के क्षेत्र में भी देखा गया है। इस वर्ष के लिए सोयाबीन के लिए 3,710 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी तय की गई थी। वर्तमान में सोयाबीन के केंद्र इंदौर के बाज़ारों में इसका मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल लगाया जा रहा है।

खरीफ 2019-20 के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य

वहीं दूसरी ओर यूएस की सोयाबीन का मूल्य 350 डॉलर प्रति टन यानी 2,500 रुपये प्रति क्विंटल है। भारत तेलबीजों के आयात की अनुमति नहीं देता है लेकिन यहाँ प्रश्न यह है कि कोई सायोबीन तेल या बड़ी का निर्यात करना चाह रहा हो तो कैसे करे, अर्जेंटिना जैसे देशों में?

ऐसे ही मक्के के लिए इस वर्ष 1,760 रुपये की एमएसपी तय की गई है लेकिन कर्नाटक के कई बाज़ारों में इसकी बोली 1,800 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर जा रही है। वहीं वैश्विक मक्का मूल्य 150-1755 डॉलर प्रति टन यानी 1,070-250 रुपये प्रति क्विंटल है।

कैसे एक मक्का उत्पादक इस प्रतिस्पर्धा का सामना करे? इसी प्रकार मक्का का उपभोग करने वाला पोल्ट्री उद्योग इतनी लागत के साथ वैश्विक बाज़ार को कैसे टक्कर दे। इसके अलावा निर्यातक इंफ्रास्ट्रक्चर समस्याओं का भी सामना करते हैं जिसमें उच्च परिवहन शुल्क सम्मिलित है।

यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि सरकार एमएसपी की घोषणा न करे। लेकिन आज नहीं तो कल एमएसपी को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में आयात पर निर्भर कुछ देशों द्वारा चुनौती दी जाएगी क्योंकि इसे बाज़ार को विकृत करने वाले कारक के रूप में देखा जाता है।

दूसरी बात यह कि कब तक सरकार एमएसपी निर्धारित कर वैश्विक परिप्रेक्ष्य के समक्ष तौले बिना इसे बढ़ाती रहेगी? एमएसपी के नाम पर उपभोक्ता को कब तक यह अतिरिक्त बोझ उठाना होगा?

साथ ही एमएसपी देशभर के किसानों को लाभ भी नहीं पहुँचा पा रही है। अच्छी खरीद प्रणाली वाले राज्यों के किसान लाभ कमा रहे हैं, वहीं ऐसी प्रणाली के अभाव वाले राज्यों में किसाों को एमएसपी से कम मूल्य पर ही संतोष करना पड़ रहा है।

कई कमेटियों ने इस मामले को परखा और कुछ सुझाव भी प्रस्तुत किए। एमएसपी से मुक्त होने और किसानों को अधिक प्रभावित न करने का एक तरीका है तलचिह्न (बेंचमार्क) मूल्य (बीएमपी) तय करना।

सरकार विभिन्न फसलों के लिए बीएमपी तय कर सकती है, उन्हीं कारकों को ध्यान में रखकर जिससे एमएसपी तय की जाती है। जब मूल्य बीएमपी से नीचे गिरेगा तो सरकार इसकी भरपाई सीधा लाभ प्रणाली से कर सकती है। बाज़ार मूल्य और बीएमपी के अंतर को मुआवज़े के रूप में दिया जा सकता है।

उत्पादकता को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को उसे पुरस्कृत करने का एक तरीका ढूंढना चाहिए। वर्तमान एसएसपी प्रणाली में वह किसान लाभ नहीं पाता है जिसकी उत्पादकता उसके पड़ोसी से बेहतर है।

इन प्रयासों से कई लाभ होंगे। पहला यह कि बाज़ार पर गलत प्रभाव पड़े बिना किसानों को बीएमपी मिलेगा और दूसरा यह कि खाद प्रसंस्करण उद्योग भी प्रतिस्पर्धा में टिके रह पाएँगे। इसके फलस्वरूप भारत कृषि निर्यात में अपनी भागीदारी बढ़ा पाएगा।

इस प्रकार अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा क्योंकि व्यापार असंतुलन को संभाला जा सकेगा और व्यापार की कमी पूरी की जा सकेगी।

स्वराज्य के कार्यकारी संपादक एमआर सुब्रमणि  @mrsubramani के माध्यम से ट्वीट करते हैं।