इन्फ्रास्ट्रक्चर
नौकरशाही के व्यवधानों को पार करके एनएमपी के लक्ष्य प्राप्त करना आवश्यक

भारतीय सरकारों की कार्य पद्धति के विषय में दो सामान्य बातें देखी गई हैं। पहली, राजनीतिक इच्छा पर्याप्त नहीं है, सरकारी नीतियों की सफलता काफी हद तक नौकरशाही पर निर्भर करती है। दूसरी, कुछ अत्यधिक प्रतिबद्ध नौकरशाह होते हैं जो परियोजनाओं में अपना कुछ जोड़ देते हैं जो अधिकांश राजनेताओं के लिए एक जाल सिद्ध होता है।

“6 लाख करोड़ रुपये” के राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (एनएमपी) में यह “अतिरिक्त प्रयास” दिखता है। परिसंपत्ति मुद्रीकरण एक पुराना एजेंडा है और इसकी सफलता अर्थव्यवस्था के लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) या दिवालिया संहिता (आईबीसी)। इसलिए इस परियोजना को त्रुटिरहित बनाने के लिए सरकार को अतिरिक्त प्रयास करने चाहिए।

मुद्रीकरण क्या है

परिभाषा के अनुसार मुद्रीकरण का अर्थ होता है कि निवेश किए हुए पैसे में वित्तीय संभावनाओं को खोलना या पड़े निरुपयोगी निवेश में से लाभ कमाना। उदाहरण स्वरूप, अचल संपत्ति में आप अपने निवेश का मुद्रीकरण उसे किराए पर देकर कर सकते हो। जैसे एनएमपी के अंतर्गत दूरसंचार क्षेत्र के लिए 35,000 करोड़ रुपये की योजना इसी श्रेणी में आती है।

कई वर्षों में बीएसएनएल जैसी भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कंपिनयों ने मोबाइल टावर, ऑप्टिक फाइबर केबल (ओएफसी) नेटवर्क, आदि इंफ्रास्ट्रक्चर पूरे देश में बनाया है। दुर्भाग्यवश, इनमें से कई परिसंपत्तियों का पूर्ण उपयोग नहीं हो रहा है क्योंकि उपभोक्ता सेवा सुविधा के लिए निजी कंपनियों के पास जा रहे हैं।

उसी प्रकार, हर पंचायत तक उच्च बैंडविड्थ की डाटा संयोजकता सुनिश्चित करने के लिए अरबों डॉलर की भारतनेट परियोजना चल रही है जो ओएफसी नेटवर्क बना रही है। लेखक स्वयं पूर्वोत्तर भारत के दूरस्थ गाँवों में इस योजना के क्रियान्यवयन के साक्षी बने हैं।

श्रीनगर में बीबीएनएल कार्यालय का उद्घाटन

इससे स्थानीय विकास शुरू हो सकता था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि इस इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग मात्र सरकारी कामों के लिए हो रहा है जो न्यूनतम होते हैं। इन निष्क्रिय क्षमताओं का उपयोग निजी क्षेत्र को करने देने से न सिर्फ सरकारी कोष भरेगा, बल्कि व्यापार एवं वाणिज्य को भी काफी लाभ होगा।

पहले निजी सेवा प्रदाता अनौपचारिक रूप से सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग करते थे। अब इसके लिए प्रतिस्पर्धात्मक बोली लगाई जा सकती है। न सिर्फ दूरसंचार। सड़कों (एनएमपी का 27 प्रतिशत भाग), तेल व गैस पाइपलाइन (11 प्रतिशत), भंडारण (5 प्रतिशत), रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर (25 प्रतिशत), बिजली पारेषण (8 प्रतिशत) सभी इस परिभाषा पर सही बैठते हैं।

इसमें दोनों का लाभ है। पूरे देश में फैली हुईं तेल व गैस पाइपलाइन की निष्क्रिय क्षमताओं का उपयोग निजी क्षेत्र करे, इसका तुक बनता है। निजी खिलाड़ियों को उनका अपना इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए कहना अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है। इससे निरुपयोगी इंफ्रास्ट्रक्चर का अंबार लगेगा।

साथ ही प्रदाता को कम लाभ मिलेगा या उपभोक्ता के छोर पर सेवाओं का मूल्य बढ़ जाएगा। क्यों सरकार किसी राजमार्ग खंड में निवेशित रहे और 25 वर्षों तक उससे टोल एकत्रित करके पैसा वापस प्राप्त करे? यदि कोई निजी निवेशक या निवेश ट्रस्ट (इन्विट) सरकार को उसी समय पैसा दे दे और स्वयं टोल से पैसा कमाए तो सरकार अधिक राजमार्ग बनाने पर ध्यान केंद्रित कर सकती है।

क्या आउटसोर्सिंग विमुद्रीकरण है?

निवेशों को खोलना एनएमपी का मूल है। प्रस्तावों को देखकर आप पाएँगे कि योजना का 90 प्रतिशत भाग इसी श्रेणी में आता है। प्रश्न उन थोड़े-से प्रस्तावों का है जिनमें परिचालनों के आउटसोर्स यानी बाहरी की सेवाएँ लेने की बात कही गई है।

खनन में 28,747 करोड़ रुपये (एनएमपी का 5 प्रतिशत भाग) का मुद्रीकरण देखें। कोयला परिसंपत्तियों की नीलामी (जो मुद्रीकरण की अर्हता पर खरी उतरती है क्योंकि कोयला भंडार की पहचान करने में निवेश हुए थे) को छोड़कर, सूची में खदान विकासकर्ता और परिचालक (एमडीओ) के अनुबंध, कोयला भंडार और मशीनीकृत लोडिंग सुविधा, आदि भी है।

एमडीओ कुछ और नहीं बल्कि एक आउटसोर्स किया गया खननकर्ता है। वर्तमान में कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) अपना 70 प्रतिशत उत्पादन खनन ठेकेदारों से प्राप्त करता है लेकिन उनमें से अधिकांश छोटे ठेकेदार हैं। सामान्य भाषा में कहें तो जो बड़ा निजी खननकर्ता अधिकांश काम स्वयं कर सके, उसे एमडीओ कहा जाता है।

पिछले 15 वर्षों से इस मॉडल को आगे करने का प्रयास किया जा रहा है लेकिन सीमित सफलता ही हाथ लगी है। सीआईएल के पास ऐसे दो एमडीओ हैं। छोटा हो या बड़ा ठेकेदार, उत्पादन को आउटसोर्स करने के मूलभूत नियम वही रहते हैं।

काफी कम मूल्य पर वे कोयना खदान के लिए सीआईएल के साथ अनुबंध करते हैं। एक ओर जहाँ सीआईएल के कर्मचारी बिना अधिक काम के उच्च वेतन की माँग करते रहते हैं, वहीं कम भत्ते पर कुछ निजी श्रमिक उनका काम करते हैं। इसमें मुद्रीकरण कहाँ आता है?

किसी भी बड़े संगठन की तरह, सीआईएल ऐसे कई परिचालनों को आउटसोर्स करता है। भंडारण, मशीनीकृत लोडिंग सुविधाओं और रेल लाइनों के लिए भी सीआईएल भुगतान करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनमें निवेश करने में किसी की रुचि नहीं है।

अन्य (जैसे रेलवे) उन्हें बनाते और परिचालित करते हैं व पूर्वनिर्धारित समझौतों के तहत सीआईएल उनका भुगतान करता है। क्या यह मुद्रीकरण है? यदि ऐसा है तो मुद्रीकरण अभी भी हो रहा है लेकिन वह सूची में नहीं है।

न सिर्फ खनन, बल्कि इसी प्रकार परिचालन व रख-रखाव के लिए आउटसोर्स के अवसर बंदरगाहों के मुद्रीकरण योजना में भी सूचीबद्ध हैं। हालाँकि, जिसकी कमी है, वह यह कि कोलकाता जैसे पुराने बंदरगाहों में अचल संपत्ति के मुद्रीकरण की भी संभावनाएँ हैं जहाँ शहर के मुख्य भाग में बड़े क्षेत्रफल की अनुपयोगी भूमि परिसंपत्तियाँ पड़ी हुई हैं।

संख्या को बढ़ाकर दिखाने से कुछ नहीं होगा

स्पष्ट रूप से अत्यधिक प्रतिबद्ध नौकरशाही ने तुरंत प्रशंसा पाने के लिए संख्या को बढ़ाकर दिखाया है। इसका खामियाजा राजनीति को भुगतना होगा। पहला, भारत में वामपंथी राजनेता भी श्रेष्ठ निजी सेवाओं का उपयोग करते हैं, चाहे वह आईफोन हो या वोडाफोन।

जब वे सत्ता में होते हैं तो विनिवेश भी करते हैं (कोलकाता के ग्रेट ईस्टर्न होटल में विनिवेश को याद करें) लेकिन फिर भी राजनीतिक वर्ग इसके लिए अतिरिक्त श्रम करता है कि “निजी” एक निषिद्ध शब्द ही बना रहे। स्वाभाविक है कि एनएमपी में संख्या जितनी अधिक होगी, विपक्ष उतना हल्ला करेगा।

निजी-सार्वजनिक साझेदार (पीपीपी) से इंफ्रास्ट्रक्चर परिसंपत्तियाँ विकसित करने के भारत के पिछले प्रयास विफल रहे हैं। विकसित परिसंपत्ति में निवेश आकर्षित करने का एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है एनएमपी। सरकार ने पिछले दो वर्षों में इसके लिए काम किया है और इन्विट को लाकर गहराई का भी अनुमान लगा लिया है जिसे बाज़ार में अच्छी प्रतिक्रिया मिली थी।

लेकिन आगे का कार्य सरल नहीं है। यह देखना होगा कि मुद्रीकरण की जल्दबाज़ी में हम उपयुक्त लेनदारों को खोज सकें। साथ ही कई दशकों से निजी प्रतिभागिता को रोकने में रेलवे नौकरशाही सफल रही है। जुलाई में उन्होंने व्यवाहरिक रूप से 151 निजी ट्रेन चलाने की बोली की हत्या कर दी थी।

रेल परिसंत्तियों के मुद्रीकरण के लिए क्या हम उसी नौकरशाही पर विश्वास कर सकते हैं? सरकार के लिए यह कठिन राह है। एनएमपी लाने के लिए उन्हें दोष दिया जा रहा है। जब वे मुद्रीकरण के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएँगे, तब भी उन्हें ही दोष दिया जाएगा। ऐसे में संख्या बढ़ाकर दिखाने या कुछ आउटसोर्सिंग को मुद्रीकरण दिखान कैसे सरकार की सहायता करता है?