रक्षा
भारत की नई भू-राजनीतिक संरचना कैसी होनी चाहिए

लंबे समय से भारत ने अपनी भू-राजनीतिक क्षमताओं से कमतर ही काम किया है। जवाहरलाल नेहरू से अटल बिहारी वाजपेयी तक विदेश नीति की सूक्ति रही है- नरमी, कोमलता। विश्व ऐसी उभरती हुई शक्ति भारत की सराहना करता है जो भू-रणनीति को प्रभावित नहीं करे।

भारत ने कर्त्तव्य-निष्ठा से इसका अनुपालन किया है। अपनी निष्क्रियता को वैध ठहराने के लिए इसने तरह-तरह की युक्तियाँ लगाई हैं। सबसे पहले, नेहरूवादी गुट-निरपेक्षता। संयुक्त राष्ट्र में भारत ने अधिक ध्यानाकर्षण नहीं किया।

फिर 21वीं शताब्दी में रणनीतिक स्वायत्तता का झोंका आया। इसका अर्थ बस इतना था कि भारत विवादास्पद प्रस्तावों से बचेगा और सैन्य गठजोड़ों से एक हाथ की दूरी बनाए रखेगा। तब से विश्व बदल गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में नेहरू-वाजपेयी का सिद्धांत अपनाया- पुराने मित्रों (यूनाइटेड स्टेट्स) को रिझाओ और पुराने शत्रुओं (चीन) का तुष्टीकरण करो। अपने पहले कार्यकाल के अंत तक मोदी को समझ आ गया कि यह काम नहीं कर रहा है।

दलाई लामा और ताइवान पर भारत की चुप्पी को चीन ने उसकी दुर्बलता समझा। उसके बाद डोकलाम और पूर्वी लद्दाख की घटनाएँ हुईं। ‘अपने मित्रों को निकट रखें और शत्रुओं को निकटतर’ की पुरानी कहावत काम करती नहीं दिखी।

अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी ने पद्धति बदल दी। भारत के भू-राजनीतिक तरकश में एक बाण है- अधिक बलशाली क्वाड। जो लोग ये सोच रहे हैं कि यूनाइटेड स्टेट्स, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के ऑकस गठबंधन से क्वाड कमतर हो गया है, वे बात को समझे नहीं हैं।

ऑकस के तीन में से दो सदस्य भारत के साथ क्वाड के सदस्य हैं। ये दोनों ही गठबंधन एक-दूसरे के पूरक हैं। ऑस्ट्रेलिया को परमाणु-परिचालित (परंतु परमाणु हथियारों से लैस नहीं) पनडुब्बी तकनीक (जो 2030 के दशक के मध्य से पूर्ण रूप से फलीभूत होगी) देना ऑकस की विशेषता है।

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के साथ यूएस राष्ट्रपति जो बाइडन (सितंबर 2021)

इससे ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया चीन के विरुद्ध मज़बूती से खड़े होंगे। दो वर्षों पहले जब चीन ने हॉन्ग कॉन्ग में लोकतंत्र-समर्थक विरोध प्रदर्शनों का क्रूरतापूर्ण दमन नहीं किया था, तब व्यापार एवं तकनीक के क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन दोनों ही चीन को रिझाने में लगे हुए थे।

अब यह चोंचले समाप्त हो गए हैं। भारत की नई भू-राजनीतिक संरचना में जहाँ क्वाड एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, वहाँ ऑकस की ओर से यह एक सकारात्मक परिणाम है। हालाँकि, भारत को अपनी महत्वाकांक्षाओं को निस्संदेह ही इससे अधिक रखना होगा।

भारत की महत्वाकांक्षाएँ क्या होनी चाहिए? पहला, स्मरण हो कि जब 2030 की दशक के आरंभ में ऑकस की पहली परमाणु परिचालित पनडुब्बी ऑस्ट्रेलिया को सौंपी जाएगी, तब भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका होगा।

चीन का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) जो आज भारत का पाँच गुना है, उसका अंतर कम होकर तीन गुना रह जाएगा। भारतीय सैन्य बलों ने भूमि, वायु, समुद्र, अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्र में महत्त्पूर्ण तकनीकी क्षमताएँ प्राप्त कर ली होंगी जहाँ भावी युद्ध लड़े जाएँगे।

आगे की राह द्विपक्षीय और बहुपक्षीय गठबंधन बनाने पर निर्भर करती है। क्वाड एक शुरुआत है। आवश्यकता है कि बड़े सुरक्षा आयाम को प्राप्त करने के लिए सदस्य राष्ट्रों की नौसेनाओं, वायुसेनाओं और थलसेनाओं में अधिक संयुक्त अभ्यास हों।

फ्रांसीसी संबंध

फ्रांस के साथ संबंध गहरे करना उतना ही आवश्यक है। उत्तरी अफ्रीका एवं अन्य स्थानों पर स्थित पूर्व फ्रांसीसी उपनिवेशों के फ्रैंकोफोन ब्रह्मांड में भारत को अवसर खोजने होंगे। फ्रांस एक स्थिर साझेदार सिद्ध हो सकता है जो यूएस, ब्रिटेन व ऑस्ट्रेलिया के एंग्लोस्फीयर के बाहर भारत को सैन्य, आर्थिक व तकनीकी विकल्प देगा।

एंग्लोस्फीयर ने ऑकस रूपी खंजर जो फ्रांस की पीठ में भोंका है, उससे वह क्रोधित है और होना भी चाहिए। अस्थाई रूप से वह भारत-फ्रांस-ऑस्ट्रेलिया के त्रिपक्षीय समूह से बाहर हो गया है। वह लौटेगा परंतु सैन्य, आर्थिक और तकनीकी परिसंपत्तियों के लिए एक भारत-फ्रांस द्विपक्षीय गठबंधन मोदी की नीति सूची में होना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युअल मैक्रों

यह युग अनेक गठबंधनों का है और एससीओ, ब्रिक्स, नाटो, बिम्सटेक, ऑकस एवं क्वाड- सभी के पीछे कोई न कोई तर्क है। एक भारत-फ्रांस द्विपक्षीय साझेदारी- इंडफ्रा के अपने लाभ होंगे। ब्रेक्ज़िट के बाद रूस के अलावा यूरोप में फ्रांस ही एकमात्र परमाणु शक्ति है।

राफेल सौदा एक संकेत है कि दोनों देशों के बीच गहरे संबंधों की संभावनाएँ हैं। चीन और पाकिस्तान पर निशाना साधने में यह भारत के तरकश में एक अतिरिक्त तीर भी बन जाएगा। मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैन्युअल मैक्रों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समन्वय पर बात की है।

इसके बाद मोदी ने ट्वीट किया था, “यूएनएससी समेत सभी स्थानों पर फ्रांस के साथ रणनीतिक साझेदारी को हम महत्त्व देते हैं।” विदेश मंत्रालय डॉ एस जयशंकर के नेतृत्व में  पहले मज़बूत हो गया है और उसने कहा, “भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी के लिए नेताओं ने निकट और निरंतर विचार-विमर्श पर सहमति जताई है।”

समय आ गया है कि इस रणनीतिक साझेदारी को अगले स्तर पर ले जाया जाए। बड़ी शक्तियाँ कई गठबंधनों में साझेदार होती हैं और कई समूहों की सदस्य होती हैं। एक मध्यम शक्ति है ब्रिटेन लेकिन अपनी क्षमता से अधिक सक्रिय है वह।

ब्रिटेन नाटो, जी7, यूएनएससी में पी5, ऑकस तथा यूएस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा व न्यूज़ीलैंड के साथ फाइव आईज़ खुफिया सूचना साझाकरण गठबंधन का भी भाग है। भारत के गठबंधन अभी तक क्षेत्र-आधारित रहे हैं।

परंतु सार्क मूर्छित है, बिम्सटेक निष्क्रिय है और एससीओ पर चीन व रूस का दबदबा है, ऐसे में क्वाड ही आगे की दिशा दिखाएगा। क्वाड में भारत और यूएस, दो ही परमाणु शक्तियाँ हैं। दक्षिण चीन सागर में लगभग हर देश से पंगा लेकर बीजिंग चीन को भू-राजनीतिक रूप से एकाकी बनाता जा रहा है।

वियतनाम हो या फिलिपीन्स एवं इंडोनेशिया व प्रशांत क्षेत्र में दक्षिण में ऑस्ट्रेलिया, सभी से चीन की ठनी हुई है। सभी चीन के महत्त्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार हैं। इन कलहों का प्रभाव भू-आर्थिक क्षेत्र पर पड़ेगा जिसे अभी से चीन की धीमी होती जीडीपी वृद्धि दर में देखा जा सकता है।

निवेश बैंकों के बीच सहमति है कि 2023 और उसके आगे के वर्षों में चीन की जीडीपी 4.5 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। इस वर्ष की तीसरी तिमाही के लिए गोल्डमैन सैक्स ने चीन की तिमाही-दर-तिमाही वृद्धि के आँकड़े को 1.3 प्रतिशत से घटाकर 0 प्रतिशत कर दिया है।

इसी बीच अपेक्षा है कि महामारी के उपरांत के विश्व में 7.5 प्रतिशत की वार्षिक आर्थिक वृद्धि के साथ भारत उच्चतर पायदान पर पहुँचेगा। भारतीय नीति निर्माताओं के लिए चुनौती होगी कि वे इस आर्थिक वृद्धि को सैन्य एवं तकनीकी उन्नतीकरण में परिवर्तित कर पाएँ।

ऐसे में अनेक गठबंधन शक्तिशाली भू-राजनीतिक परिसंपत्तियाँ बनेंगे। नेहरू और वाजपेयी का ज़माना गया। अब भारत का लक्ष्य मात्र विश्व को प्रसन्न करना नहीं होना चाहिए। इसे एक ज़िम्मेदार एवं मज़बूत शक्ति की तरह व्यवहार करना चाहिए।

भारत की विदेश नीति में राष्ट्रीय हित को प्रथामिकता मिलनी चाहिए, फिर चाहे उसके लिए विश्व से पंगा ही क्यों न लेना पड़े। अब जब यूएस अपगानिस्तान से बाहर और चीन स्वयं को ही आर्थिक नुकसान पहुँचा रहा है तो भू-राजनीतिक स्थिति बदलने का अवसर भारत के पास है।

मिन्हाज़ मर्चेंट लेखक एवं प्रकाशक हैं।