रक्षा
ब्रिटिश विदेश मंत्री का भारत दौरा अपरिहार्य घटना को दिशा देने का प्रयास

19वीं शताब्दी के आरंभ में शक्ति के संतुलन तंत्र का सिद्धांत देने वाले ऑस्ट्रियाई राजनीतिज्ञ क्लेमेन्स वॉन मेटरनिक ने एक बार कहा था कि जिन घटनाओं को रोका नहीं जा सकता, उन्हें दिशा दे देनी चाहिए।

जब ब्रिटिश विदेश मंत्री लिज़ ट्रॉस 22 से 24 अक्टूबर के बीच अपने पहले व्यापार तरह के भारत दौरे पर आईं तो लगा कि वे इसी प्रकार के व्यवहारवाद में मानती हैं। वे कहाँ गईं, किससे मिलीं और उन्होंने क्या कहा, ये सब जानने के बाद आप इस बात को समझ सकेंगे।

क़तर के आमिर और प्रधानमंत्री से मिलने के बाद ट्रॉस दोहा से दिल्ली आईं। एक ओर मीडिया जहाँ उनकी गर्मजोशी पर ध्यान दे रहा था, वहीं उनके ट्वीट संक्षिप्त और सटीक दिखे। वे दोहा अफगानिस्तान में हुई घटनाओं के लिए गई थीं, जिसे विश्व भूलता हुआ दिख रहा है।

यह महत्त्वपूर्ण है और बताता है कि ब्रिटिशों ने उस सत्य को समर्पण कर दिया है जिसे रोका नहीं जा सकता क्योंकि अगस्त में काबुल पर नियंत्रण कर लेने से पहले क़तर ही तालिबान का राजनीतिक आधार रहा था।

दोहा से दिल्ली वे किन विशिष्ट संदेशों के साथ आईं थीं, यह हम नहीं जान पाएँगे परंतु उनके यात्रा कार्यक्रम से बहुत कुछ उजागर हो जाता है। इसी बीच ब्रिटेन का नवीनतम विमानवाहक पोत और रॉयल नेवी का ध्वज पोत क्वीन एलिज़ाबेथ मुंबई के बंदरगाह पर पहुँच गया।

यहाँ फिर से, ट्रॉस के ट्वीट संक्षिप्त थे जिनका अर्थ हुआ कि इन पोतों का भारत आना एक प्रतीक है कि वैश्विक मामलों में ब्रिटेन अपने प्रयासों के साथ प्रासंगिक बना रहना चाहता है। इससे रेखांकित हुआ कि चीन उसकी मुख्य सुरक्षा चिंता है और भारत के साथ सैन्य संबंधों को बेहतर करने की वह इच्छा रखता है।

वहीं, इसी समय, एक और दौरा हुआ ब्रिटेन के प्रथम सी लॉर्ड ऑफ दि एडमिरलटी टोनी राडकिन का, जो अपने समकक्ष एडमिरल करमबीर सिंह से दिल्ली में मिले। इस वरिष्ठ नौसैना अधिकारी ने ट्वीट किया, “अपने अच्छे मित्र के साथ मिलकर अच्छा लगा।”

टोनी राडकिन के साथ करमबीर सिंह

दिल्ली में ट्रॉस की मुख्य बैठक थी विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर के साथ। रायसिना हिल की प्रेस विज्ञप्ति कहती है कि उनका मुख्य विषय व्यापार था। यह ब्रिटेन के लिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यूरोपीय संघ से निकलने के बाद उन्हें भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ समान व्यापार समझौते करने होंगे।

फिर से मेटरनिक के अपरिहार्यता सिद्धांत को ट्रॉस के ट्वीट में देखा जा सकता है, “भारत हमारा अच्छा मित्र है, अर्थव्यवस्था का पावरहाउस और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। आने वाले दशकों में हमारा संबंध महत्त्वपूर्ण रहेगा।”

प्रासंगिक रूप से प्रेस विज्ञप्ति के चौथे अनुच्छेद में बहु-ध्रुवीय विश्व और बहुपक्षता की बात की गई है। अर्थ-संबंधी बातों को अलग रखकर भी यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे ब्रिटेन की ओर से वह स्वीकार्यता दोहराई जा रही है कि भारत किसी एक सैन्य गठबंधन (जैसे नाटो) तक सीमित नहीं रहेगा।

अफगानिस्तान के विषय में भी सामान्य शब्दाडंबर रहा लेकिन जब तक उस देश तक भूमि मार्ग बाधित रहता है, ये शब्द सिर्फ यह दर्शाते हैं कि भारत की सुरक्षा चिंताओं को ब्रिटेन पहचानता है।

ट्रॉस फिर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मिलीं। यदि प्रेस रिपोर्टों पर विश्वास किया जाए, तो आने वाले वर्षों में भारी मात्रा में ब्रिटिश निवेश भारत में अपेक्षित है। दिल्ली में वे अंततः केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्री भूपेंद्र यादव से मिलीं।

भारत में निवेश पर चर्चा करती हुईं ट्रॉस

ऊपर से देखने में लग सकता है कि आने वाले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कॉप26 से पहले सामूहिक प्रयास के लिए एक औद्योगिक पश्चिमी देश थोक में बैठक कर रहा है। यह वार्षिक अभ्यास विफल ही होता है जहाँ पश्चिम चाहता है कि निर्धन और विकासशील देश ऑक्सिडेंट के ग्लोबल वॉर्मिंग की भरपाई करें।

हालाँकि, पाठकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि यादव एक उभरते हुए सितारे हैं इसलिए हमें इस बैठक को ट्रॉस के दौरे की एक मुख्य राजनीतिक बैठक की तरह देखना चाहिए (भले ही यादव इसे नकारते हैं)।

यहाँ फिर से एक अपरिहार्यता दिखती है कि कुछ समय के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक मज़बूत राजनीतिक बल रहने वाली है। हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ब्रिटिश विदेश मंत्री का दौरा भू-राजनीतिक अपरिहार्यता की स्वीकार्यता को दर्शाता है।

यहाँ प्रयास किया जा रहा है यह दिखाने का कि भारत के हितों का सम्मान किया जाएगा, जबकि वास्तव में ब्रिटेन अपने हितों को साध रहा है। इस प्रकार हम पाते हैं कि प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन ने अपने विदेश मंत्री को भारत इसलिए भेजा था ताकि वे उस चीज़ को दिशा दे सकें जो होने वाला है।

यदि ऐसा ही है तो ब्रिटिश सरकार भारत के साथ व्यवहार में मेटरनिक की एक और बात को ध्यान रखे, “कोई भी योजना जो संतुलन में बनाई जाती है, वह विफल होती ही है, जब परिस्थितियाँ चरम पर हों।”

वेणु गोपाल नारायणन एक स्वतंत्र पेट्रोलिम कन्सल्टेन्ट हैं जो ऊर्जा, भूराजनीति, समसामयिक विषयों व चुनावी आँकड़ों पर दृष्टि रखते हैं। वे @ideorogueके नाम से ट्वीट करते हैं।