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इस्लाम और आतंकवाद के बीच सम्बंध की व्याख्या
Explosion

आज दुनिया के नेताओं का सामना जिस सबसे मुश्किल समस्या से है, वह इस्लामी आतंकवाद और घरेलू कट्टरता का ख़तरा है। हालाँकि इसके विश्लेषण का दायरा, इस समय उस विषाक्त और कर्कशता भरी घेराबंदी में फँसा दिखता है, जहाँ विषय से ज़्यादा उसकी उत्पत्ति के बारे में बात होती है। इस्लाम के भय, राजनीतिक रूप से सही लेकिन फ़िज़ूल की बातचीत, और पुरातनपंथी व बर्बर कृत्या के लिए अनुचित माफ़ी के बीच, शिराज़ माहेर की किताब ‘सलाफी-जिहादिस्म: द हिस्ट्री ऑफ़ एन आइडिया’ एक ताज़ी हवा के झोंके की तरह है। इस्लाम के तहत विश्वासों और रीति-रिवाजों की सम्पूर्णता को स्पष्ट करने के बजाय, माहेर ने अपने विश्लेषण को उस एक विचार तक सीमित रखा है, जिसने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने सबसे अधिक समस्यायें खड़ी की हैं-सलाफ़ी जिहाद।

माहेर का काम इंटरनैशनल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ रेडिकलाइज़ेशन, किंग्स कॉलेज, लंदन, में उनके शोध का परिणाम है, और निश्चित तौर पर इस शोध को उनकी दुर्लभ योग्यता से फ़ायदा हुआ है- शोधकर्ताओं में से वही इकलौते ऐसे सदस्य हैं, जो पहले एक पैन-इस्लामिक संगठन, हिज़्ब उत-तहरीर के भी सदस्य रह चुके हैं, जो शरीय क़ानून के सख़्त कार्यान्वयन और इस्लामी ख़िलाफ़त की स्थापना का समर्थन करता है। इसलिए स्रोत, बहस, भाषागत रचनात्मकता और चारित्रिक विशेषताओं की विश्लेषक के रूप में समझ तो उन्हें है ही साथ ही उन्हें ये सब कुछ पहले स्वयं ही करने का अनुभव भी है।

इस्लामिक विचारों का ऐसी नज़ाक़त से वर्णन किया गया है जो सार्वजनिक चर्चाओं की आम ख़ूबी तो नहीं ही रहा है। उदाहरण के लिए, लेखक सलाफ़ी मुस्लिमों को बाक़ी मुसलामानों के एक बड़े हिस्से से अलग करते हैं, और एक शांतिवादी हिस्से और हिंसक गुट के बीच अंतर को समझाते हैं। सलाफ़ी शब्द अरबी ‘सलाफ़’ से आया है, जिसका अर्थ-पहली तीन पीढ़ी के मुसलामानों से है। सलाफ़ी आज के समाज को इस्लाम के शुरुआती दिनों के समाज की ही तरह बनाना चाहते हैं।

संक्षेप में, जबकि सभी मुसलमान ज़रूरी नहीं कि आतंकवादी हों, सभी सलाफ़ी, पुरातनपंथी हैं। इसके बावजूद, सलाफ़ी होते हुए भी अहिंसक होना सम्भव है, जैसेकि सऊदी अरब के मुल्ला रहे हैं, ख़ासकर अल-सहवा अल-इस्लामिया आंदोलन। ये समूह अपने दुनियावी नज़रिये को लागू करने के लिए राज्य के संस्थानों से बातचीत की वकालत करता है, और कभी-कभी तो लोकतांत्रिक रास्तों का भी इस्तेमाल करता है।

माहेर के अध्ययन का विषय पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने वाले हिंसक सलाफ़ी हैं। अन्य मुस्लिमों से सलाफ़ी-जिहादी कैसे अलग हैं इसकी पाँच अवधारणायें हैं- जिहाद, तकफ़ीर, अल-वला’ वा-इ-बरा’, तौहीद और हकीमिया। इनमें से कुछ, जैसे कि तौहीद (ईश्वर की एकताद्ध) इस्लाम में आम है, लेकिन सलाफ़ी व्याख्या इसे मन्हाज (एक विधि जिससे सत्य तक पहुँचा जा सकता है) उससे  जोड़ती है। सलाफ़ियों के एक आदर्श, 13वीं शताब्दी के इस्लामिक विद्वान इब्न तैमिया के अुनसार, ईमान के बाद मुसलमानों की सबसे पहली बाध्यता, हमलावर दुश्मन को हराना है। इस तरह जेहाद तौहीद का एक अभिन्न अंग बन जाता है।

माहेर, जेहाद की अत्यंत आक्रामक ऐतिहासिक व्याख्या को प्रस्तुत कर, जो कि मुहम्मद साहब के समय से ही शुरू हुई, इस तर्क को ध्वस्त कर देते हैं कि जिहाद का अर्थ ख़ुद की अंदरूनी लड़ाई से है। उनके तर्कों की पहुँच से उन लोगों के प्रयास भी बेमाअनी हो जाते हैं, जो इस्लाम के नाम पर आतंक फैलाने वालों से इस्लाम को अलग करना चाहते हंै।

आतंकवाद के कृत्यों को बार-बार इस्लामी न्यायशास्त्र और शास्त्रों की दुहाई देकर उनका पक्ष रखा जाता है। नतीजतन, ऐसे लेखकों के लिए मध्य-पूर्व और मध्य एशिया में हो रही हिंसा को इस्लाम से अलग करने वाले नज़रिये से चिपके रहना और कठिन हो जाता है। लेखक की बुद्धिमानी यह है कि वह एक विशिष्ट दृष्टिकोण को सही साबित करने पर नहीं अड़े हैं – उन्होंने इसे धर्मशास्त्रियों और दार्शनिकों के लिए छोड़ दिया है। इसकी जगह, वह केवल तौहीद और जिहाद के बीच के उदाहरणों और ऐतिहासिक, न्यायिक, विचारधारात्मक और राजनीतिक सम्बंधों की पड़ताल करने तक ही सीमित रहे हैं।

साथी मुसलमानों के प्रति जिहादियों की हिंसा को तकफ़ीर द्वारा समझाया गया है, जिसके द्वारा एक मुस्लिम को इस्लाम के माआशरे से बाहर घोषित किया जाता है। सलाफ़ी जिहादियों के लिए सामान्य नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा तकफ़ीरी है- जिनमें, धर्मनिरपेक्षतावादी, लोकतांत्रिक, राष्ट्रवादी, बाथिस्ट और कम्युनिस्ट शामिल हैं। शिया मुसलमान तो ख़ासकर इस्लाम के शाश्वत शत्रु हैं, जोकि सफ़ाविदों के माध्यम से अली से जुड़े हुए हैं। तकफ़ीर, जैसा कि माहेर बताते हैं, सारी बहस को बंद कर विश्वास को एकीकृत करती है।

फिर भी ऐसा क्या है जो कुछ सलाफ़ी-जिहादियों को इतना क्रूर बना देता है। उदहारण के लिए, उन्होंने जॉर्डन के पायलट को जलाया क्यों ? जबकि क़ुरान में स्पष्ट उल्लेख है कि सज़ा के लिए आग का इस्तेमाल केवल ईश्वर पर छोड़ दिया जाना चाहिए। माहेर का कहना है कि इसका जवाब ‘क़िसा’ यानी समान प्रतिशोध के क़ानून की सलाफ़ी व्याख्या में पाया जा सकता है। वह बताते हैं, कि कैसे पश्चिम को, अत्याचारी या अपर्याप्त रूप से इस्लामिक सरकारों के मुस्लिमों पर शासन करने में अपनी भूमिका के कारण, पूर्णतया दुश्मन माना जाता है। इसके अतिरिक्त चूँकि पश्चिमी सरकारें लोकतांत्रिक हैं, और उनकी नीतियाँ, उनके लोगों की सहमति दर्शाती हैं, इसलिए उनके नागरिक भी एक इस्लामी विश्व व्यवस्था के लिए होने वाले संघर्ष में जायज़ शिकार हैं।

अल-वला’ वा-अल-बर’ के साथ जुड़ने से, सलाफ़ी समझौता करने में असमर्थ सम्प्रदाय बन गये हैं। यह अरबी सिद्धांत, वफ़ादारी और इन्कार, मुसलमानों और अन्य के बीच स्पष्ट विखंडन की अनुमति देता है। चूँकि ‘अन्य’ के साथ किसी भी तरह की समझ या सह-अस्तित्व से तकफ़ीर का इल्ज़ाम लग सकता है, सलाफ़ी-जिहादी अपने विश्वास की शुद्धता को बनाये रखने में सक्षम हैं।

अंत में, ‘हकीमिया’ ने ईश्वर के लिए राजनीतिक सम्प्रभुता हासिल करने की माँग की है। प्रभावी रूप से, यह कुफ़्फ़ारों के खिलाफ सलाफ़ी-जिहादियों को एक कभी न ख़त्म होने वाली जंग में लड़ाता है। उनके दीन की भी कोई हद हो सकती है और दूसरों के साथ सह-अस्तित्व-चाहे वो केवल अहले अल-किताब-लोग ही क्यों न हों, जैसे कि यहूदी या ईसाई, सार्वभौमिक विश्वास वालों के लिए ये सोच पाना भी असम्भव है। यह कोई संयोग नहीं है कि उपनिवेशवाद के नकारात्मक अनुभव, आधुनिकता को थोपने और शीत युद्ध के गठबंधनों ने पश्चिम के खिलाफ़ असंतोष की आग को बढ़ाने का ही काम किया है।

किसी भी सिद्धांत का वास्तविक परीक्षण तब होता है, जब वह हक़ीक़त से मिलता है, और माहेर सबसे पहले स्वीकार करते हैं कि युद्ध के मैदान में बदलती परिस्थितियों में कई सलाफ़ी सिद्धांत विकसित हो रहे हैं। सिद्धांतवादियों और व्यवहारियों के बीच एक विभाजन पैदा होता सा दिखता है, हालाँकि आतंकी गुटों के बीच ऐसा कुछ नहीं है। इस स्थिति की विडम्बना है, जैसा कि लेखक बताते हैं, कि बिदा’ या नवाचार से धार्मिक शुद्धतावादी बुरी तरह नफ़रत करते हैं।

‘सलाफ़ी-जिहाद’ पढ़ते वक्त, गहराई से असहज हो जाना बहुत मुश्किल नहीं है कि सलाफ़ी जिहाद इस्लामिक रेफोर्मेशन जैसा दिखता है। माहेर के बड़े इस्लामिक विद्वानों के बीच होने वाली उग्र बहसों के उदाहरण, जॉन केल्विन की जेनेवा की याद दिलाते हैं, और याद आता है कि इसके बाद के सौ वर्षों में क्या हुआ। यह उन लोगों के लिए बुरी ख़बर है, जो कि इस्लाम में उदारवादी सुधारों को इस्लाम के भीतर से होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

शायद एक पहलू जिससे उस सवाल का जवाब मिल जाता है, जिस पर पढ़ते वक्त पाठकों का ध्यान जायेगा – कि किस बिंदु पर शांतिवाद का जिहाद में परिवर्तन होता है। इसके अलावा स्थितरता और सुरक्षा के संदर्भ में- उन अंतर्राष्ट्रीय समुदायों पर जो कि कट्टरपंथी लेकिन शांतिवादी इस्लामी राष्ट्रों के साथ हैं, उन पर इसके क्या प्रभाव होंगे? वामपंथियों के सार्वभौमिक और हस्तक्षेपवादी आवेगों और इन राज्यों के बीच संघर्ष तो अनिवार्य है, ख़ासकर अतंराष्ट्रीय सम्बंधों में आये हालिया परिवर्तनों की वजह से, रक्षा का अधिकार जिनमें से एक है।

‘सलाफी-जिहादिस्म’ में सहजता और विद्वता का अच्छा संतुलन है, ये सामान्य पाठक और विशेषज्ञों, दोनों को ही पसंद आयेगी। लेखक द्वारा निरंतर क्रूरता और हिंसा को बढ़ावा देने में इस्लाम के यद्यपि केवल एक हिस्से की ही भूमिका का कठोर और ईमानदार मूल्यांकन, इसे हमारे समय के संकट के बारे में बेहतर जानकारी चाहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक अनिवार्य पुस्तक बनाता है।