पुस्तकें
पुस्तक समीक्षा- एक नए दृष्टिकोण से रोचक इतिहास के लिए ‘मंथन का सागर’

संजीव सान्याल द्वारा लिखित पुस्तक द ओशियन ऑफ़ चर्न  हिंदी में मंथन का सागर  नाम से उपलब्ध है जिसका अनुवाद शुचिता मीतल ने किया है। इस पुस्तक की सबसे विशेष बात यह है कि यह हमें इतिहास को एक नए दृष्टिकोण से दिखाता है। प्रायः इतिहास भू-राजनीति पर आधारित होता है जिसका विशेष ध्यान जनता की बजाय मात्र युद्धों और राजाओं पर होता है लेकिन यह पुस्तक हिंद महासागर की दृष्टि से लिखी गई है जो आम लोगों पर भी उतना ही ध्यान देती है जितना कि शासकों पर। इस पुस्तक के पीछे किए गए परिश्रमी शोधकार्य का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें कई ऐसे व्यक्तियों और घटनाओं का उल्लेख है जिन्हें इतिहास भुला चुका है।

पुस्तक मानव जाति के उद्गम से शुरू होती है और हमें यह तक बताती है कि दक्षिण-पूर्वी एशिया में लोग कब और कैसे बसे। इस बात को समझाने में अनुवांशिक (जेनेटिक डाटा) का भी उपयोग किया गया है। पाषाण युग के लोगों के कौशल के बारे में बताते हुए लेखक यह भी कहते हैं कि इतने प्रतिभावान लोगों के काल के लिए ‘पाषाण युग’ जैसे शब्द का प्रयोग कर इतिहास इन्हें कमतर आँकता है। लेखक उन दाँवों का भी खंडन करते हैं जो यह कहते हैं कि घोड़ों का प्रयोग करना भारतीय बाद में सीखे थे। लेखक बताते हैं कि सिंधु सभ्यता की बजाय हमें इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता कहना चाहिए क्योंकि ये समकालिक हैं व सरस्वती वही नदी है जिसे आज लोग घग्घर के नाम से जानते हैं। यहाँ तक कि वे यह दावा भी करते हैं कि सिंधु से अधिक मानव बस्तियाँ सरस्वती के किनारों पर थी। लेखक बताते हैं कि जिस संगम साहित्य का उपयोग कुछ लोग अलगाववाद के लिए करते हैं, उसमें भी सिंधु सभ्यता का उल्लेख है। 1819 में भूकंप के बाद नदियों के बदले रास्ते के विषय में भी वे बताते हैं जिससे पूर्व बस्तियों को खोजने में परेशानी हुई।

भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों का संबंध मात्र व्यापार आधारित ही नहीं था अपितु संबंध आधारित भी था जिसमें कभीभारत में जन्मे व्यक्ति ने वहाँ राज किया और कभी वहाँ से संबंध रखने वाले व्यक्ति ने भारत में। और यह सब संभव हुआ हिंद महासागर के रिम पर पाई जाने वाली मातृवंशी परंपरा के कारण जहाँ राजा भले ही पुरुष हो लेकिन वह अपने मातृवंश के राज्य का उत्तराधिकारी होता था। ये परंपरा निस्संदेह समाज में महिलाओं की अच्छी स्थिति की ओर संकेत करती है। इस क्षेत्र में भारत के आर्थिक संबंध का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ओमान, क़तर, बहरीन और यूएई में 1960 के दशक तक भारतीय रुपया मान्य था।

तटीय क्षेत्रों की समुद्री यात्रा पर जाने की परंपरा को आज भी कटक में मनाए जाने वाले बाली यात्रा नामक उत्सव और कई लोकगीतों से समझा जा सकता है। समुद्री व्यापार केवल शासकों के समर्थन पर आधारित नहीं था परंतु उस काल में मंदिर बैंकों की तरह सहायता करते थे जो व्यापारियों को ऋण देने का दायित्व भी उठाते थे। इन व्यापारियों के अच्छे नेटवर्क व वित्तीय ढाँचे को देखते हुए लेखक इन्हें बहुराष्ट्रीय व्यापार संघ की उपाधि देते हैं।

हिंद महासागर के दुर्लभ मसालों से व्यापार से शुरू होकर कैसे औपनिवेशिक ताकतों ने अपना आकार लिया इसपर भी लेखक ने गहरी जानकारी दी है। अपने लाभ के लिए क्रूरता से भी बाज़ न आने वाले यूरोपियों की काली करतूतों को भी लेखक ने उजागर किया है। इतना ही नहीं बौद्धिक संपदा का नाटक करने वाले उपनिवेशियों ने कैसे भारतीय उपमाहद्वीप की तकनीकों को चुराकर लाभ उठाया इसपर भी लेखक प्रकाश डालते हैं। दोनों विश्व युद्धों की कठिन राजनीति को लेखक ने बेहद आसान शब्दों में समझाया है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हुए लेखक ने उन सैनानियों और विद्रोहियों के भी किस्से बताए हैं जो मुख्यधारा की चर्चा का विषय नहीं रहे हैं।

आमतौर पर कहा जाता है कि इतिहास व्यक्ति निर्धारित नहीं होता लेकिन लेखक ने ऐसे कई उदाहरण दिए हैं जहाँ किसी एक व्यक्ति के साहस, छोटी सी गलती या फिर व्यक्तिगत मतभेदों के कारण आज हम कोई और ही इतिहास पढ़ते हैं, चाहे वे राजा मार्तंड वर्मा हों, भारतीय व्यापारी नरोत्तम हो या जर्मन एजेंट वासमस। हीरे और सोने की खदानों के मिलने के बाद अफ्रीका ने कैसे यूरोपीय देशों का ध्यान खींचा यह भी बताया गया है।

अंततः लेखक सभी देशों की उपनिवेशों से स्वतंत्रता के बाद उनके द्वारा की गई प्रगति का एक लघु विवरण देते हैं जिसमें वे नेल्सन मंडेला व सिंगापुर के ली कुआन यू की विशेष प्रशंसा करते हैं और बॉम्बे से मुंबई बनने के सफर को भी बताते हैं। साथ ही वे इन देशों की शांति व समृद्धि के प्रति प्रसन्नता व्यक्त करते हुए यह भी कहते हैं कि इतिहास की घटनाएँ अधिकंश रूप से अप्रत्याशित होती हैं व इस शांति की डोर अभी तक नाज़ुक प्रतीत होती है।

कुल मिलाकर यह पुस्तक अत्यंत रोचक है वअपनी दिलचस्प कहानियों से पाठक को बांधकर रखती है। और साथ ही ऐसे इतिहास का विवरण देती है जो किसी पूर्वाग्रह पर आधारित नहींं व एक नए दृष्टिकोण से हमें इतिहास पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।