पुस्तकें
मुन्ना के माध्यम से बाल यौन शोषण के मुद्दे को उठाती हुई पुस्तक गहरी और मनोरंजक

मेरी दृष्टि में किसी उपन्यास का उद्देश्य मनोरंजन नहीं है। काल्पनिक कहानियों से मनोरंजन तो सिनेमा भी दे सकता है, साहित्य कुछ विशेष होना चाहिए, कुछ ऐसा जो मानव को और मानवीय बनाए, दूसरों की संवेदनाओं के प्रति संवेदनशील करे और मनीष श्रीवास्तव की मैं मुन्ना हूँ ऐसा करने में सफल हुई है।

बाल यौन शोषण के मुद्दे को उठाती हुई यह पुस्तक सिर्फ इस मुद्दे को छूकर नहीं निकलती परंतु अपने साथ इस विषय को निरंतर लिये चलती है, कभी इसमें डुबाती है, कभी इससे उबारती है। शुरुआत में निरंतर ऐसी घटनाओं से यह पुस्तक बेचैन करती है लेकिन उपन्यास के चरित्रों के माध्यम से ही इस विषय पर गंभीर चर्चा भी प्रस्तुत करती है।

यह चर्चा सिर्फ मानसिक या वैचारिक स्तर तक नहीं है, कुछ संवाद हृदयस्पर्शी भी हैं और साथ ही जो लोग बाल यौन शोषण का शिकार हुए हैं, संभवतः उन्हें इस पुस्तक के साथ रोकर अपनी टीस निकालने का अवसर भी मिलता होगा और एक संदेश भी। संदेश यह कि अपने भीतर जब तक रखोगे, वह टीस दबेगी तो सही लेकिन बार-बार उठेगी भी, स्थाई समाधान के लिए क्या करना है, वह आप पुस्तक पढ़कर समझिए।

बाल यौन शोषण के अलावा माता-पिता के त्याग और बलिदान के प्रति भी यह संवेदनशील करती है। एक आम व्यक्ति की तरह मुन्ना को भी जवानी के जोश में इसका अहसास नहीं होता है लेकिन समय के साथ वह समझ जाता है परंतु संभवतः इस पुस्तक को पढ़कर आप समय से पहले समझ सकें।

तीसरा मुद्दा जो इस पुस्तक में है, वह है प्रेम। पुस्तक में दिखाया गया है कि समय के साथ जैसे-जैसे हमारा व्यक्तित्व बदलता है, हमें अलग-अलग प्रकार के प्रेम की आवश्यकता महसूस होती है। इस अलग प्रेम के लिए हम जो रिश्ते बनाते हैं, वे कई बार ऐसे होते हैं जिन्हें नाम नहीं दिया जा सकता और ऐसे रिश्ते अपेक्षा और वास्तविकता में पिसते चले जाते हैं या हमें पीसते जाते हैं, यह विचार का विषय है।

मुन्ना के स्कूल-कॉलेज के दिनों में उसकी और उसके दोस्तों की कई ‘एडवेंचरस’ कहानियों के लिए भी आप यह पुस्तक पढ़ सकते हैं और रोमांच की अनुभूति भी कर सकते हैं लेकिन आदर्शवादी व्यक्ति होने के कारण मुझे यह भाग नहीं रुचा। लेकिन विशेष बात यह है कि मुन्ना की मित्रता सिर्फ मस्ती-मज़ाक वाली नहीं थी, जीवन के कठिन पहलुओं पर साथ देने वाली थी।

चौथी और इस पुस्तक की सबसे विशेष बात है कि वह एक आम व्यक्ति के लिए ईश्वरीय और आध्यात्मिक अनुभूतियों का मार्ग खोलती है। जब भी मुन्ना गिरने वाला होता है तो उसे उठाना वाला कोई होता है और जब वह संभल जाता है तो उसे छोड़ भी दिया जाता है जीने के लिए जैसे इस संसार का हर व्यक्ति जी रहा है।

पुस्तक में धार्मिक स्थलों और पौराणिक कथाओं का भी बड़ा रोचक विवरण है। मुन्ना के साथ कई घटनाएँ ऐसी होती हैं जो साधारण नहीं है, लोगों को यह वास्तविकता से भिन्न भी लग सकती है लेकिन मुझे यह मात्र वास्तविकता का नाटकीय रूपांतरण लगा। यदि आप दैवीय शक्तियों पर विश्वास रखते हैं तो ये घटनाएँ आपको खटकेंगी नहीं।

मुन्ना का चरित्र कोई आदर्शवादी नहीं है, उसने दुनिया भर के कुकर्म किए हैं लेकिन फिर भी उसके चरित्र के मूल में कुछ मूल्य हैं जिन्हें लेखक हमेशा संरक्षित रखते हैं और ये मूल्य ही मुन्ना को गिरकर उठने का साहस दे पाते हैं। खोखले मनुष्य के बस की बात नहीं है कि वह इतनी ठोकरों के बाद उठ सके, मुन्ना के भीतर कुछ ठोस है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

अन्य पात्रों का चरित्र लेखन भी काफी स्पष्टता के साथ किया गया है और एक ही व्यक्ति कैसे अलग-अलग समय-स्थान पर अलग बन जाता है, वह भी दर्शाया गया है। मुन्ना के प्रेम प्रसंग रोचक तो हैं लेकिन कुछ बातें मुझे समझ नहीं आईं। मुन्ना पर पुस्तक केंद्रित होने के कारण लेखक उसकी पत्नी के चरित्र लेखन के साथ न्याय करते नहीं दिखे मुझे।

बड़ी ही सरल, स्पष्ट, रोमांचक और आम बोल-चाल की भाषा में लिखी गई यह पुस्तक आपको स्वयं से बांधे रखती है। घटनाओं को आँखों के समक्ष चित्रित करने में भी यह सफल हुई है। यदि आप काल्पनिक पात्रों के माध्यम से जीवन के कुछ रहस्यों, कुछ मानवीय भावों, कुछ मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझना चाहते हैं तो आपको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

मनीष श्रीवास्तव की पुस्तक ‘मैं मुन्ना हूँ’ नोशन प्रेस  और अमेज़ॉन पर उपलब्ध है।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।