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दि आइडल थीफ पर आधारित एक सच्ची कहानी

प्रसंग
  • एस विजय कुमार और स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं की उनकी टीम भारत से चोरी हुई मूर्तियों को वापस हासिल करने की एक पहल का हिस्सा हैं जिसमें कुछ कामयाबियां हासिल हुई तो कुछ नाकामियाँ हाथ लगीं।
  • दि आइडल थीफः दि ट्रू स्टोरी ऑफ दि लूटिंग ऑफ इंडियास टेंपल्स, भारत के खोए हुए गौरव को फिर से हासिल करने के एक अविश्वसनीय प्रयास का अभिलेख है।

जब आप तमिलनाडु में चोलों द्वारा निर्मित करीब 1000 साल पुराने मंदिर में जाते हैं तो वहाँ की सांस्कृतिक प्रकृति और आध्यात्मिक माहौल को अनुभव करने से आप बच नहीं सकते।  जब आप मंदिर की परिक्रमा करते हैं तो आप यहाँ पर स्थित मूर्तियों की नक्काशी को देखकर अचंभित हो जाते हैं, उदाहरण के लिए कोस्टा मूर्तिकला से बनी अर्धनारीश्वर की मूर्ति (शिव का व्युत्पन्न रूप) की पूजा करने के बाद ही आगे बढ़ते हैं। हालांकि, कुछ दशकों के बाद आपको पता चला कि जो मूर्ति आपने देखी थी जिसका गुणगान किया था और पूजा भी की थी वह असली नहीं थी बल्कि स्थानीय रूप से बनाई गई एक नकली मूर्ति थी। असली मूर्ति तो ऑस्ट्रेलिया के एक संग्रहालय में रखी हुई है।

अचंभा हुआ ?

लेकिन यह तमिलनाडु के कडलूर जिले के वृद्धाचलम अर्धनारीश्वर की असली कहानी है। यह केवल एक मूर्ति की कहानी नहीं है। बल्कि यह श्रीपुरंदन के गणेश, नटराज और उमा और  सूथामल्लि के शिवकामी की कहानी है।

और अचंभों के लिए हो जाइये तैयार

हालांकि, सदमे, दर्द, पीड़ा और निराशा की यह भावनाएं उन मुट्ठी भर लोगों की कृतज्ञता और प्रशंसा की गहरी समझ के साथ समाप्त हो जाएंगी जो इस कुख्यात अपराध को रोकने के लिए सभी बाधाओं के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं । एस विजय कुमार ऐसे ही एक स्वयंसेवक हैं, जो दिन में एक शिपिंग और वित्त कंपनी के कार्यकारी अधिकारी हैं तथा रात में एक सुपर हीरो।

इंटरनेट के माध्यम से वह और उनके स्वयंसेवक साथी, ‘इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट’ नाम का एक छोटा सा समूह चलाते हैं जो प्रतिष्ठित संग्रहालयों में, पाँच सितारा होटलों की लॉबियों में और प्राचीन कलाकृतियों के संग्राहकों के बैठक कक्षों में स्थित भारत से चोरी किए गए खजानों का पता लगाते हैं।

अभिलेखों को वास्तविक रखते हुए विजय कुमार अपनी पुस्तक दि आइडल थीफः दि ट्रू स्टोरी ऑफ दि लूटिंग ऑफ इंडियास टेंपल्स, में अर्धनारीश्वर की कहानी का जिक्र करते हैं। एक अकल्पनीय रहस्य वाली यह कहानी शुरू होती है आक्रमणों के समय से. कैसे हमारे पूर्वज पवित्र मूर्तिंयों को आक्रमणों के दौरान बचाते थे और देवताओं की मूर्तियों के ठिकाने के बारे में पूछे जाने पर वे किस प्रकार यातनाओं को सहन करते थे। वे इन देवताओं को जमीन में खोदे गए गड्ढों में या कुशलता से बनाए गए गुप्त कक्षों में छिपाते हुए अपने इष्टतम देवता से अनुग्रह करते हैं कि “हे मेरे भगवान जब तक आपकी इच्छा हो तब तक आप सुरक्षित रहना।”

विजय कुमार कहते हैं, 12वीं शताब्दी की इन आक्रमणकारी घटनाओं से भावनात्मक रूप से जुड़े होने की वजह से हम वर्तमान में आ गए हैं- तमिलनाडु में नहीं बल्कि दूरस्थ न्यूयॉर्क में, जहाँ संग्रहालयों तथा अत्यधिक अमीर लोगों के यहाँ से मूर्तियों की चोरी करने और तस्करी करने का जाल रचा जा रहा है। इस सच्ची कहानी में सबसे दुखद बात यह है कि जो लोग इस षड्यंत्र में बाहरी लोगों के साथ शामिल हैं और चोरी के पीछे जिनकी बुद्धि काम कर रही है, वे सभी भारतीय हैं।

वह कहते हैं कि इससे भी ज्यादा दुखद यह है कि जिस तरह तमिलनाडु के मदिरों के प्रबंधन बनाये गए हैं, वह मूर्ति चोरी के लिए सटीक बैठते हैं.  उदाहरण के लिए, 1993 के संशोधन में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 380 में तमिलनाडु विधायिका ने घरों में चोरी करने वालों के लिए सात साल की जेल की सजा घोषित की लेकिन मंदिरों में चोरी करने के अपराध में अधिकतम तीन साल की सजा तथा केवल 2,000 रूपए का जुर्माना घोषित किया।

इसी तरह आर्थिक अपराध शाखा के अंतर्गत चल रही मूर्ति शाखा सभी इकाइयों में से सबसे कम पोषित है क्योंकि यहाँ पर स्थानांतरण एक त्याग की तरह है और इसे दंड के रूप में देखा जाता है.

अगर यह मामला पुलिस और कानून के साथ हो, तो हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटी एंडोमेंट बोर्ड एक ऐसा विभाग प्रतीत होता है जो मूर्तियों और शिलालेखों के उचित दस्तावेज़ीकरण के बारे में कुछ भी परवाह नहीं करता है। इन सभी ने एक साथ तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों और उनके आध्यात्मिक / सांस्कृतिक खजाने को दुनिया के ‘कला संग्रहकर्ताओं’ का एक आसान स्थल स्थापित करने में योगदान दिया है।

विजय कुमार ने खुलासा किया है कि चोरों का गिरोह बहुत ही कार्यकुशल है। यह पढ़े ल्लिखे लोगों द्वारा कार्यान्वित किया जाता है जो तस्करी योग्य कलाकृतियों (मूर्तियों या शिल्पकृतियों) के लिए आवश्यक कागजी खानापूर्ति करते हैं। जिसमें रसीदों और अभिलेखों के द्वारा साबित किया गया होता है कि ये कलाकृतियां 1972 से पहले प्राप्त की गईं हैं। 1972 ही क्यों? लेखक इसका कारण बताते हैं कि 100 वर्ष से पुरानी कोई वस्तु, जिसे 1972 से बाद भारत के बाहर ले जाया गया हो, को बिना किसी मुआवजे के भारत को वापस करना होगा।

जब विजय कुमार एक मूर्ति का पता लगाकर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि वे 1972 के बाद भारत में मौजूद थे, तो विपक्षियों द्वारा उनकी बात को झूठी साबित करने की कोशिश की जा रही है। यह देखना आश्चर्यजनक है कि जो लोग एशियाई और अफ्रीकी देशों को खुलेआम लूट रहे थे उन्होंने अब अपनी चोरी छिपाने वाले दस्तावेजों के माध्यम से स्वयं को ‘शिष्टֺ’ व्यक्ति साबित कर दिया है।

जिस तरह से नेशनल गैलरी ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया ने शिव की मूर्ति को वापस लाने के भारतीयों के प्रयासों पर पानी फेरा, वह यह बताता है कि औपनिवेशिक लुटेरे अभी भी अच्छे कपड़ों में, परिष्कृत पश्चिमी विद्वानों और पूर्वी कला के गुणकों के रूप में जिंदा हैं.

इन मूर्ति चोरों के वर्तमान गिरोह का केन्द्र बिन्दु सुभाष है जिसका खुलासा हो गया है। भारत में कपूर और उसके निचले स्तर के साथियों के गिरोह कलाकृति विक्रेताओं आदि के रूप में कार्य कर रहे हैं। संजीवी असोकन, दीनदयाल, आदित्य प्रकाश, शंतू और केदार बत्चा जैसे लोगों को तो किताबों में बाकायदा नाम छापकर शर्मिंदा किया जा चुका है.

एक दोस्त ने पुस्तक पढ़ते हुए सोचा कि क्या हम मंदिरों में रहने वाले देवताओं को देखने वाली आखिरी पीढ़ी थे क्योंकि आत्मघाती स्वार्थपरता में समाज अपने ही मंदिरों को लूट रहा है और मानसिक विकृति के साथ अपने देवताओं एवं देवियों को बेच रहा है।

उम्मीद की चमक एक निःस्वार्थ समूह के सहयोग में निहित है, इसके लिए इंटरनेट को धन्यवाद। विजय कुमार अपनी इंटरनेट-आधारित इंडिया प्राइड परियोजना के साथ-साथ अपने बेहद लोकप्रिय और विद्वत्तापूर्ण ब्लॉग ‘पोएट्री इन स्टोन’ (पत्थर में कविता) के माध्यम से मूर्तियों को दस्तावेज करने और उनकी उपस्थिति एवं सुरक्षा की बारीकी से निगरानी करने के महत्व पर जागरुकता पैदा कर रहे हैं।

उनकी पुस्तक अमेरिका के एक असाधारण अधिकारी ‘इंडी’, जिनके वास्तविक नाम का खुलासा नहीं किया जा सकता है, के बारे में बताती है। यह वह व्यक्ति थे जिन्होंने पृथ्वी के दूसरे भाग पर इन मूर्ति चोरों को पकड़ने के लिए कड़ी मेहनत की थी। चीज़ों के तार्किक निष्कर्ष पर आने से पहले उन्हें फिर से यह काम सौंपा गया. विजय कुमार ‘इंडी’ की बात एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करते हैं, ‘मुझे पता है कि जो भारतीय विरासत और संस्कृति के बारे में भारतीयों की तुलना में अधिक गहराई से समझता है और उनकी परवाह करता है।’

यह पुस्तक आपको दर्द, शर्म और पीड़ा से भर देती है, जिसमें पाठक विजय कुमार की जीत के साथ स्वयं को आत्मिक रूप से संबद्ध करते हैं और साथ ही साथ उनके द्वारा सही गयी प्रत्येक असफलता की पीड़ा को भी महसूस करते हैं। पुस्तक सांस्कृतिक विनाश का एक रिकॉर्ड है जिसमें हर पीड़ित, गद्दार और सहयोगी के रूप में कार्य भी करता है।

क्या हमारे देवताओं की रक्षा करने के लिए हमारे पूर्वजों का विशाल बलिदान व्यर्थ हो गया है? जिन देवताओं को हम देने के लिए तैयार हैं वे ऐसे देवता हैं जिनके द्वारा हम अपनी सांसारिक मांगों को पूरा करना चाहते हैं।

हमारे पूर्वजों के अंदर जलायी गयी आग शायद विजय कुमार जैसे स्वयंसेवकों के अंदर फिर से प्रज्वलित हो गयी है। जो किताब के अंत की ओर इशारा करते हुए मूर्तियों के बरामद होने का इंतजार करते हैं, “हे मेरे भगवान जब तक आपकी इच्छा हो तब तक आप सुरक्षित रहना।”

यह पुस्तक भारत की पीड़ा को शब्दों के माध्यम से बयां करती है. कोशिश करें कि आपके दिल को भी यह सुनायी दे।

अरविंदन स्वराज्य के सहायक संपादक हैं।