पुस्तकें
जुगलबंदी— वाजपेयी-आडवाणी के माध्यम से भारतीय राजनीति को समझाने वाली पुस्तक

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन और आपसी तालमेल पर केंद्रित विनय सीतापति की पुस्तक जुगलबंदी- भाजपा मोदी युग से पहले दोनों राजनेताओं के जन्म से उनके राजनीतिक जीवन के अंत तक की यात्रा पर ले जाती है।

जब दोनों राजनेताओं का वैचारिक आधार बन रहा था और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से वे जुड़ रहे थे तब कहानी को इतने रोचक ढंग से आकार दिया गया है कि आप अंतर नहीं कर सकते कि आप उपन्यास पढ़ रहे हैं या वास्तविक घटनाओं पर आधारित पुस्तक।

पुस्तक अपने शीर्षक “जुगलबंदी”, जिसका मूल अर्थ भारतीय शास्त्रीय संगीत में दो कलाकारों की एक-साथ प्रस्तुति होता है, परंतु प्रचलित रूप से दो व्यक्तियों के तालमेल के लिए उपयोग में लाया जाता है, पर टिकी रहकर वाजपेयी-आडवाणी के आपसी संबंधों पर हर परिस्थिति में प्रकाश डालती है।

इन संबंधों में घनिष्ठता है, आपसी प्रेम, एक-दूसरे के गुणों के प्रति सजगता, संवेदनशीलता और गर्मजोशी तो है ही लेकिन राजनीतिक जीवन के उतार-चढ़ावों का प्रभाव आपसी संबंध पर कैसे पड़ा यह जानने के लिए आपको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

एक बात जो इस पुस्तक में बार-बार उठाई गई है, वह है कि संगठन की शक्ति पर आरएसएस का ज़ोर इन दोनों राजनेताओं के मस्तिष्क पर ऐसी छाप छोड़ गया कि विपरीत परिस्थितियों में भी इन्होंने न संगठन से विद्रोह किया, न आपसी मतभेद को सार्वजनिक रूप से उजागर किया।

इसी संगठन पर ज़ोर को भाजपा की चुनावी विजय के प्रमुख कारणों में से एक बताया गया है तथा इसी सिद्धांत का लाभ उठाकर वाजपेयी अपने प्रतिद्वंद्वियों को दरकिनार करने में कैसे सफल हुए, ये घटनाएँ भी रोचक ढंग से लिखी गई हैं। आडवाणी के सरल व्यक्तित्व के साथ पुस्तक न्याय करती है।

वाजपेयी की वाक्पटुता, संसद का मत भाँपने का कौशल, अपने विचार पर किसी सीमा तक ही टिकना और फिर सर्वसम्मति के साथ हो जाना, विशेषज्ञों पर विश्वास करना, विचारधारा से अधिक व्यावहारिकता पर ज़ोर और उदारवाद जैसे गुण बताए गए हैं।

वहीं आडवाणी के व्यक्तित्व में आत्म-विश्वास घटने और बढ़ने की घटनाओं को उनके व्यवहार में परिवर्तन के साथ जोड़कर स्पष्ट दृश्य दिखाने में पुस्तक सफल हुई है। सत्ता में रहने के बजाय सत्ता के बाहर रहने पर दोनों राजनेताओं की जुगलबंदी बेहतर होने का संकेत भी पुस्तक देती है।

इस बात को भी रेखांकित किया गया है कि संभवतः वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी विश्व की एकमात्र ऐसी राजनीतिक जोड़ी होगी जिसके दोनों पात्रों का पदानुक्रम कई बार बदला, कभी वाजपेयी ऊपर रहे, कभी आडवाणी लेकिन फिर भी दोनों ने परस्पर सम्मान बनाए रखा।

पुस्तक पढ़ते हुए लगता है कि एक-एक अध्याय को “हर अंत एक नई शुरुआत है” के सिद्धांत पर लिखा गया है। हर अध्याय ऐसी रोचक घटना के उल्लेख के साथ समाप्त होता है कि आप अगला अध्याय भी तुरंत ही पढ़ना चाहते हैं। वास्तविक घटनाओं को रोचक ढंग से लिखने के मामले में सीतापति संजीव सान्याल को टक्कर देते हैं।

हालाँकि, पुस्तक का पूर्वार्ध ही अधिक रोचक रहा क्योंकि उत्तरार्ध में जिन घटनाओं का उल्लेख है, वह संभवतः पाठक ने कई और जगह पढ़ा-सुना होगा तथा हाल की घटना होने के कारण स्मृति-पटल पर भी वे बातें रह गई होंगी इसलिए अंत तक आते-आते पुस्तक थोड़ी कम रुचिकर हो जाती है।

संभवतः इसलिए लेखक ने पुस्तक का अंतिम अध्याय “नरेंद्र मोदी का साया” को बनाया है ताकि पुनः नए पात्रों के प्रवेश के साथ कहानी में नई जान आ सके। आरएसएस का भाजपा या जन संघ की राजनीति पर प्रभाव का सटीक एवं व्यावहारिक विश्लेषण किया गया है।

वाजपेयी और आडवाणी को आधार बनाकर कहानी को आगे बढ़ाया गया है लेकिन इस कहानी में आने वाले आरएसएस या राजनीतिक दलों के कई पात्रों और उनके प्रभाव को भी पुस्तक में काफी स्थान दिया गया है। भारतीय राजनीति के कई दशकों को समझने में भी यह पुस्तक आपकी सहायता कर सकती है।

इस राजनीति में कब-कब जनता का मत बदला और कब राजनेता उसे समझने में सफल या विफल हुए, इसकी जानकारी भी पुस्तक में मिलेगी। लेकिन जो बात इस पुस्तक को विशेष बनाती है, वह यह है कि सार्वजनिक घटनाओं जितना ही बल निजी घटनाओं पर भी दिया गया है।

लेखक चतुराई दिखाकर कई विवादास्पद मुद्दों पर अपनी व्यक्तिगत राय देने से भी बचे हैं लेकिन फिर भी हिंदू राष्ट्रवाद की उन्होंने जो व्याख्या की है, वह संभवतः कई दक्षिणपंथियों को पसंद न आए क्योंकि इसे वैचारिक से अधिक व्यावहारिक बताया गया है।

वाजपेयी-आडवाणी जुगलबंदी की तुलना अमित शाह-मोदी की जोड़ी से संक्षिप्त रूप में की गई है जिसमें समानता संगठन पर ज़ोर और सबसे बड़ा अंतर भिन्न राजनीतिक परिवेश बताया गया है। अंत में लेखक इस बात का भी संकेत दे देते हैं कि यदि यह जुगलबंदी भी रोचक आकार लेती है तो वे इसपर भी पुस्तक लिख सकते हैं।

नीलम भट्ट और सुबोध मिश्र का हिंदी अनुवाद भी कहानी को रोचक बनाए रखता है। अनुवाद से उपजने वाली वाक्य निर्माण की असहजता इस पुस्तक में देखने को नहीं मिलती। हालाँकि, शुरुआती प्रकाशन होने के कारण वर्तनी की एक-दो त्रुटियाँ पुस्तक में छूट गई हैं।

कुल मिलाकर व्यक्तिगत रूप से वाजपेयी और आडवाणी को समझने, न्यूनतम पूर्वाग्रहों की दृष्टि से भारतीय राजनीति में हिंदू राष्ट्रवाद के स्थान को जानने तथा आरएसएस की विचारधारा एवं कार्यक्रमों के राजनीति पर प्रभाव से परिचित होने के लिए यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।