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पुस्तक समीक्षा- राजनीतिक व्यंगों समेत ‘गंजहों की गोष्ठी’

साकेत सूर्येश की पुस्तक ‘गंजहों की गोष्ठी’ पर यह समीक्षात्मक लेख मैं अज्ञेय की सलाह की अवहेलना करते हुए लिख रहा हूँ। उन्होंने धर्मवीर भारती के लघु उपन्यास ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ की भूमिका में लिखा है, “लेखक को दो चीज़ों से बचना चाहिए- एक तो भूमिकाएँ लिखने से, दूसरे अपने समकालीन लेखकों के बारे में मत प्रकट करने से।’ अपनी सलाह अज्ञेय ने स्वयं नहीं मानी, तो मुझपर भला कैसी बाध्यता। इस पुस्तक में दिया गया लेखक परिचय पढ़कर पाठकों की शंका वास्तविकता में परिणत हो जाएगी कि लेखक अभियन्ता ही हैं। अभियन्ताओं का सृजनशील होना स्वाभाविक है। लेखक ने घाट-घाट का पानी ही नहीं पिया बल्कि हाट-हाट का खाना भी खाया है। रेटोरिक से परे कहें तो लेखक ने खूब भ्रमण किया है। इस पुस्तक के लेखों से यह सिद्ध हो जाएगा कि लेखक के पास अनुभव की ताला लगी समृद्ध थाती भी है और उस थाती पर लगे ताले को खोलने वाली अवलोकन और अभिव्यक्ति की दोहरी चाबी भी। लेखक भले ही यह मानते हों कि शब्दों के अभाव और भावना के बहाव से लेखन उत्पन्न होता है लेकिन यह भी सत्य है कि लेखन के लिए इस थाती और उसकी दोहरी चाभी का होना भी आवश्यक है। यदि लेखन की विधा व्यंग्य हो तो ये और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। साहित्य की एक अनूठी विधा व्यंग्य खतरे में है, ऐसा कहना निरर्थक विलाप करने जैसा होगा। लेकिन आज व्यंग्य का झंडा स्टैंड-अप कॉमेडी के डंडे में लहरा दिया गया है और प्रिंट पर बचे व्यंग्यकारों ने आत्मविश्वास की कमी से अपने बायो में स्वयं को व्यंग्यकार लिखना आरंभ कर दिया है या पाठकों की सुविधा के लिए वे यह स्पष्ट करने लगे हैं कि उनकी रचना व्यंग्य ही है, यथार्थ है। ऐसे दौर में ठेंठ व्यंग्य की पुस्तक ‘गंजहों की गोष्ठी’ से निराशा के कुछ बादल छँटते हुई प्रतीत होते हैं।

इस व्यंग्य संग्रह के पहले लेख की पहली पंक्ति “कस्बा गाँव के लार्वा और शहर की खूबसूरत तितली के बीच का टेडपोल है” कस्बों की स्थिति पर तीखा कटाक्ष करती है। ‘नेताजी का अट्टास’ चिकुटी भी काटता है और हास्य भी बिखेरता है। भारत के राष्ट्रीय भाव के रुप में क्षमा का विवरण देते हुए लेखक कहते हैं, “क्षमा करने और माँगने से समाज में प्रवाह बना रहता है।” इन सबके बीच बसेसर बदलते बयार वाला गाँव दिखाते हैं। लोकतंत्र पर खतरों की बात के बीच लोकतंत्र बचाने की एक विधि ‘आपातकाल’ की चर्चा मजेदार है। कर्ज की महिमा का एंटी रोमांटिक अंत इस अंदाज़ में होता है, “चार्वाक घी से डालडे पर आ रुके और गालिब साहब को बस ठर्रे का सहारा बचा।” कर्नाटक चुनावों के नाम पर लेखक ने चुनावों पर क्या खूब फिरकी ली है, “यह ऐसी व्यवस्था है जिसमे शोषित व्यक्ति अपने शोषण के लिए नई व्यवस्था का चयन कर सकता है जो उसका नए, रुचिकर तरीके से शोषण कर सके। इससे शोषण निरंतर चलता रहता है पर बोरियत मिट जाती है।” इसी चुनावी चर्चा में अशोक महान को भी मानना पड़ता है कि लोकतांत्रिक राजनीति उनकी थाली की खिचड़ी नहीं है। ‘जम्बूद्वीप का शब्द-चित्र’ अपने पास-पड़ोस के लेखों संग पुस्तक के व्यंग्य को शिखर की ओर ले जाता है।

लेखक ने यह साफ कहा है कि जम्बूद्वीप निवासियों की भावनाएँ सोशल मीडिया पर हैशटैग से संचालित होती हैं। इतिहास किसी सहस्त्र कोणीय वीडियो पर आधारित नहीं होता। यह तथ्यों, इतिहासकार की व्याख्या, कथा शैली, धारणा, रुझान और पूर्वाग्रह आदि से मिलकर बनता है। इसके आलोक में बाबर द्वारा अफगानी भूखंड बोरे में भरकर भारत लाने का प्रसंग बेहद रोचक भी है और धारदार व्यंग्य भी। अफगानिस्तान की भूमि भारत लाए जाने के परिणामस्वरुप वहाँ गुफाएँ और कंदराएँ बच गईं। उन्ही में से एक पवित्र कंदरा कालांतर में तोरा-बोरा क्यों कहलाई, यह प्रसंग भूलोट ठहाके का वाहक है। समकालीन व्यंग्य संग्रह में धरने की बात न हो तो शविरोध में एक धरना हो जाएगा। धरने की नौबत न आए, इसके लिए लेखक ने धरने पर एक लेख धर दिया है। वह बताते हैं कि एक धरना बिहार और उत्तर प्रदेश में भी होता है जिसका स्थान कान के नीचे का भाग होता है। इस धरने को वह दिल्ली के धरना से भिन्न बताते हुए भी यह मानते हैं कि पूर्वांचल का धरना ही राजधानी के धरने का काट होता है। लेखक की राजनीतिक महत्वाकांक्षा साफ-साफ तब प्रकट होती है जब एक वह व्यंग्य दल की स्थापना का सुझाव देते हैं। हालाँकि वह इसका उद्देश्य त्रैमासिक धरना सुनिश्चित करना बताते हैं लेकिन मंतव्य साफ है। देश के शीर्ष व्यंग्यकारों में से एक होने के नाते वह व्यंग्य दल के नेतृत्व पर अपना रुमाल छायावादी तरीके से फेंक रहे हैं।

बुद्धिजीवियों की बारात निकालने के लिए लेखक ने शरद जी से भी आधार बनवा दिया है, उन्हें आधार का भय आधारहीन बताकर। पुस्तक का अंत अत्यंत ही मांगलिक तरीके से होता है, छगनलाल के ब्याह के साथ। सरल, सहज और स्वस्थ व्यंग्य लेखों का यह संग्रह सर्वथा पठनीय है। लेखक ने लिख दिया है, प्रकाशकों ने प्रकाशित करके अपना कर्तव्य निभाया है। यहाँ तक कि मैंने समीक्षा लिखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है। यकीन मानिए, यह मेरी लिखी पहली ही समीक्षा है और अंतिम भी होने वाली है। इस समीक्षा के बाद सिर्फ दिलेर लेखक या जांबाज प्रकाशक ही मुझसे समीक्षा लिखने को कहेंगे। अब पाठक गण अपने साहित्य कर्म में कुछ ऐसा कर गुज़रें कि पुस्तक की प्रस्तावना में स्वयं को ‘बड़ी अभिलाषा और छोटे भाग्य’ का बताने वाले लेखक की अभिलाषाएँ और बड़ी हो जाएँ तथा उनके पास यह कहने का मौका शेष न रहे कि उनका भाग्य छोटा है।

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राकेश रंजन जागरण आईनेक्स्ट के लोकप्रिय व्यंग्य स्तंभकार और समसामयिक हिंदी लेखन के अग्रणी पोर्टल लोपक के संपादक हैं।