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अज्ञानी भारतीयों के लिए सरदार पटेल का जिक्र करती एक किताब : द मैन हू सेव्ड इंडिया – एंड द आईडिया ऑफ़ इंडिया
द मैन हू सेव्ड इंडिया – एंड द आईडिया ऑफ़ इंडिया

प्रसंग
  • हिंडोल सेनगुप्ता की किताब ‘द मैन हू सेव्ड इंडिया: सरदार पटेल एंड हिज़ आईडिया ऑफ़ इंडिया’ आज की पीढ़ी द्वारा अनिवार्य रूप से पढ़ी जानी चाहिए

हिंडोल सेनगुप्ता। द मैन हू सेव्ड इंडिया: सरदार पटेल एंड हिज़ आईडिया ऑफ़ इंडिया। पेंगुइन वाइकिंग। हार्ड कवर। 437 पीपी। रुपए 799/-।

महान नेताओं की राजनीतिक जीवनियों का लेखन या पुनर्लेखन प्रत्येक पीढ़ी में कम से कम एक बार तो होना ही चाहिए। इसलिए नहीं कि कहानियों और उपाख्यानों को पहले नहीं बताया गया है बल्कि इसलिए क्योंकि लोग भूल जाते हैं और कहानियों को वर्तमान पीढ़ी के लिए सबसे प्रासंगिक मुहावरे में सुनाया जाना चाहिए।

भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के बारे में विडम्बनापूर्ण तथ्य यह है कि उनके बारे में बहुत कम किताबें लिखी गयी हैं। कुछ लोग यह मानेंगे कि यह नेहरु-गाँधी राजवंश के प्रभुत्व के कारण था, जिनके वंशजों ने 36 वर्षों तक प्रत्यक्ष रूप से भारत पर शासन किया (जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) अवधि के दौरान 10 वर्षों तक परोक्ष रूप से,, लेकिन सच्चाई कुछ और है: सरदार पटेल ने अपने पत्रों और अपने करीबी लोगों की कृतियों के अलावा अपने विचारों का कोई बहुत बड़ा लिखित रिकॉर्ड नहीं छोड़ा। इसके विपरीत उस समय के दिग्गज महात्मा गाँधी, नेहरु और भीमराव अम्बेडकर ने अपने पीछे बहुत सारे नोट्स और लेख छोड़े जिन्हें विद्वान अभी तक परख नहीं पाए हैं।

शायद महात्मा गाँधी के पोते राजमोहन गाँधी द्वारा लिखी गयी ‘पटेल: ए लाइफ पटेल पर लिखी गयी हालिया सबसे सुलभ कृतियों में से एक थी, लेकिन राजमोहन गाँधी एक अलग पीढ़ी से हैं और उन्होंने यह पुस्तक 1991 में लिखी थी। इसके बाद 1995 में प्राण चोपड़ा ने ‘द सरदार ऑफ़ इंडिया नामक किताब लिखी और फिर 10 साल बाद बलराज कृष्ण ने ‘सरदार वल्लभभाई पटेलनामक किताब लिखी। लेकिन नरेन्द्र मोदी द्वारा सरदार पटेल को अपना शुभंकर मानने और इस पाँच फुट पाँच इंच के कद वाले व्यक्ति के लिए “विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा” बनाने का वादा करने के बाद हमें एक ऐसी पुस्तक की आवश्यकता थी जो इस पीढ़ी से बात करे, जो यह जान सके कि ऐसा क्या है जो एक ऐतिहासिक हस्ती सरदार पटेल को इतना दमदार बनाता है कि कोई 2014 में उनकी विरासत का लाभ लेना चाहे।

हिंडोल सेनगुप्ता की ‘द मैन हू सेव्ड इंडिया: सरदार पटेल एंड हिज़ आईडिया ऑफ़ इंडिया नामक किताब इस पर प्रकाश डालती है। सेनगुप्ता को किताबें लिखने का लंबा अनुभव है। उन्होंने दो यादगार किताबें लिखी हैं (‘बींग हिन्दू और स्वामी विवेकानंद पर लिखी गयी किताब ‘द मॉडर्न मोंक) लेकिन मेरे हिसाब से यह उनकी सबसे अच्छी किताब है।

437 पन्नों वाली यह किताब न सिर्फ काफी शोध के बाद और अच्छी तरह से लिखी गयी है बल्कि यह किताब यह दावा किये जाने की प्रवृत्ति से अलग हटकर है कि सरदार पटेल नेहरु से बेहतर प्रधानमंत्री होते, तो क्या किस्मत उनके साथ थी? नेहरु पर लिखी गयी कई पुस्तकों, जो या तो अतिप्रशंसात्मक होती हैं या अतिआलोचनात्मक, के विपरीत यह पुस्तक उदार शीर्षक के बावजूद उस व्यक्ति और उन परिस्थितियों को खंगालने की कोशिश करती है जिनमें वह प्रधानमंत्री के बजाय भारत के उप प्रधानमंत्री बने थे। और यह भी कैसे राष्ट्र निर्माण के बड़े लक्ष्य में अपनी महत्वाकांक्षाओं को शामिल करने के उनके स्वयं के पूर्वाग्रह और इच्छा ने प्रधानमंत्री पद को नकार दिया था। पटेल एक ऐसे व्यक्ति थे जो अपनी सीमाओं को समझते थे और यह सच्ची महानता का प्रतीक है।

हम यह कभी नहीं जान सकते कि विश्व को अलग-अलग नज़रियों से देखने वाले और मौलिक रूप से भिन्न विचारधाराएं रखने वाले दो व्यक्ति अपने शासन से भारत पर कैसा प्रभाव डालते। हम केवल इतना जानते हैं कि नेहरु ने क्या किया था और सेनगुप्ता यह समझाने का प्रयास करते हैं कि सरदार पटेल थोड़ा अलग करते और भारत को ‘आखिरी अंग्रेज़’ की निगरानी में अपनी स्वतन्त्रता की शुरुआत नहीं देखनी पड़ती। लेकिन इसके अलावा हम कुछ और अनुमान लगा सकते कि सरदार पटेल ने कैसे नेहरु से हटकर शासन किया।

अधिक संभावित रूप से कोई यह अनुमान लगा सकता है कि भारत को चलाने के लिए नेहरु और पटेल दोनों की आवश्यकता थी जो एक दूसरे की कमियों को दूर कर सकते थे। भारत को नेहरु के प्रचंड आदर्शवाद और वैश्विक दृष्टिकोण के साथ-साथ पटेल के आधारभूत यथार्थवाद की भी आवश्यकता थी। पटेल के अकाल निधन के बाद नेहरु ने एक ऐसे संतुलन के कारक को खो दिया जो भारतीयता और समझदार भूगोलीय राजनीती के मार्ग पर भारत का मार्गदर्शन करता। यह असंभव है कि नेहरु को चीन के प्रति उनकी विनाशकारी नीति को बिना सैन्य शक्ति के समर्थन के संचालित करने की अनुमति दी गयी होगी और न ही यह संभव है कि पटेल ने लाइसेंस-परमिट राज (1960 और 1980 के दशक के बीच भारत के धीमे विकास का बड़ा कारण) के प्रति कांग्रेस के झुकाव की अनुमति दी होगी।

यह किताब बहुत सी चीजों के बीच , एक बड़े सवाल का जवाब देने की कोशिश करती है, वह यह कि क्यों पटेल ने 1946 में नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनने दिया, जो उनको सीधे 1947 में अपने आप प्रधानमंत्री बना देता और पार्टी में उनके समर्थकों के एक बड़े हिस्से के बावजूद गांधी द्वारा नेहरू का अपने उत्तराधिकारी के रूप में अभिषेक को चुपचाप स्वीकार कर लिया। इस पहेली को सिर्फ गांधी के साथ उनके संबंधों से ही समझाया जा सकता है। हालांकि पटेल शुरूआत में गांधी के प्रति संदिग्ध थे (उन्होंने गांधी के बारे में कहा है: “ईमानदारी से, मुझे यह लगता है कि वह एक सनकी व्यक्ति हैं और जैसा कि आप जानते हैं, मुझे ऐसे लोगों की कोई जरूरत नहीं है।”) लेकिन समय के साथ-साथ वह उनके सबसे बड़े शिष्य बन गए। पटेल बुजुर्गों का सम्मान करने वाले भावों से भरे हुए थे और फिर गांधी के आध्यात्मिक प्रभाव के कारण उनको गांधी के प्रति कुछ ज्यादा ही सम्मान दिखाना पड़ता था। पटेल ने गांधी को पहले अपने गुरू के रूप में माना था इसीलिए गांधी की राजनीतिक गलतियों के बावजूद भी वह पटेल के लिए सम्मान और आज्ञा के योग्य थे। लेकिन गांधी की लोगों को निष्क्रियता से बाहर निकालने की सहज क्षमता, जैसा कि उनके सफल चंपारण अभियान और दांडी नमक यात्रा से स्पष्ट था, निश्चित रूप से सरदार पटेल के लिए लाभकारी रहा होगा।

एक चीज जो सरदार पटेल का साथ नहीं दे रही थी वह थी उनकी उम्र। आजादी के दौर में, जब वह करीब 70 वर्ष की उम्र में थे तब समय उनका साथ नहीं दे रहा था। एक युवा राष्ट्र को एक युवा नेता की जरूरत थी, लेकिन सरदार पटेल गांधीजी के समकालीन थे जिनकी उम्र नेहरू जी से करीब 20 वर्ष अधिक थी। इस कारण, और हो सकता है कि गांधीजी नेहरू को अपने बेटे तथा पटेल को अपने भाई जैसा समझते हों, आदि कारणों से शायद पटेल को मौका नहीं दिया गया। कोई भी व्यक्ति अपनी विरासत बेटे को सौंपता है न कि भाई को।

लेकिन, लेखक का यह भी मानना है कि अगर नेहरू को यह ऊँची पदवी न दी गई होती तो वे पार्टी को भंग कर सकते थे और यह एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है जिसके कारण पटेल ने गांधीजी की इच्छा का पालन किया। हाल ही में स्वतंत्र हुए देश में इतनी सारी चुनौतियों, जिसमें सांप्रदायिक तनाव शांत करने की भी चुनौती शामिल थी, के साथ एक अंतिम जरूरत थी, वह थी वरिष्ठ लोगों में मतभेद न होने देना। यह किताब इस बात की गहरी व्याख्या करती है कि कैसे गांधी-नेहरू, गांधी-पटेल और नेहरू-पटेल व्यक्तिगत समीकरणों ने भारत की आजादी और उसके तत्काल बाद हुए विभाजन और संबंधित हिंसा पर काबू पाने में योगदान दिया।

यह पुस्तक आपको 1920 और 1930 के दशक में गांधी के मुख्य अनुयायी और नागरिक अवज्ञा और सत्याग्रह आंदोलनों के कार्यान्वयनकर्ता के रूप में पटेल की भूमिका दिखाएगी जो खेड़ा और बारडोली आंदोलनों से शुरू हुए पटेल के मूल दावों से लेकर राष्ट्रीय ध्यानाकर्षण एवं प्रसिद्धि के बारे में बताएगी। पूरी तरह से अहिंसक सत्याग्रह आंदोलन के अवास्तविक, यहाँ तक कि पागलपन वाले गांधीवादी दृष्टिकोण के साथ पूर्णतः सहमत न होने के बावजूद, जब गांधी की प्रतिष्ठा खतरे में थी तो उसको बचाने के लिए पटेल ने जो हो सकता था वह सब कुछ किया। जिस समय राष्ट्रीय मनोदशा गांधी के खिलाफ हो गयी, जब वह सब कुछ करने के बावजूद भगत सिंह को फांसी से बचाने में नाकाम रहे या जब गांधी-इरविन संधि की उनकी स्वीकृति वह परिणाम नहीं दे पाई जिसके लिए कांग्रेस आंदोलन कर रही थी, तो पटेल ने न केवल गांधी का बचाव किया बल्कि पार्टी को समझौता स्वीकार करने के लिए भी मनाया। पटेल ने न केवल भारत को, बल्कि महात्मा को भी अपमानित होने से बचाया।

पटेल ने न सिर्फ गांधी बल्कि नेहरू की गलतियों पर भी परदा डाला। जब कैबिनेट मिशन योजना पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एक छोटा समझौता हुआ, जो भारत को एक देश के रूप में रखता, लेकिन एक कमजोर केंद्र के साथ, नेहरू ने इस समझौते को कांग्रेस के इनकार के साथ रद्द कर दिया था। इसने मुहम्मद अली जिन्ना को 16 अगस्त 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे को होने वाले समझौते को अस्वीकार करने का सही मौका दिया, जिसके साथ वह स्वयं असहज था। इसकी वजह से बंगाल में मुस्लिम लीग के प्रमुख हुसेन सुहरावर्दी की शह पर सांप्रदायिक हिंसा के माध्यम से कलकत्ता में कत्लेआम हुआ।

बाद में, पटेल की सलाह के खिलाफ जाकर, नेहरू ने कश्मीर में डोगरा शासक, हरि सिंह के खिलाफ अपनी लड़ाई में शेख अब्दुल्ला के मुस्लिम सम्मेलन (बाद में राष्ट्रीय सम्मेलन बनाने के लिए) का समर्थन किया। भारतीय शिविर में कश्मीर के पूर्ण सुरक्षित होने के बाद पटेल ने लोकतांत्रिककरण की लड़ाई को प्राथमिकता दी होगी, लेकिन नेहरू की उत्तेजना ने हिंदू राजा और उनकी मुस्लिम प्रजा के बीच एक दरार पैदा कर दी, जिससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ा, जिससे बचा जा सकता था।

बाद में, जब पठान जनजाति, मुख्य रूप से अफरीदी और महसूद ने कश्मीर पर हमला करना शुरू किया, इससे पाकिस्तान को छल से जीतने की संभावना बढ़ गई जो वह महाराजा को पाकिस्तान के साथ शामिल करके नहीं कर सका।  यह पटेल ही थे जिन्होंने नेहरू को उस वक्त भारतीय सैन्य समर्थन की सुविधा प्रदान की जब वे दुविधा में फसे हुए थे और भारत को कश्मीर के महत्व पर चर्चा करने के लिए भू-राजनीतिककारणों को खोजने की कोशिश कर रहे थे।

एलेक्स वॉन टुनज़ेलमैन अपनी पुस्तक ‘इंडियन समर’ में  लिखती हैं कि कैसे पटेल ने भारतीय सेना को आक्रमण करने के लिए सक्षम बनाया था, जब इसके लिए नेहरू स्वयं को तैयार करने की कोशिश कर रहे थे। टुनज़ेलमैन की यह पुस्तक कश्मीर के मामले में पाकिस्तान का पक्ष लेती है और पद प्राप्त करने में पटेल और नेहरू की भूमिका के खिलाफ बोलती है। इस पुस्तक में टुनज़ेलमैन उस समय भारतीय सेना के निदेशक और बाद में फील्ड मार्शल, सैम मानेकशॉ और नेहरू की दिल्ली में हुई एक बैठक में शिरकत का जिक्र करती हैं, जिसमें नेहरू रूस, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के साथ कश्मीर की स्थिति पर बातचीत को आगे बढ़ा रहे थे। पटेल ने नेहरू की बात को बीच में ही काटते हुए पूछा था कि “जवाहरलाल आप कश्मीर चाहते हैं या इसे देना चाहते हैं?” इस पर नेहरू ने जवाब दिया था, “बिलकुल, हम कश्मीर चाहते हैं,” और इससे पहले कि नेहरू कुछ और कह पाते पटेल ने मानेकशॉ को फिर से लड़ाई शुरू करने का आदेश दे दिया था। पटेल की बदौलत ही भारतीय सेना कश्मीर में निजी विमानों से उड़ान भरने में सक्षम हो पाई थी।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि पटेल के यथार्थवाद से ही नेहरू के स्थिर बौद्धिक विचारों पर लगाम लग पाई थी, इस तरह से उन्होंने केवल कश्मीर ही नहीं बल्कि पूरे भारत को बचाया। सेनगुप्ता की इस पुस्तक के शीर्षक को भी काफी हद तक इस तथ्य से समझा जा सकता है कि वीपी मेनन के साथ पटेल की बदौलत ही 550 रियासतों का भारत में विलय हो पाया था, लेकिन एक विभाजन के उल्लेख के बिना भारत को बचाने में अपनी भूमिका पर पूरी तरह से चर्चा नहीं कर सकती है।

 

मौलाना आजाद ने अपनी पुस्तक ‘इण्डिया विन्स फ्रीडम में लिखा है कि पटेल 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष थे, उन्होंने कैबिनेट मिशन योजना को भी लागू किया होगा, जिसे नेहरू ने हटाकर भारत देश को एक रखा। लेकिन यह उम्मीद से परे है, कि यथार्थवादी पटेल ने, जो नेहरू ने किया था, को अंतिम रूप दिया होगा। पटेल को बहुत ही जल्द इस बात का एहसास हुआ और विशेष रूप पर तब जब जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को सीधी कार्यवाही दिवस (डायरेक्ट एक्शन डे) का आदेश दे दिया, क्योंकि उनको लगता था कि केंद्र सरकार की शक्तियों के साथ देश पर शासन करना असंभव होगा।

मुस्लिम लीग के पास लगभग हर चीज पर एक प्रभावी अधिपति हो गया होता। आजाद ने सोचा कि शायद सरदार ने, लियाकत अली के बाद जिन्होंने नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के वित्त मंत्री और विभाजनगृह मंत्री के रूप में अपनी अधिकांश योजनाओं का उल्लंघन किया, स्वीकार करने का निर्णय लिया होगा। आखिरी बात जो सरदार पटेल चाहते थे वह था, देश को विपरीत दिशाओं में घसीट रही दोनों शक्तियों, कांग्रेस और लीग का पतन। इसमें पटेल, अम्बेडकर और सी राजगोपालाचारी (राजाजी) की तरह भविष्यदर्शी थे। जबकि संयुक्त भारत का दृश्य शानदार हो सकता है, यह विभाजन था जिसने भौगोलिक भाग में, जिसे पाकिस्तान नहीं कहा जाता था, आखिरकार भारत को भारत के विचारों सहित लोकतांत्रिक देश के रूप में सुरक्षित किया।

हिंदोल सेनगुप्ता की ‘द मैन हू सेव्ड इण्डिया’ आज की पीढ़ी के लिए पढ़ना जरूरी है।

जगन्नाथ स्वराज के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।