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चोरी करके “हिट” होने वाला बॉलीवुड कैसे किसी पर “गऊचोरी” का आरोप लगा सकता है
आनंद कुमार - 24th September 2021

चोरी के अभियोग की बात जैसे ही एक फ्लॉप फिल्मकार ने शुरू की, हमें आचार्य विद्यानिवास मिश्र की याद आ गई। उन्होंने “गऊचोरी” नामक एक निबंध लिखा था। हमने शीर्षक पढ़ा और मान लिया कि गायों की चोरी-तस्करी जो ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों के लिए एक बड़ी समस्या है, उसी पर होगा।

लेख सिर्फ उस विषय पर था नहीं। हमें पहले ही समझना चाहिए था कि जो व्यक्ति “हिंदी की शब्द संपदा” जैसी पूरी पुस्तक लिख सकता है, वह भला शब्दों से न खेले, ऐसा कैसे होगा? लेख में उन्होंने स्वयं ही बता रखा था कि वाणी भी सीधी और दुधार होती है, इसलिए उसकी संज्ञा भी गौ है।

और तो और, लेख में उन्होंने जैसे गौ चुराने की प्रक्रिया में जुटे लोगों को पाँच श्रेणियों में बाँटा था, वैसे ही उन्होंने साहित्यिक चोरों की भी पाँच किस्में तय कर डाली थी। गौ चोरी में पहला वह होता है जो ये संकेतित करता है कि इनके पशु चुराए जाएँ, दूसरा जो पशु को चुराकर एक गाँव से दूसरे गाँव पहुँचा देता है।

तीसरा जो यह प्रयास करता है कि किसी आस-पास के ही ठीहे से खरीद-बिक्री का सौदा पटा लिया जाए, चौथा एक ठीहे से चोरी के पशुओं को दूसरे ठीहे तक पहुँचाता है और पाँचवाँ यानी अंतिम ठीहों का नियंत्रण और चोरी के माल का बटवारा करने वाला होता है।

इनमें पहली, तीसरी और पाँचवीं श्रेणी में तो तथाकथित संभ्रांत लोग आते हैं, दूसरी में मनचले होते हैं, मगर चौथी में पक्के डकैत-लठैत होते हैं। विद्यानिवास मिश्र जब इसी को साहित्यिक चोरी पर ले चलते हैं तो फिर से ऐसा ही भेद करते हैं।

वे बताते हैं कि पहली श्रेणी में वे नौसिखिए आते हैं जो नौकरी की तलाश करते थक गए होते हैं और किसी हितैषी के पास सहायता माँगने पहुँचते हैं। हितैषी पाठ्यपुस्तक तैयार करने का वरदान देता है। आज जैसा तब कंप्यूटर का कॉपी-पेस्ट नहीं होता था, इसलिए वे कहते हैं कि नौसिखिया कैंची और लेई लेकर बैठ जाता है। ‘संकलित’, ‘आधारित’ जैसे नाम जोड़कर बाज़ार के लिए नया मसाला तैयार हो जाता है।

अब चोरों की दूसरी श्रेणी वाले हितैषी महोदय आलोचना के पहले से ही तैयार हिस्से उसमें जोड़ते हैं और नाम के आगे कुसुम, सुमन, सौरभ, पराग जैसे शब्द लगाकर उसे तैयार कर देते हैं। चोरों की तीसरी श्रेणी में वे ऐसे प्रकाशकों को डालते हैं, जो मौलिक कृतियों का तो कोई मूल्य लेखक को देने को तैयार नहीं होते, मगर ऐसी कृतियों पर फीसदी तय करने को उत्सुक दिखते हैं।

चौथी श्रेणी में दलाल आते हैं जो प्रकाशकों और पाठ्यपुस्तक की चयन समिति के बीच काम करते हैं। यहाँ वे प्रकाशक की तुलना किसी लजीले नायक से और पाठ्यपुस्तक चयन समिति की तुलना किसी धृष्ट नायिका से करते हैं। इन दोनों के बीच बेचारे दलाल को मजबूरी में मध्यस्थता करनी पड़ जाती है।

पाँचवाँ चोरों का वर्ग पाठ्यपुस्तक चयन समिति को माना जाता है। संसार इस गऊचोरी को बड़ी आदर की दृष्टि से देखता है। इस विधा में चोर ही कोतवाल को डाँटते रहते हैं और किसी भी नवीन प्रयोग करने वाले, कुछ नया लिखने वाले को प्रयोगवादी कहकर उड़ा भी देते हैं। तत्कालीन इतिहास लिखने वाले भी इन चोरों के भाई-बन्धु होते हैं, इसलिए इस चौर्यकर्म में प्रवीण हुए बिना पंडित और विद्वान कहलाना असंभव है।

साहित्यिक चोरी के कल-पुर्जों से निकलकर फिर से ज़रा दूर से देखें तो बेचारे फ्लॉप फिल्मकार की चिंता भी बड़ी विचित्र-सी लगती है। जैसे साहित्यिक चोरों में कोई पाठ्यपुस्तक चयन समिति वालों पर हाथ डालना आर्थिक दृष्टि से और दलालों पर हाथ डालना सुरक्षा की दृष्टि से हितकर नहीं मानता, वैसे ही बेचारे फ्लॉप फिल्मकार भी उसी क्षेत्र में काम करके अपनी दाल-रोटी (और अक्सर दारु-मुर्गा भी) चलाते होंगे, इसलिए वे भी बड़े चोरों के बारे में कुछ नहीं बोल पाते।

पहली श्रेणी यानी इस खूंटे से उस खूंटे पर पशु बांध देने वाले, या कैंची-लेई से साहित्य इकठ्ठा करके नई पुस्तक रच देने वाले नौजवानों को कुछ कहने का लाभ नहीं। जब तक ढीहों पर पशु बेचकर माल का बटवारा करने वाले, और प्रकाशक-चयन समिति की जोड़ी है, तबतक तो उन्हें वैसे निरीह माना जाना चाहिए जिनसे गलती हो गई।

सीधे बॉलीवुड से लेकर साहित्यिक जगत तक चलें तो ऐसी चोरियों की भरमार है। माँ पर लिखी कविता के लिए जाने जाने वाले और हाल ही में भूमि विवाद में स्वयं ही अपने परिवार के लोगों पर गोलियाँ चलवाने के आरोपों के लिए कुख्यात मुन्नवर राना पर ये आरोप विदिशा के पत्रकार और हिंदी कवी आलोक श्रीवास्तव ने काफी पहले लगाया था।

मुन्नवर राना ने कभी इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया। कविताओं की ही श्रेणी के काफी करीब फिल्मी गीत भी आते हैं। वहाँ तो दशा ही विचित्र है। जिन्हें हम-आप विख्यात हिंदी गीत मानते हैं, वे सब के सब चोरी के ही निकलते हैं। चोरी के कहना इसलिए वाजिब है क्योंकि रोयल्टी में से कोई हिस्सा दिया गया हो, या श्रेय में ही मूल लेखक-कवि का नाम लिखा गया हो, ऐसा भी होता नहीं दिखता।

उदाहरण के तौर 1990 में विनोद खन्ना वाली फिल्म “जुर्म” आई थी जिसका गाना “जब कोई बात बिगड़ जाए” काफी प्रसिद्ध हुआ था। इस प्रसिद्ध-से गाने को सीधा ही “फाइव हंड्रेड माइल्स अवे फ्रॉम होम” अंग्रेज़ी गाने की धुन से उठा लिया गया था। मगर ये तो महेश भट्ट जैसे बड़े लोगों की फिल्म थी, इसके खिलाफ फ्लॉप फिल्मकार कैसे बोलते?

चलिए यह थोड़ा कम पहचाना हुआ नाम लग रहा हो तो सुपरहिट फिल्मों पर चलते हैं। “क़यामत से क़यामत तक” का नाम तो सुना होगा? उसका एक बड़ा मशहूर गाना था “अकेले हैं, तो क्या गम है” जिसका संगीत दिया था आनंद-मिलिंद ने। इसमें सीधा-सीधा “द शैडोज” के गाने “रिटर्न टू द अलमो” का संगीत उठा लिया गया है।

“साजन” भी सुपरहिट फिल्म थी जिसमें “पहली बार मिले हैं, मिलते ही दिल ने कहा” तो आपने सुना ही होगा? ये सीधा-सीधा सुजैन वेगा के गाने “सोलीट्यूड स्टैंडिंग” की धुन की नक़ल है। गाने के लिए हिट हुई एक और फिल्म “आशिकी” भी थी। इसके गाने तो ऐसे मशहूर थे कि हाल में किसी ने इसकी तर्ज़ पर “आशिकी 2” भी बनाई जिसके गाने भी हिट हुए।

पुरानी वाली “आशिकी” में “धीरे-धीरे से मेरी ज़िंदगी में आना” का संगीत ही नहीं, बोल तक जॉय्स सिम्स के गाने “कम इन्टू माय लाइफ” की सीधी नक़ल है। इसी का दूसरा गाना “तू मेरी ज़िंदगी है”, पूरी बेशर्मी के साथ एक पाकिस्तानी गायिका नूर जहां का चुरा लिया गया है।

वैसे गानों की चोरी की बात करें और अनवर सरदार का उल्लेख न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? आजकल आप उन्हें अनु मालिक के नाम से जानते हैं। गाने चुराने के महारथियों में उनका नाम सुनहरे अक्षरों से लिखा जाता है। “सुन सुन सुन बरसात की धुन सुन” वाला गाना उन्होंने होज़े फिलिसियानो के गाने “लिसेन टू द फॉलिंग रेन” से सीधे चुरा लिया था।

छोटी-मोटी धुनों की बात छोड़िए, अनवर सरदार उर्फ़ अनु मालिक ने सीधे “द गॉडफादर” का थीम ही चुराकर उससे “राजा को रानी से प्यार हो गया” बना डाला। जो 18 सेकंड में पता चल जाए, उसे क्या “इंस्पिरेशन” कहेंगे? अगर थी तो फिर तो “ये काली काली आँखे” वाले बाजीगर के गाने को भी “द मैन हु प्लेड मेंडोलीनो” नाम के 1957 के डीन मार्टिन के गाने से “प्रेरित” ही मान ली जानी चाहिए।

फिल्मों की ही बात करें तो किसी फिल्म में राजकुमार का एक डायलॉग था, “जिनके अपने घर शीशे के हों, वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते”। बॉलीवुड में काम करने वाले किसी “कॉपीराइट” और “साहित्यिक चोरी” की बातें करते अच्छे नहीं लगते।

पोस्टर से लेकर फिल्मों के दृश्य तक सीधे-सीधे जहाँ विदेशी फिल्मों से उठाए हुए होते हैं, वे कला में मौलिकता की बातें क्या करेंगे? तो साहेब, साहित्यिक चोरियों का आरोप दूसरों पर लगाने से पहले अपना घर ही जरा देख लीजिए, या फिर जाने दीजिए, आपसे न हो पाएगा।