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राफेल सौदे में सरकार पर रिलायंस का पक्ष लेने का आरोप लगाना क्यों तर्कहीन है

प्रसंग
  • हर रक्षा सौदे में गलती निकलना जरूरी नहीं होता। सरकार-विरोधी रवैया और भी पतित होकर राष्ट्र-विरोधी रवैये में परिवर्तित नहीं होना चाहिए

लोकसभा में हाल ही में अविश्वास प्रस्ताव को लेकर की जाने वाली बहस को दो वजहों से लंबे समय तक याद रखा जाएगा। एक, अपरिपक्व नेता का गले मिलना और आँख मारना। दूसरा, राफेल सौदे को लेकर सरकार के खिलाफ दो गंभीर आरोप लगाना। पहली बात देश की गरिमा और शिष्टाचार से संबंधित है और आने वाली पीढ़ी इसे उचित घृणा के साथ याद रखेगी। दूसरी बात काफी गंभीर चिंता का विषय है। अगर राफेल सौदे का राजनीतिकण हो गया तो यह भारत की सुरक्षा को नुकसान पहुँचा सकता है और आधुनिकीकरण कार्यक्रम को समाप्त कर सकता है।

व्यापक रूप से सरकार पर यह आरोप लगाए गए हैं – (i) गोपनीयता के तहत सौदे के विवरण का खुलासा नहीं किया गया, (ii) एक महंगे सौदे की बातचीत की गई और (iii) एक निजी भारतीय कंपनी का पक्ष लेने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र को अनदेखा किया गया। यह सभी गंभीर आरोप जाँच के योग्य हैं।

याद करिए, भारतीय वायु सेना की तत्काल मांग पर, अगस्त 2007 में 136 मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्रॉफ्ट के लिए निविदाएं (टेंडर) जारी की गई थीं। इसमें 18 बने बनाए विमानों को खरीदा जाना था और बाकी विमानों का भारत में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के तहत निर्माण किया जाना था। व्यापक परीक्षणों के बाद, दो प्लेटफॉर्मों (डसॉल्ट राफेल और यूरोफाइटर टायफून) को तकनीकी रूप से स्वीकार्य पाया गया था। अंत में, अपनी कम जीवन चक्र लागत के कारण राफेल को पसंद किया गया था। 31 जनवरी 2012 को इसकी घोषणा कर दी गई थी और फिर अनुबंध वार्ता प्रारंभ हुई थी।

2014 तक, बातचीत पूरी तरह से जटिल स्थिति में थी तथा इसकी सफलता के कोई संकेत नजर नहीं आ रहे थे। अत्यधिक बढ़ती हुई लागत (10-12 बिलियन डॉलर से बढ़कर 25-30 बिलियन डॉलर) के अलावा दो अन्य अहम मुद्दों ने काफी कलह पैदा की। पहला, डसॉल्ट ने हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित 108 फाइटर की गारंटी लेने से इंकार कर दिया क्योंकि इसने हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को अत्याधुनिक फाइटरों के उत्पादन में पूरी तरह से असमर्थ पाया। दूसरा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के कार्यक्षेत्र और गहनता के विवेचन के बारे में अंतर सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार, डसॉल्ट अनुज्ञप्ति निर्माण के लिए सीमित प्रौद्योगिकी से साथ भाग लेने के लिए तैयार था न कि डिजाइन प्रौद्योगिकी के साथ। कोई समाधान न सूझने पर तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने प्रस्ताव को उसके हाल पर ही छोड़ने का फैसला लिया।

गोपनीयता नियम

यह एक स्वीकार्य तथ्य है कि दोनों देशों के बीच प्रमुख रक्षा सौदे देशों की विदेशी नीति के उद्देश्यों का एक साधन हैं। वे अलगाव में नहीं पड़ते हैं और दोनों देशों के बीच सम्मत एक बड़े पैकेज का निरपवाद रूप से एक हिस्सा होते हैं। इसलिए, इसे सिर्फ वाणिज्यिक अनुबंध के रूप में देखना गलता है। यह कहने की जरूरत ही नहीं है कि एवज में बार-बार की गई कई प्रतिबद्धताओं से सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ता है, इनको कभी भी सार्वजनिक नहीं किया जाता है।

भारत राफेल को एक पूर्ण युद्ध प्रणाली के रूप में खरीद रहा है कि न कि केवल प्लेटफॉर्म के रूप में। असल उद्देश्य तो इसमें लगे हथियार, ऐविओनिकी (उड़ान में प्रयुक्त होने वाली इलेक्ट्रॉनिक्स), इलेक्ट्रानिक्स और राडार हैं। एक रणनीतिक प्रणाली की परिचालन क्षमता इसके विन्यास (कॉन्फ़िगरेशन) पर निर्भर करती है और इसकी गोपनीयता को बारीकी से सुरक्षित करना होता है। कोई भी देश ऐसे विवरणों को उजागर नहीं करता है क्योंकि इसके आश्चर्यजनक तत्व निष्फल हो जाते हैं और संभावित शत्रु आग्रिम रूप से इसके उपायों की खोज आरंभ कर सकते हैं। यह विचित्र बात है कि कुछ जानकार विशेषज्ञ चाह रहे हैं कि सरकार एक ऐसी सूची जारी कर दे जिसमें सभी वस्तुओं की तुलनात्मक लागत दी गई हो। पारदर्शिता की इस माँग को ऐसी बेहूदा सीमा तक नहीं ले जाया जा सकता है।

विक्रेता के संबंध में, फ्रांस ने पहले से ही यह कह दिया है कि वह इस सौदे की वाणिज्यिक शर्तों को गोपनीय रखना चाहता है क्योंकि उसे अपने उत्पादों को अन्य देशों में भी बेचना है। सरकार से सरकार के बीच में होने वाले सभी सौदों में वाणिज्यिक गोपनीयता निहित होती है। रक्षा प्रणालियों के लिए कोई एमआरपी नहीं होता है।

तय सौदे की तुलनात्मक लागत

यह आरोप लगाया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी द्वारा तय किए गए सौदे की लागत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) शासन के तहत किए गये सौदे की तुलना में बहुत अधिक है। यह काफी बचकानी शरारत है। कोई एक गैर-सौदे की तुलना सौदे के साथ कैसे कर सकता है? जैसा कि पहले बताया गया था, शुरुआती असहमति के कारण पूर्व वार्ताओं का कभी कोई परिणाम नहीं निकल पाया था। मूल्य की तुलना के लिए एक असफल एवं निरस्त व्यवस्था का उपयोग एक तथ्य के रूप में नहीं किया जा सकता है?

इसके अलावा, पहले बताई गयी कीमत प्लेटफार्म के लिए थी और इसमें अन्य चीजें जोड़ने की बातचीत कभी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाई थी। वर्तमान सौदे में बड़ी संख्या में भारत की विशिष्ट क्षमताएं शामिल हैं जो किसी अन्य विमान में नहीं हैं। एक उदाहरण उद्धृत करने के लिए, सेडान के बेस मॉडल की लागत केवल 11 लाख रुपये ही हो सकती हैं, जबकि सभी सुविधाओं के साथ टॉप-एंड मॉडल की लागत 16 लाख रुपये से अधिक हो सकती है। क्या इन दोनों लागतों की तुलना की जा सकती है?

निजी क्षेत्र की कंपनी का पक्ष लेना

सरकार पर एचएएल को हटाकर अनिल अंबानी के रिलायंस समूह का पक्ष लेने का आरोप लगाया गया है। यह अब तक का सबसे बेहूदा आरोप है। कोई नहीं जानता कि यह आलोचकों की अज्ञानता है या दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों के साथ सोची समझी साजिश।

वर्तमान राफेल सौदे में लड़ाकू विमान का भारत में निर्माण/असेंबली करना शामिल नहीं है। सभी 36 विमान फ्रांस में निर्मित किए जाएंगे और पूरी तरह से तैयार (कॉन्फिगर) करके भारत पहुँचाए जाएंगे। इसलिए, एक भारतीय उत्पादन भागीदार होने का सवाल ही नहीं उठता है। रिलायंस किसी भी विमान का निर्माण नहीं करेगा। डेसॉल्ट ने अपने ऑफसेट दायित्वों को पूरा करने के लिए कई भारतीय ऑफसेट पार्टनर्स (आईओपी) का चयन किया है और रिलायंस उनमें से एक है, यद्यपि यह उनमें एक प्रमुख पार्टनर है।

ऑफसेट दायित्वों की पूर्ति में निर्दिष्ट ऑफसेट कार्यक्रमों के माध्यम से इसके संसाधनों के बहिर्वाह के लिए खरीदार देश को क्षतिपूर्ति करना शामिल है। रक्षा खरीद प्रक्रिया के चैप्टर II के अपेन्डिक्स डी में भारत की ऑफ़सेट नीति का वर्णन किया गया है। वर्तमान चर्चा से संबंधित प्रावधान निम्नानुसार हैं: –

  • ऑफसेट्स का हिस्साः पैरा 2.2 के अनुसार, 2000 करोड़ रूपये से अधिक अनुमानित मूल्य के सभी ‘वैश्विक खरीद’ मामलों को अनुबंध मूल्य के 30 प्रतिशत के बराबर ऑफसेट दायित्व लेना होगा। दिलचस्प बात यह है कि फ्रांस के कड़े विरोध के बावजूद भी भारत अनुबंध मूल्य के 50 प्रतिशत के बराबर ऑफसेट प्राप्त करने में सफल रहा है। यह एक बड़ा मुनाफा है क्योंकि अतिरिक्त ऑफसेट दायित्व को पूरा करने के लिए डसॉल्ट को अतिरिक्त व्यय करना है।
  • आईओपी का चयनः पैरा 4.3 में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि विदेशी विक्रेता आईओपी का चयन करने के लिए स्वतंत्र हैं और सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है।
  • ऑफसेट पूर्ण करने के लिए उत्तरदायित्व: पैरा 1 स्पष्ट रूप से बताता है कि ऑफसेट दायित्वों की पूर्ति के लिए विदेशी विक्रेता जिम्मेदार होगा। ऐसा करने में विफल रहने का अर्थ है भारी जुर्माना (बीस प्रतिशत की सीमा के साथ अनापूर्तित ऑफसेट दायित्वों का पाँच प्रतिशत) और यहाँ तक कि भविष्य के अनुबंधों से रोक। हर तरह से यह एक बड़ी सजा है।
  • ऑफसेट दायित्वों के निर्वहन के लिए मार्ग (पैरा 3)- नीति ऑफसेट दायित्वों के निर्वहन के लिए छह बिंदु निर्दिष्ट करती है और विदेशी विक्रेता किसी भी एक या उनके संयोजन का चयन करने के लिए स्वतंत्र है। इन मार्गों में शामिल हैं- योग्य उत्पादों और सेवाओं की प्रत्यक्ष खरीद; संयुक्त उद्यमों में एफडीआई; और वर्ग / प्रौद्योगिकी में निवेश। योग्य उत्पाद/सेवाएं सुरक्षा की पूर्ण श्रंखला, अंतर्देशीय/ तटवर्ती सुरक्षा और नागरिक एयरोस्पेस उत्पादों को कवर करती हैं।

उपरोक्त प्रावधान स्वाभाविक समझ पैदा करते हैं। यदि विक्रेता ऑफसेट के लिए जिम्मेदार है तो उसे आईओपी, जिसमें वह विश्वस्त है, चुनने की आजादी होनी चाहिए। सरकार आईओपी को निर्देशित नहीं कर सकती है लेकिन फिर भी समय पर समाप्ति के लिए विक्रेता को जिम्मेदार ठहरा सकती है। डसॉल्ट ने रिलायंस को एक प्रमुख आईओपी के रूप में चुना है। इस पर कोई भी सवाल नहीं उठा सकता।

यहाँ पर यह बात स्मरण करने योग्य है कि भारत ने ऑफसेट दायित्वों के साथ अमेरिका के साथ 22 अपाचे हमलावर हेलीकॉप्टरों तथा 15 चिनूक हेवी-लिफ्ट चॉपर्स के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। बोइंग ने टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, डायनेमेटिक टेक्नोलॉजीज, रॉसेल टेकसिस और कई अन्य को आईओपी के रूप में चुना था। इसलिए, राफेल सौदे में सरकार पर रिलायंस का पक्ष लेने का आरोप लगाया जाना तर्कहीन है।

निष्कर्ष

बड़े मूल्य के सौदों के मामलों में, सरकार से सरकार के बीच का सौदे का मार्ग सबसे कम लागत वाला तथा सर्वश्रेष्ठ गारंटी के साथ होता है। इसके साथ ही, विक्रेता सरकार रसद, प्रशिक्षण और समुपयोजन सहायता प्रदान करती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें न कोई मध्यस्थ होता है और न ही किसी प्रकार का काला धन। राफेल सौदा कोई अपवाद नहीं है। हालांकि, निर्णायक रक्षा क्षमता हासिल करने वाला हर प्रयास हानिकारक विरोधी ताकतों द्वारा विवादों में लाया जाता है।

जैसा कि पुराने समय से देखा जाता रहा है कि हारे हुए प्रतिद्वंदियों द्वारा पेड सोर्सज़ के माध्यम से नकारात्मक कहानियाँ बनाकर जानबूझकर विवादों को उत्पन्न किया जाता है जिससे निर्णय लेने वालों को समझौते को रद्द करने के लिए मजबूर किया जा सके। राफेल सौदे के मामले में मीडिया रिपोर्टों का कहना है कि सरकार अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों, खासकर नौसेना विमानों के संस्करण की खरीद पर विचार कर रही है। प्रत्यक्ष रूप से, सरकार को इस पर आगे बढ़ने से रोकने के प्रयास किए जा रहे हैं। जो वर्तमान में विरोध हो रहा है वह स्पष्ट रूप से इसका ही प्रकटीकरण हो सकता है। यह भी आरोप लगाया गया है कि चुनाव निधि ऐंठने के लिए राजनेताओं द्वारा जानबूझकर कुछ कॉर्पोरेट संस्थाओं पर निशाना साधा जाता है।

रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र को शामिल करने के हर कदम का सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा जोरदार विरोध किया जाता है। एचएएल का पिछला प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। निजी क्षेत्र में एयरोस्पेस निर्माण के लिए वैकल्पिक सुविधाओं को विकसित करने के उद्देश्य से, यूपीए सरकार ने विदेशी विक्रेता के सहयोग से एक निजी क्षेत्र की इकाई द्वारा परिवहन विमान के निर्माण के लिए एक प्रस्ताव का सूत्रपात किया था। अंततः टाटा-एयरबस का चयन किया गया था।

अपने एकाधिकारवादी अधिकार क्षेत्र में निजी क्षेत्र की प्रविष्टि से भयभीत होकर एचएएल ने चतुराई से उपर्युक्त प्रस्ताव को ‘सार्वजनिक क्षेत्र बनाम निजी क्षेत्र संघर्ष’ में रूपांतरित कर दिया। इसके बाद से यह प्रस्ताव नौकरशाही के भंवर में फंस कर रह गया है और आगे कोई प्रगति नहीं हुई है। सार्वजनिक क्षेत्र के संरक्षकों द्वारा निजी क्षेत्र को एकीकृत करने के हर प्रयास को विफल कर दिया गया है। उसी तरह राफेल मामले कुछ धूर्त मीडिया कर्मियों को धूर्तता से यह दावा करते देखा गया है कि एचएएल को रिलायंस से प्रतिस्थापित कर दिया गया है।

सरकार पर दोष लगाना और आलोचना करना पूरी तरह से न्यायसंगत है बशर्ते कि आरोप तथ्यों का समर्थन करें। इस उम्मीद में कि कुछ आरोप सही साबित हो सकते हैं, निराधार आरोप लगाना बहुत ही अनुचित बात है। प्रशंसा पाने के लिए झूठे आरोप परिवेश को खराब करते हैं और भारत का रक्षा आधुनिकीकरण संघर्ष करता है। यहाँ तक कि सबसे साहसी और सबसे समझदार नेता और अधिकारी बाद में होने वाली जाँचों से डर जाते हैं। मीडिया को निश्चित रूप से भ्रष्टाचार और दुराचारों को उजागर करना चाहिए, लेकिन हर रक्षा सौदे की आलोचना जरूरी नहीं है। सरकार विरोधी रवैया राष्ट्र विरोधी रवैये में परिवर्तित नहीं होना चाहिए।

लेखक कारगिल-सियाचिन क्षेत्र में अपनी रेजिमेंट के कमांडर और पोखरण परमाणु परीक्षण के टास्क फोर्स कमांडर रह चुके हैं। वह एक शानदार लेखक हैं और इन्हें भारत के रक्षा उद्योग, खरीद व्यवस्था और ऑफसेट के असंख्य पहलुओं का अग्रगण्य विशेषज्ञ माना जाता है।