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फिल्म समीक्षा- निष्कर्ष सौंपती नहीं सोचना सिखाती है द ताशकंद फाइल्स

25 साल के लेखन में मैंने फिल्मों पर शायद ही कभी लिखा हो। फिल्में देखता हूँ लेकिन उसके बारे में कभी लिखा नहीं। हाल ही में एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर और ठाकरे देखीं, जो हमारे ही समय की दो विभूतियों पर केंद्रित थीं। मणिकर्णिका और केसरी भी देखीं, जो डेढ़ सौ साल पहले के हमारे जंगी इतिहास पर बनीं। आज द ताशकंद फाइल्स देखी तो रहा नहीं गया। इसके निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की भी यह पहली ही फिल्म है, जो मैंने देखी। पिछले साल भोपाल में यूथ थिंकर्स फोरम के कॉन्क्लेव में उन्हें सुनने का मौका ज़रूर मिला था। यह फिल्म सबको देखना चाहिए। मीडिया से जुड़े मित्रों को तो ज़रूर ही देखना चाहिए, जो खबरों पर काम करते हैं, अफवाहों की चीर-फाड़ करते हैं ताकि सच की आखिरी परत तक पहुँच सकें।

यह फिल्म देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में हुई असामयिक मृत्यु पर केंद्रित है। आज़ाद भारत में दो महान हस्तियों की मृत्यु के सच पर पड़े परदे ने लगातार जिज्ञासा और सवाल खड़े किए हैं। एक, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और दूसरे लाल बहादुर शास्त्री। द ताशकंद फाइल्स किसी अंतिम निष्कर्ष को सामने नहीं रखती कि शास्त्रीजी की मौत क्यों हुई या उसके पीछे किसका हाथ था? जिनका हाथ था, उनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कौन दुष्ट लोग थे या केजीबी या सीआईए की क्या भूमिका थी। लेकिन एक इन्वेस्टीगेटिव स्टोरी की तरह शास्त्रीजी की मौत से जुड़े हर संभव और उपलब्ध तथ्यों तक गहराई से जाकर यह जानने की कोशिश जरूर की गई है कि हुआ क्या था और उनकी मृत्यु के बाद जो होना चाहिए था, वो नहीं हुआ। अगर उनकी मौत से जुड़े किसी सच को दबाया गया तो वो सच क्या थे और यह बात दर्शकों पर छोड़ दी गई है कि वे विचार करें कि उस सच को दबाने के पीछे किनके फायदे थे। इशारों में ही यह फिल्म एक तरह से पूरे सच को सामने रख देती है। दुष्ट राजनीति की दुखद परिणति की एक बेहद मार्मिक कहानी है यह फिल्म, जो देश के एक साधारण परिवार के सपूत की मौत पर केंद्रित है। एक ऐसा इंसान जिसे नियति ने भारत का प्रधानमंत्री बनाया।

विवेक अग्निहोत्री ने एक अखबार की नौजवान रिपोर्टर के जरिए शास्त्रीजी की मौत की फाइल की पड़ताल की है। शायद इसलिए कि आज के युवा ही लोकतंत्र के फरेब पर कुछ निर्णायक कर सकते हैं। बाकी सारी स्थापित धाराओं के अपने निहित स्वार्थ तय हैं और वे इस रंगमंच पर सिर्फ तयशुदा भूमिकाओं में हैं, जिन्हें न सच से मतलब है, न देश से लेना-देना है। उनकी अपने लाभ-शुभ बने रहें, सब भाड़ में जाए। इसलिए मिथुन चक्रवर्ती शास्त्रीजी की मौत की पड़ताल के लिए बनी कमेटी के मेंबरों से एक बांधे रखने वाले सीन में कहते हैं-ज्युडिशियल टेररिज्म, इंटलेक्चुअल टेररिज्म, पॉलिटिकल टेररिज्म, सोशल टेररिज्म की तोहमत जड़ते हैं। ढेरों सरकारी जाँच समितियों की तरह इस समिति में भी ये मेंबर समाज के इन सब क्षेत्रों से आए हैं और उन्हें सिर्फ अपनी पोजीशन और फायदे के संकुचित दायरे में ही शास्त्रीजी की मौत के सच की चीरफाड़ करनी है। यह फिल्म लाल बहादुर शास्त्री को श्रद्धांजलि स्वरूप दिल्ली की लुटियन जोन के ताकतवर रहवासियों पर प्रहार करने वाला बड़े परदे पर लिखा गया विजुअल एडिटोरियल है।

लाल बहादुर शास्त्री बिल्कुल ही साधारण पृष्ठभूमि से आए सीधे-सच्चे राष्ट्रवादी नेता थे, जिन्हें नेहरू की सत्ता का उत्तराधिकार मिला। लेकिन दुर्भाग्य से वे हमारी स्मृति से लगभग लुप्त ही हैं, क्योंकि यह देश सिर्फ गांधी और नेहरू का है। इसमें किसी और को शेयर करना ईशनिंदा जैसा हो गया। दो अक्टूबर को बापू की जयंती सबको याद रही लेकिन उसी दिन शास्त्रीजी भी जन्में यह हाशिए पर पड़ी जानकारी भी नहीं रही। 50 साल तक सरकारी विज्ञापनों में भी उन्हें उसी तरह कोने में रखा गया, जैसे मदनमोहन मालवीय या दूसरे स्वाधीनता संग्राम सेनानियों और आजाद भारत के दूसरे महान लीडरों को उपेक्षित रखा गया। देश को आजादी दिलाने और महान नेतृत्व पर वंशानुगत एकाधिकार जो रहा।

फिल्म के अंतिम और विचारोत्तेजक दृश्य में केजीबी के एक पूर्व अफसर की लिखी किताब-केजीबी एंड द वर्ल्ड- मित्रोखिन अर्काइव- अंतिम सबूत की तरह पेश होती है। इसके कुछ ब्यौरे एकदम अंतिम दृश्य में छपे हुए दस्तावेज की तरह परदे पर आते हैं। इनके हर शब्द और हर वाक्य को पढ़ा जाना चाहिए।

मैं हर जगह कहता हूँ कि भारतीयों का इतिहास बोध बहुत कमजोर है। हमारी इतिहास में बहुत दिलचस्पी नहीं है। उसे एक उबाऊ विषय समझा गया। रिसर्च का पहलू भी हमारा कमजोर है और इस कमजोरी का बड़ा नुकसान यह है कि हम सवाल नहीं कर पाते। इसका फायदा वे लोग उठाते रहे हैं, जो झूठ को बड़ी कुशलता से सच की तरह गढ़कर हमारे दिमागों में बैठाने के हुनरमंद हैं। इतिहास के नाम पर सबसे बड़े झूठ किताबों में डाले गए हैं। सच को छिपाकर रखा गया।

फिल्म बताती है कि किस आसानी से शास्त्रीजी की मौत के दस साल के भीतर संविधान में सोशलिज्म शब्द डाल दिया गया। ऐसा शास्त्रीजी के रहते संभव नहीं था। जिस समय यह हुआ, उस समय इमरजेंसी लगी थी। भारत का पूरा विपक्ष जेलों में ठूँस दिया गया था। मीडिया का मुंह बंद कर दिया गया था। ठीक इसी समय केजीबी के सबसे ज्यादा जासूस भारत में सक्रिय थे। दुनिया भर में सबसे ज्यादा संख्या में सिर्फ भारत में खुलेआम सक्रिय थे और उन दिनों में किस पार्टी को कितना माल दिया गया, इसकी डिटेल। मित्रोखिन अर्काइव के ये तथ्य सामान्य भारतीयों की नींद हराम करने के लिए काफी हैं।

विपक्षी पार्टी के नेता बने मिथुन चक्रवर्ती आखिर में कहते हैं कि अब चुनाव में यह मुद्दा बनेगा, राजनीति में जीतने के मायने हैं। हारा हुआ नेता देश की तकदीर नहीं बदल सकता। तो चुनावी मौसम में यह फिल्म शास्त्रीजी के बाद की देश की लीडरशिप का कच्चा चिट्‌ठा सामने लाई है। इसमें कोई मसाला नहीं है। किसी विचारधारा की पैरवी नहीं है। कोई पूर्वाग्रह नहीं है। बस लाल बहादुर शास्त्री हैं और उनकी मौत से जुड़े कुछ सवाल हैं। जब तक उनका सच सामने नहीं आता, वे प्रासंगिक भी बने रहेंगे। और जिन्हें हम महान नेता मानकर पूजते आए हैं, उनके व्यक्तित्व के शर्मनाक और स्याह पहलू भी हैं।

आज कौन किस मुँह से वोट मांग रहा है, जरा वह अपनी विरासत को पलटकर झाँककर भी देख ले!

उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं।