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तांडव वेब सीरीज़ विवाद का संकेत- ओटीटी मंचों के लिए नियमों की आवश्यकता

तांडव वेब सीरीज़ ने पिछली अन्य ऐसी सीरीज़ों के समान हिंदू धर्म की आस्था और धार्मिक भावनाओं को एक बार फिर जान-बूझकर आहत किया है। इस सीरीज़ में भगवान शिव को एक अत्याधुनिक पुरुष के रूप में आड़ी-तिरछी रेखाओं का चेहरा बनाए हुए दिखाया गया है जिसमें उनका मज़ाक उड़ाने की बात किसी से छिपी नहीं है।

सभी जानते हैं कि भगवान शिव का स्थान हिंदू धर्म में स्वीकार किए गए एकमात्र पूर्ण, सर्वशक्तिमान, सर्वव्याप्त एवं अविनाशी ब्रह्म के तीन रूपों अर्थात ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश या शिव में से एक तथा उन्हीं के समान सर्वोच्च एवं पवित्रतम है। हिंदू धर्म के अनुसार तीनों ईश्वर एक ही ब्रह्म के तीन रूप हैं जहाॅं सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्मा, पालनकर्ता विष्णु तथा संहारकर्ता शिव अनादि काल से स्थापित हैं।

अतः भारत तथा संपूर्ण विश्व में रह रहे लाखों करोड़ों हिंदुओं की कालातीत आस्था के प्रतीक ऐसे सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान पूर्ण ब्रह्म को एक साधारण नाटकीय रूप में दिखाना निश्चय ही उनका मज़ाक उड़ाना तथा उन आस्थावान हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं पर गंभीर कुठाराघात करना नहीं है तो और क्या है। इसी प्रकार से ओटीटी पर कई अन्य वेब सीरीज़ में अभद्रता और अश्लीलता का नंगा नाच दर्शकों को दिखाया जा रहा है जिनका लक्ष्य कहीं न कहीं हिंदुओं की सामाजिक व्यवस्था तथा धार्मिक कर्मकांड आदि का उपहास करना ही होता है।

लगभग दो दशक पहले देश के एक तथाकथित प्रख्यात चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने हिंदू धर्म के अनुसार विद्या एवं संगीत की देवी माॅं सरस्वती का अभद्र चित्र दिखाकर हिंदू धर्म की भावनाओं को आहत किया था। उनके अन्य कुछ चित्रों में भी इसी प्रकार का हिंदू धर्म-विरोधी विद्रूप चित्रण देखा गया था जिसका जनता ने पुरजोर विरोध किया था।

जैसा देखा जा रहा है कि पिछले कई वर्षों से देश के फिल्म उद्योग और मीडिया जगत, जिसमें प्रिंट मीडिया भी शामिल है, इसी प्रकार फिल्मों के माध्यम से या मनोरंजनकारी कार्यक्रमों/धारावाहिकों द्वारा हिंदू धर्म को नीचा दिखाने और हिंदुओं को अपमानित करने का कार्य करते आ रहे हैं।

अभी कुछ महीने पहले रिलीज़ हुई वेब सीरीज़ मिर्ज़ापुर में एक ब्राह्मण को बुरा दिखाया गया है जबकि इसके विपरीत एक मुसलमान को अच्छा प्रदर्शित किया गया है। ऐसा ही परिदृश्य पूर्व की कई फिल्मों में भी दिखाया गया था जहाॅं एक मंदिर का हिंदू पुजारी बहुत भ्रष्ट और चरित्रहीन होता है, वहीं एक मौलवी बेहद चरित्रवान और हर प्रकार से पाक साफ होता है। वस्तुतः अच्छाई और बुराई सभी के अंदर होती है जो कि सामान्य मानव स्वभाव होता है और इसका किसी धर्म विशेष से कोई संबध नहीं है।

ऐसे वातावरण में एक प्रश्न साफ तौर पर उठता है कि हिंदू धर्म को आहत करने से इस वेब सीरीज़ के निर्देशक अली अब्बास ज़फर या कलाकारों या अन्य लोगों को क्या मिलता है। इन लोगों का हिंदुओं ने क्या नुकसान किया है जिसकी वजह से ये लोग हिंदू धर्म से ईर्ष्या करते हैं और हिंदुओं से बैर रखते हैं।

हिंदुओं को शांत माना जाता है जिस कारण आक्रमणकारी तथा अशांत किस्म के पंथ उन्हें कायर तथा अकर्मण्य मानते हैं। निस्संदेह हिंदुओं के प्रति ऐसी धारणा देश और समाज के लिए विभाजनकारी है जो हिंदुओं में भी प्रतिक्रिया और उग्रवाद को बढ़ावा दे रही है।

यद्यपि इस विवाद का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू भी है जिसके अनुसार इस वेब सीरीज़ को जान-बूझकर विवादास्पद करना तथा इसके द्वारा दर्शकों में उत्सुकता बढ़ाकर ज्यादा से ज्यादा कमाई करना है तथा विरोध किए जाने पर एक पंक्ति में माफी मांग लेना है जैसा कि तांडव के विवाद में भी हुआ है क्योंकि ओटीटी पर प्रदर्शन के संबध में न कोई सेंसर बोर्ड है, न ही भारत सरकार को कोई दंडात्मक प्रावधान है जिससे ऐसे कार्यक्रमों के निर्माता, निर्देशक और कलाकार डरें और इस प्रकार के वैमनस्य को पैदा कर मुनाफा कमाने का घोर आपराधिक कृत्य कदापि न करें।

अतः देश में ओटीटी पर ऐसे वेब सीरीज़ों के प्रदर्शन के संबंध में भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा निर्मित दिशा निर्देशों एवं कठोर कानूनों की तत्काल आवश्यकता है जिससे कोई भी व्यक्ति या समुदाय इस प्रकार के अश्लील चित्रण या प्रदर्शन द्वारा किसी समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाओं पर कुठाराघात कदापि न कर सके, जिससे भारतीय समाज में अभद्रता फैले और सामाजिक सौहार्द को खतरा पैदा हो या फिर इन कारणों से अकारण ही अशांति का तांडव शुरू हो जाए तथा देश की सामाजिक संस्कृति को गंभीर चोट पहुॅंचे।

सुधांशु त्रिपाठी उत्तर प्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज में प्राध्यापक हैं।