ब्लॉग / भारती
रग्बी के खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों पर आधारित फिल्म में कर्म हेतु प्रेरित करते गीता के उपदेश

सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्म “रिमेम्बर द टाइटन्स” का शुरुआती दृश्य किसी के अंतिम संस्कारों के लिए जुटे रग्बी खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों पर है। फिर तुरंत ही कहानी 1981 से सीधा 10 वर्ष पीछे अलेक्ज़ेंड्रिया (वर्जिनिया) के टीसी विल्लियम्स हाई स्कूल में पहुँच जाती है। वहाँ हरमन बून नाम के एक कोच को अश्वेतों के रग्बी टीम को प्रशिक्षित करने की ज़िम्मेदारी मिली होती है।

उस वक्त तक ये ज़िम्मेदारी गोरे कोच बिल योस्ट की थी। योस्ट को वर्जिनिया हाई स्कूल हॉल ऑफ़ फ़ेम के सम्मान के लिए नामांकित भी किया गया था। उस वक्त तक गोरे-काले का भेदभाव बढ़ने लगा था और बाकी सभी स्कूलों में सिर्फ गोरे ही थे। स्कूल का प्रबंधन बून को मुख्य कोच घोषित करके राजनीतिक बढ़त लेना चाहता था।

जब बून को यह पता चलता है तो पहले तो वह सोचता है कि यह बिल योस्ट के साथ अन्याय होगा, लेकिन जब उसका ध्यान जाता है कि अश्वेतों के लिए ये कितना मायने रखता है, तो वह मान भी जाता है। दूसरी तरफ जब योस्ट सहायक कोच के रूप में काम नहीं करना चाहता है तो गोरे छात्र खेलना छोड़ देने की बात करते हैं। कहीं उनकी छात्रवृति न रुक जाए, इसलिए बिल योस्ट सहायक कोच बन जाता है।

शुरुआत में गोरे-काले छात्रों में खींच-तान होती है लेकिन बून किसी तरह बिल योस्ट को अपने साथ मिलकर काम करने के लिए मनाने में सफल हो जाता है। वे सभी अपनी ट्रेनिंग की जगह पर जाते हैं और ट्रेनिंग शुरू तो होती है लेकिन रंगभेद जैसी वजहों से अक्सर उनमें झगड़ा भी होता था। दोनों टीमों के कप्तान गेर्री और जूलियस भी इसमें शामिल रहते।

बून अभ्यास को और कड़ा कर देता है और एक प्रेरक संवाद भी देता है जिसके बाद ऐसी मार पीट बंद होने लगती है। बून को उसके स्कूल का प्रबंधन बताता है कि अगर उसकी टीम एक भी मैच हारी, तो उसे निकाल बाहर किया जाएगा। उनकी ये टाइटन नाम की टीम नस्ली भेदभाव को झेलते हुए भी अविजित रहती है।

रंगभेद को भुलाकर टीम के लोगों की स्थिति ऐसी हो जाती है कि जब गेर्री का एक करीबी दोस्त ऐसा भेदभाव करता है तो वह उसे निकलवाने से भी नहीं हिचकता। सेमी-फाइनल से पहले बिल योस्ट को भी स्कूल प्रबंधन तोड़ने की कोशिश करता है।

मैच के रेफरी बेईमानी करने की कोशिश करते हैं लेकिन अब बिल योस्ट ही उल्टा उन्हें धमकाकर सही तरीके से पेश आने कहता है। प्रबंधन के लोग बाद में बिल योस्ट से कहते हैं कि हॉल ऑफ़ फ़ेम का सम्मान तो वह भूल ही जाए।

जीत की ख़ुशी मनाते वक्त गेर्री एक कार दुर्घटना की वजह से अस्पताल पहुँच जाता है। वह खेल नहीं पाता लेकिन फिर भी “टाइटन” की टीम मैच जीतती है। गेर्री उस दुर्घटना में हमेशा के लिए अपंगता का शिकार हो जाता है लेकिन वह बाद में एक पैरालिंपिक खेलों में शॉट पुट में स्वर्ण पदक जीतता है।

अब फिल्म फ़्लैश बैक से वापस आ चुकी होती है और पता चलता है कि गेर्री को किसी ने नशे में गाड़ी चलाते वक्त टक्कर मार दी थी, और सभी लोग उसी के अंतिम संस्कार में 10 वर्ष बाद इकठ्ठा थे। फिल्म के अंत में बताया जाता है कि उस टीम के कोच और सदस्यों ने 1971 की घटनाओं के बाद क्या किया। फिल्म के अधिकांश किरदार असली थे इसलिए उनका भविष्य देखना सुखद आश्चर्य जैसा है।

फिल्म में कई प्रेरक संवाद हैं, और कलाकारों के अभिनय के बारे में कुछ भी अलग से कहने की आवश्यकता नहीं है। रग्बी के प्रेमी ना भी हों, तो भी आपको फिल्म इसके अभिनय और संवादों के लिए पसंद आएगी। जैसा कि जाहिर है, लेखक इस फिल्म की कहानी इसके प्रेरक होने, या इसपर कोई समीक्षा लिखने के लिए नहीं सुना रहे थे। हमने हमेशा की तरह आपको फिल्म की कहानी के धोखे में फिर से भगवद्गीता पढ़ा दी है।

यहाँ शुरुआत में हरमन बून और बिल योस्ट दोनों की दशा देखने लायक है। बून किसी भी वजह से योस्ट की जगह नहीं हथियाना चाहता इसलिए वह कोच नहीं बनना चाहता। उसके मुख्य कोच बनने पर बिल योस्ट को लगता है कि उसे हॉल ऑफ़ फ़ेम में स्थान मिलने वाला है और केवल अश्वेत होने के कारण बून को जगह दी जा रही है। इस वजह से वह भी कोच नहीं बनना चाहता।

उन दोनों का इस बात पर ध्यान नहीं होता कि उन्हें देखकर उनकी प्रेरणा से कई लोग काम करते हैं, उनके ये काम नहीं करने से पूरे समाज का नुकसान होगा। यही बात भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में 23वें और 24वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।3.23
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः।।3.24

मोटे तौर पर यहाँ श्री कृष्ण कह रहे हैं कि अर्जुन अगर मैं कर्म न करूँ, तो पूरे संसार की क्षति करूँगा, क्योंकि मुझे कर्म करते देखकर उसकी प्रेरणा से ही दूसरे कई लोग कर्म करते हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे अगर बून और योस्ट टीम में नहीं शामिल होते तो खिलाड़ी भी टीम में नहीं आते।

यहीं पर यह भी देखिए कि बिल योस्ट की बेटी शेरिल को योस्ट के टीम के सहायक कोच के तौर पर शामिल होने से निराशा हो रही होती है। ऐसी ही स्थितियों के लिए दूसरे अध्याय के 29वें श्लोक में कहा गया है –

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोतिश्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।।2.29

यहाँ कहा जा रहा है कि कोई इसे आश्चर्य की तरह देखता है, कोई इसके विषय में ऐसे बताता है जैसे कितना बड़ा आश्चर्य हो रहा हो, दूसरे लोग इसे किसी आश्चर्यजनक घटना की तरह सुनते हैं और फिर भी कई तो सुनकर भी नहीं समझ पाते।

सामुदायिक हित के लिए व्यक्तिगत अहंकार या लाभ की आशा छोड़ते हुए बिल योस्ट को शेरिल भी एक आश्चर्य की तरह देखती है और समझना नहीं चाहती। करीब-करीब इसी से मिलती-जुलती बात आपको सातवें अध्याय के तीसरे श्लोक में दिखेगी-

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।7.3

यहाँ कहा जा रहा है कि हज़ारों में शायद ही कोई सिद्धि पाने के लिए यत्न करते हैं और जो प्रयास करते हैं, उनमें से भी कोई-कोई ही तत्व को जान पाते हैं। मगर इस श्लोक (भगवद्गीता 7.3) को समझना हो तो इस बार शेरिल को नहीं टीम के कप्तान गेर्री बर्टीयर के मित्र रे को देखिए। काफी प्रयास करने के बाद भी वह सीखता नहीं और अंततः टीम से बाहर हो जाता है।

यहाँ पूरी टीम का गैटिसबर्ग कॉलेज पहुँचकर अभ्यास शुरू करने वाले दृश्य भी महत्वपूर्ण हैं। वहाँ एक प्रेरक संवाद/भाषण है जब सुबह-सुबह सबको गैटिसबर्ग सेमेट्री तक दौड़ लगानी होती है। इसे देखते समय अर्जुन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न याद रखिए। छठे अध्याय के 33वें और 34वें श्लोक में अर्जुन पूछ रहे होते हैं कि मन तो बहुत ही चंचल है, इसे वश में करना संभव भी है क्या? इसका जवाब 35वें श्लोक में है –

श्री भगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।6.35
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः।।6.36

यहाँ भगवान बताते हैं कि मन को वश में करना बहुत कठिन कार्य ज़रूर है, लेकिन अभ्यास और वैराग्य के द्वारा ऐसा किया जा सकता है। बिना संयत मन के योग प्राप्त करना संभव नहीं।

खिलाड़ी रोज अभ्यास ही कर रहे होते हैं। उन्हें पता नहीं है कि इस रोज की दौड़ से उनकी खेल भावना, एक टीम की तरह काम करने की इच्छा, भेदभाव छुआछूत से दूर रहने के भावों पर कोई असर हो रहा है या नहीं।

जैसे ही स्थिति बनती है तो अचानक गेर्री बदल चुका होता है, वह रे से दूरी बना लेता है और जो खिलाड़ी जीतेंगे या नहीं, ये पता ही नहीं था, वे एक टीम की तरह खेलते हुए मैच पर मैच लगातार जीतने लगते हैं! कोई विशेष प्रयास कहाँ, केवल अभ्यास ही तो था न?

फिल्म का गेर्री बर्टीयर पूरे, अंतिम दौर तक नहीं खेल पाता। वह पहले ही दुर्घटनाग्रस्त होने के कारण अपंग हो गया था। इस किरदार को देखते समय अर्जुन का छठे ही अध्याय में पूछा गया प्रश्न याद किया जा सकता है –

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि।।6.38

यहाँ अर्जुन पूछ रहे होते हैं कि अगर किसी ने प्रयास तो किये मगर अधूरे ही कर पाया, किसी वजह से उन्नति की दिशा में किया गया प्रयास अधूरा ही रह गया तो वह साधक वैसे ही तो नहीं बिखर जाता जैसे तेज हवा से बादल इधर-उधर (बिना बारिश किये ही) बिखर जाते हैं?

इसके जवाब में भगवान कहते हैं कि ऐसा भी नहीं होता। अगले जन्मों में उसे इसका फल मिलेगा और जहाँ तक वह पहले पहुँच चुका था, उससे आगे के प्रयास करने के उसे पूरे अवसर मिलेंगे –

श्री भगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति।।6.40

आगे कुछ श्लोकों में भगवान बताते हैं कि उसके प्रयासों के लिए उसे स्वर्ग इत्यादि तो मिलेगा ही, आगे उसे पहले से और बेहतर प्रयास करने के अवसर भी आसानी से उपलब्ध होंगे। ठीक वैसे ही जैसे टीम में न होने पर भी पहले तो गेर्री बर्टीयर को टीम की जीत का यश और उनके साथ का मौका उपलब्ध होता है। आगे वह जीत वाला फाइनल मैच नहीं खेल पाता तो पैरलिंपिक में शॉटपुट में गोल्ड मैडल लेने का मौका उसके लिए उपलब्ध हो जाता है।

बाकी प्रेरक कथाओं में भगवद्गीता देख लेना बिलकुल सहज है, लेकिन फिर भी ये जो बताया वो नर्सरी के स्तर का है। आपको पीएचडी के लिए स्वयं ही पढ़कर प्रयास करने होंगे, ये तो याद ही होगा?

आनन्द प्रबंधन के क्षेत्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई के बाद व्यापारिक शोध का काम करते हैं। वे उपशास्त्री हैं और वर्तमान में संस्कृत से स्नातक के छात्र हैं।