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सितार की धुनों से मदन मोहन के गीतों को सजाने वाले रईस खान— जाने वो भाग-10

दोपहर की राग भीमपलासी में जब आप ‘नैनों में बदरा छाए‘ सुनेंगे तो गीत खत्म होने के बाद बोलों के अलावा सितार की धुन भी आपके ज़ेहन से निकल नहीं पाएगी। भारतीय फ़िल्मी संगीत का यह वह काल था जब बदलाव अपने चरम पर था। यहाँ तक कि नौशाद साहब ने भी केर्सी लॉर्ड को अपने साथ जोड़कर संगीत को बदलने में अपनी हामी भर दी थी। 

मदन मोहन साहब भी, जो कि हिंदी फ़िल्म संगीत में ग़ज़ल के शिल्पकार के रूप में जाने जाते हैं, कुछ नया करना चाह रहे थे। केर्सी को उन्होंने हँसते ज़ख्म के लिए अपने साथ जोड़ ही लिया था। लता जी के सुर मदन जी के गीतों को एक अलग रंग दे देते थे। किंतु जब मदन जी को अपने गीतों मे, संगीत में, जब एक नई जान फूंकने का मन किया तो उन्होंने सितार को चुना था और फिर देखते ही देखते सितार उनके संगीत का अभिन्न अंग बन गया था। 

आप जैसे लता जी को मदन जी से अलग नहीं कर सकते, वैसे ही आप सितार की धुनों को मदन जी के संगीत से जुदा नहीं कर सकते। मदन साहब की किसी भी रचना में आप जब सितार सुनेंगे तो आप उस्ताद रईस खान को याद अवश्य करेंगे।

मदन मोहन उस्ताद रईस खान के बिना काम ना के बराबर करते थे। उनके कई गीतों में चाहे वह ‘माता-ए-कूचा’ हो या ‘आज सोचा तो आँसू भर आए’ में आपको दिलकश सितार सुनाई दे ही जाएगा। पाकीज़ा के पूरे बैकग्राउंड स्कोर में उनके सितार का ख़ास कमाल देखा जा सकता है। ख़ास तौर पर वह दृश्य जब राजकुमार पहली बार मीनाकुमारी के पैरों को देखते हैं।

रईस खान का जन्म 25 नवंबर 1939 को इंदौर, मध्य प्रदेश, ब्रिटिश भारत में हुआ था। भोपाल में पले-बढ़े रईस खान ने अपनी उच्च शिक्षा मुंबई के सेंट ज़ेवियर्स में पूरी की। उनकी तालीम मेवात घराने से आई, जहाँ उन्होंने अपने पिता मोहम्मद खान, जो सितार और रूद्र वीणा वादक थे, के तहत अपनी बीनकर शैली को जारी रखा। बताया जाता है कि उनका प्रशिक्षण बहुत कम उम्र में नारियल के खोल वाले सितार पर शुरू हुआ था 

अपनी सफलता का वो पूरा श्रेय अपनी सख्त माँ को देते थे, जिन्होंने उन्हें मिठाई का लालच दे-देकर अभ्यास कराया था। संगीतकारों और उनके पिता के दोस्तों उन्हें सितार बजाने के लिए चॉकलेट की रिश्वत दिया करते थे और आठ साल की उम्र में अखबारों ने उन्हें “चॉकलेटी संगीतकार” का तमगा दे डाला था। 

1955 में 16 साल की उम्र में, खान साहब को वारसॉ में अंतर्राष्ट्रीय युवा महोत्सव में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया, जहाँ 111 देशों ने उस स्ट्रिंग सम्मेलन में भाग लिया था। छह देशों ने सर्वश्रेष्ठ संगीत का खिताब जीता और भारत को उनके बीच पहला पुरस्कार मिला था। खान साहब ने स्वर्ण पदक और डिप्लोमा प्राप्त किया और दर्शकों को बड़ा आश्चर्य हुआ था जब उन्हें पता चला कि वह वहाँ के सबसे कम उम्र के संगीतकार थे।

रईस खान का सितार वादन किसी काले जादू से कम नहीं था। किसी भी कार्यक्रम में एक उस्ताद को या एक नौसीखिए श्रोता दोनों को चौंका सकते थे। उनके मामा विलायत खान, जो उनके सबसे धुर विरोधी भी थे, द्वारा भी प्रशंसा की जाती थी। कहते थे, “उसके हाथ बहुत सुंदर हैं लेकिन समस्या उसके दिमाग में है!”

अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि 1972 में उन्होंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पढ़ा कि गोपी किशन जी ने लगातार सात घंटों तक मंच पर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया था। उसके बाद बिरला हॉल मुंबई में सितारा देवी ने यही कमाल लगातार नौ घंटे तक करके दिखाया था। 

खान साहब को भी जोश चढ़ गया और उन्होंने लगातार 18 घंटों तक सितार बजाकर रिकॉर्ड बना डाला था जो आज तक कोई तोड़ नहीं पाया। वह बात अलग है कि इस दौरान तीन महारथी तबला वादकों बशीर अहमद, लतीफ़ अहमद और पंडित समता प्रसाद ने हाथ जोड़ लिए थे। पूरे कार्यक्रम के दौरान एक बर्फ की बाल्टी खान साहब के बाजू में थी उनकी उँगलियों से बहते हुए खून रोकने के लिए। 

निम्न गीतों में आप सितार ढूंढ लीजिए, आपको निराशा नहीं होगी। आप संगीत की अलग दुनिया में ही पहुँच जाएँगे। मेरी आँखों से कोई नींद लिये (1964), सपनों में अगर मेरे (1967), मैंने रंग ली आज चुनरिया (1968), तुम जो मिल गए हो (1974), आदि।