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कैसे प्रोपगेंडा प्रोफेशनलों ने ध्यानाकर्षण से नैरेटिव सेट कर हिंसक प्रदर्शनों को भड़काया

प्रसंग- सीएए के विरोध में फैलाए गए प्रोपगेंडा की पोल खोल।

नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएए) केवल पड़ोसी तीन देशों में धर्म के आधार पर सताए गए अल्पसंख्यकों के लिए है। इसका भारत के नागरिकों से कोई लेना देना नहीं है। यह बात पहले से स्पष्ट थी। कानून बनने के दो दिन तक कोई विरोध नहीं हुआ, फिर राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस रैली में इसे भारत के मुसलमानों के विरुद्ध बताने की कोशिश की गई। और कांग्रेस का छात्र मोर्च एनएसयूआई अफवाह फैलाने में लग जाता है।

जल्द ही कांग्रेस और एनएसयूआई को मीडिया और विश्वविद्यालयों में बैठे वामपंथियों का साथ मिल जाता है। फिर अफवाह से साथ-साथ कई तरीके अपनाए जाते हैं जिससे सीएए को मुसलमान विरोधी साबित किया जा सके। मीडिया और पीआर एजेंसियों में बैठे वामपंथी बड़े ही सुनियोजित तरीके से मुसलमानों के मन मस्तिष्क में सीएए की एक मुसलमान विरोधी छवि बनाने में लग जाते हैं।

देखने में सीधे सपाट लगने वाले ये संदेश अंजान और कम समझ वालों के मन में गलत भावनाएँ भरने में बहुत कारगर हैं। इस संदेश को समझने की ज़रूरत है। उदाहरण के तौर पर एक मॉडल-सा दिखने वाला बंदा तख्ती लेकर खड़ा दिखाया जाता है, जिसमें लिखा होता है, ‘हिंदू हूँ, चूतिया नहीं’- यहाँ यह मेसेज दिया जा रहा है कि अगर तुम हिंदू होकर सीएए के समर्थन में हो तो चूतिया हो। अप्रत्यक्ष रूप से हिंदुओं को गाली देने वाले इस फोटो को ऋचा चड्ढा और सागरिका समेत कई प्रमुख वामपंथी सेलेब्रिटीज़ ने ट्वीट किया।

मीडिया में जेएनयू वालों का अच्छा खासा दबदबा है, इसी लिए जेएनयू बार-बार सुर्खियों में भी रहता है। सीएए के विरोध में जेएनयू में मार्क्स के बाप बनकर लोग कम समझदार मुसलमानों को दंगा भड़काने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु हर हथकंडा अपना रहे हैं- भय, डर, मानवाधिकार और इस्लाम। कौम से लेकर सेक्स तक हर तरीका इस्तेमाल हो रहा है।

जेएनयू की एक छात्रा ने तो सीएए के बहाने अपने अनेक मुस्लिम प्रेमियों के लिए सॉफ्ट-पोर्न तक लिख डाला है। जी हाँ, दंगाइयों के प्रति उनके समर्थन का एक हिस्सा यह भी है। अपने अंतरंग संबंधों वाली कहानी सुनाकर इन्होंने यह साबित करना चाहा कि सीएए भारतीय मुसलमानों के खिलाफ है। इन मोहतरमा ने अपनी रंगीन मिजाज़ी को सरेआम इसलिए किया ताकि सीएए के विरुद्ध गलतफहमी को मनोरंजक तरीके आम जनता के मन मष्तिष्क में पुख़्ता किया जा सके।

सेक्स को प्रोटेस्ट की तख्तियों पर भी इस्तेमाल किया गया। सुंदर दिखने वाले नौजवान की तख्ती पर यह लिखा गया कि विशेषाधिकार वाले लोग भी यहाँ हैं क्योंकि यह बुरा है। सोचने कि बात है कि सेक्स और विशेषाधिकार वाले लोगों का सीएए से कोई लेना देना नहीं तो फिर उनका इस्तेमाल क्यों? ये सारी कवायद ध्यानाकर्षण कर नैरेटिव सेट करने की थी।

दीग़र बात यह है कि इन कामरेड-कामरेडियों ने पाकिस्तान और बांग्लादेश में दलितों, ईसाइयों, हिंदुओं, सिखों समेत कई अल्पसंख्यक (जो वास्तव में अल्पसंख्यक हैं) के सामूहिक नरसंहार पर कभी अफ़सोस तक नहीं ज़ाहिर किया है। जेएनयू का आलम यह है कि फिलिस्तीन का कोई जिहादी घायल हो जाता है तो ये सभी नशेड़ी गंगा ढाबा तक जुलूस निकालते हैं, लेकिन पड़ोस के देशों में आए दिन हो रहे कत्लेआम पर ख़ामोश रहते हैं (शायद मन ही मन खुश भी होते होंगे)।

अपने नैरेटिव को पुख्ता करने के लिए इन लोगों ने एक जर्मन नागरिक को खोज निकाला और उसे भारत के लोगों को उनके पोते-पोतियों का कसम खिलाते पोस्टर पकड़ा दिया गया। मेसेजिंग यह कि सीएए के खिलाफ विदेशी भी हैं जो तुम्हारा बुरा भविष्य बता रहे हैं।

अपनी अफवाहों और गालियों को आगे बढ़ाते हुए इन प्रोपगेंडा प्रोफेशनल ने कुछ प्रदर्शनकारियों को भाजपा के लिए वोट देने के लिए खुद को गाली देता हुआ दिखाया। कुछ पोस्टरों से यह बताया गया कि सीएए इतना बुरा है कि भक्त लोग भी यहाँ आ गए हैं। चींटी को ब्लू व्हेल बनाने का काम पूरी शिद्दत से चला।

चूंकि कांग्रेस पार्टी ने आधिकारिक तौर पर इस हिंसक आंदोलन कि शुरुआत की थी, अतः राफेल की दुहाई देता एक प्रदर्शनकारी मिला, उसकी तख्ती पर लिखा था कि मेरे कागज़ात राफेल फ़ाइल कि तरह गुम हो गए हैं। ध्यान देने की बात यह है कि सीएए भारत के नागरिकों के लिए है ही नहीं तो कागज़ात दिखाने न दिखाने का कोई मुद्दा ही नहीं है।

इनकी अफवाहों और प्रोपगेंडा का अंजाम बहुत बुरा हुआ, यह लेख लिखे जाने तक कई बस, व्यक्तिगत वाहन, पुलिस चौकियाँ और यहाँ तक की सार्वजनिक शौचालय तक जलाए जा चुके हैं। दंगा फैलाने वालों को पता नहीं है कि क्यों फैला रहे हैं, चूंकि यह बुरा है इसलिए फैला रहे हैं।

प्रोपगेंडा और नैरेटिव सेट करने का काम हिंसक दंगों को कमतर करके आँकने और शामिल जिहादियों की करतूतों को छुपाने के लिए भी किया गया। जामिया में दंगा करते समय नारा लगाया गया ‘हिंदुओं से आज़ादी’ और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ‘हिंदुत्व की कब्र खुदेगी’ के नारे लगे, लेकिन मीडिया के वामी रसूखदारों ने बड़ी सफाई के साथ इन घोर सांप्रदायिक नारों को छुपा दिया।

सीएए के विरोध में ‘नारा-ए-तकबीर’ और ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के इस्तेमाल के साथ-साथ ‘हमारे दिल में जिन्ना’ और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसे भड़काऊ नारों के इस्तेमाल के बावजूद इन बातों को आम जनता से बड़ी चालाकी से छुपाया गया।

बरखा दत्त की अगुवाई में जामिया के हिंसक प्रदर्शनों के लिए जिम्मेदार लदीदा सखलून और आएशा को विरोध की पोस्टर गर्ल्स बनाया गया लेकिन जब इन दोनों लड़कियों के जिहादी विचारों का पता चला तो चुपके से उनकी चर्चा को ही हटा दिया गया।

जामिया-सीलमपुर दंगों के एक हफ्ते बाद सीएए के विरोध के नाम पर दंगा करते हुए हिंसक मुस्लिमों की भीड़ ने पटना में हनुमान मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया। इसके बावजूद किसी मीडिया में कोई वाद विवाद नहीं हुआ।

एक जागरूक नागरिक के तौर पर हमें इनके नैरेटिव और प्रोपगेंडा का खुलासा करना चाहिए और मुस्लिम बहुल इलाकों में हो रहे हिंसक दंगो को रोकने में सरकार कि मदद करनी चाहिए। आम जनता की जान की कीमत विपक्ष की राजनीति से कहीं अधिक है, वामपंथियों के प्रचार से कहीं अधिक है।