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पर्क्यूशन यंत्र मादल से हिंदी फिल्मों में पहाड़ों का रोमांच लाने वाले रणजीत— जाने वो (18)

“पर्क्यूशन” का उद्भव  लैटिन शब्द “पर्क्युसियो” से हुआ है यदि इसे सरल शब्दों  में समझा जाए तो दो वस्तुओं को आपस में टकराकर ध्वनि उत्पन्न करना है। संगीत के संदर्भ में ड्रम, धातु की प्लेट्स और लकड़ी के ब्लॉक जैसे उपकरणों को “पर्क्यूशन इंस्ट्रूमेंट्स” की श्रेणी में रखा जा सकता है। हिंदी फिल्म संगीत में बरसों से इस श्रेणी के वाद्य यंत्र भारतीय फिल्मी संगीतकारों की संगीत रचनाओं में जान फूँकते आ रहे हैं। 

पर्क्यूशन को हिंदी फिल्म संगीत की रीढ़ की हड्डी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। तबला, ढोलक, दुग्गी, मादल, एकॉर्डियन, पियानो और ऑर्गन आदि जैसे पर्क्यूशन इंस्ट्रूमेंट्स कई बरसों से  हिंदी फिल्म की संगीत धुनों को एक नई चमक देते आ रहे हैं। हम कावस काका, केर्सी लॉर्ड साहब, होमी मुल्लन की बात पहले भी कर चुके हैं और आज बारी है रणजीत गजमेर साहब की जिन्हें लोग प्यार से कांचा भाई भी कहते हैं।

हिंदी फिल्म संगीत शुरुआत से ही भारतीय लोक संगीत पर काफी निर्भर करता रहा है। भारत के उत्तर-पूर्व के लोक संगीत को जिसने हिंदी फिल्मों से परिचय कराया उनका नाम है रणजीत गजमेर। उत्तर-पूर्व के लोक संगीत के साथ-साथ रणजीत गज़मेर अपने साथ “मादल” नामक एक वाद्य यंत्र भी लाए थे। मादल ड्रम और ताल का ऐसा प्रभाव पैदा करता था कि उनके द्वारा जोड़े गए संगीत में पहाड़ी परिदृश्य और पहाड़ी इलाके जैसे दार्जिलिंग और सिक्किम आपके कानों में सुनाई देने लगते थे।

कहा जाता है कि मादल की शुरुआत नेपाल के लोक संगीत से हुई थी जहाँ के स्थानीय लोक संगीत में इसका उपयोग किया जाता था। अगर आपकी हिंदी फिल्मी गीतों में रुचि है तो आप मादल की समृद्ध ध्वनि को दूर से ही पहचान लेंगे जो 1970 और 1980 के दशक में लगभग हर गीत का अंग था।

रणजीत गज़मेर के शुरुआती दिन दार्जिलिंग के संगीतमयी पहाड़ों के बीच गुज़रे थे। सोने के व्यापारियों के एक परिवार से संबंधित रणजीत ने इन पहाड़ों के रोमांच और रोमांस को अपने संगीत कौशल भारतीय फिल्मों में एक नया मुकाम दिया था। 

गजमेर ने “लेकर हम दीवाना दिल” (यादों की बारात), “हम दोनों दो प्रेमी” (अजनबी)  और “होगा तुमसे प्यार कौन” (ज़माने को दिखाना है)  जैसे कई गीतों में अपना कमाल दिखाया है।

प्रारंभिक वर्षों के दौरान वे प्रसिद्ध संगीतकार लुई बैंक्स और उनके शानदार पिता जॉर्जी बैंक्स के साथ काम करते रहे। ड्रम, तबला, ढोलक, हारमोनियम, वाइब्राफोन, ज़ाइलोफोन, ऑर्गन और माडल जैसे लगभग सभी पर्क्यूशन इंस्ट्रूमेंट्स बजाना सीखने के बाद, रणजीत गज़मेर कई सालों तक नेपाल रेडियो के साथ जुड़े रहे। मादल की असली पहचान बनाने के लिए उन्हें ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा था  

देव आनंद “हरे रामा हरे कृष्ण” की नेपाल की शूटिंग कर रहे थे। जब देव आनंद ने एक रोज़ मादल की आवाज़ सुनी तो उन्होंने पंचम से उस आवाज़ को “’घुंघरू क्या बोले” में इस्तेमाल करने को कहा था। 

इस तरह उनका बर्मन दा के कैंप में प्रवेश हुआ था। हिंदी फिल्मों का जादू उन्हें बहुत दिनों तक नेपाल में बांधे नहीं रह सका और 1970 के दशक के शुरुआती सालों में वे आखिरकार मुंबई आ ही गए।

मुंबई आने के कुछ समय बाद ही कांचा भाई संगीतकार आरडी बर्मन और एसडी बर्मन की ट्रेंड-सेटिंग म्यूज़िक टीम के प्रमुख सदस्य बन गए। “हरे रामा-हरे कृष्णा” फिल्म के एक गीत “कांचा रे हो कांचा रे” के बाद ही रणजीत साहब का  उपनाम कांचा प्रसिद्ध हो गया जो आज तक प्रचलन में है।

खैयाम,बप्पी दा, रवींद्र जैन, राम लक्षमण आदि की कई संगीत रचनाओं को कांचा भाई ने ही अपने जादू से संवारा था।

उनके कुछ गीतों के साथ आपसे विदा लेता हूँ।