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पंचम दा के नवरत्न कौन थे जो गीतों की रिकॉर्डिंग में उनके हमसफर रहे— जाने वो भाग-6

आज पंचम दा 81 साल के हो चुके हैं। “हैं” सुनकर आश्चर्य हुआ होगा आपको ना? जी हाँ, सुर कभी मरते नहीं और पंचम दा तो सुरों के राजा हैं। आज 27 जून का दिन उनकी अभिनव और अभूतपूर्व रचनाओं और उनके द्वारा किए प्रयोगों और हिंदी फिल्म संगीत में किए गए महत्वपूर्ण योगदान को याद करने का एक उपयुक्त अवसर है। 

तीन दशकों तक, उन्होंने संगीत प्रेमियों के दिलों पर अपने जुनून और कड़ी मेहनत के साथ राज किया। हिंदी फिल्म संगीत में नई ध्वनियाँ और नए प्रयोगों के लिए आज दुनिया भर के संगीतकार उनके काम को आश्चर्य से सुनते हैं। वो उन कलाकारों में से थे जिन्होंने अपना संसार अपने आप रचा था और “कुछ तो लोग कहेंगे” की तर्ज़ पर सिर्फ अपनी खुशी और संतुष्टि के लिए अपना संगीत तैयार करते थे।

आरडी बर्मन- द मैन, द म्यूज़िक (अनिरुद्ध भट्टाचार्जी और बालाजी विट्टल) जिसे राष्ट्रीय पुरुस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है, में जावेद अख्तर ने बताया है कि पंचम की अधिकांश धुनें जिन्हें आप सराहते हैं, को ज्यादा से ज्यादा पाँच या छह मिनट में बनाया गया था। धुन को बनाने और फिर उसे रिकॉर्ड तक ले जाने के सफर में उनका साथ देते थे उनके नवरत्न, जिनके बारे में मैं आपको “जाने वो कैसे लोग थे” शृंखला की छठी कड़ी में आज बताने वाला हूँ।

वो नवरत्न थे- “मारुति राव कीर, मनोहारी सिंह, बासु चक्रवर्ती, भानु गुप्ता, भूपिंदर सिंह, होमी मुल्लन, देवीचंद, चंद्रकांत और अमृत राव”।

मारुति राव कीर, जिन्हें प्यार से मारुति काका कहा जाता था हिंदी फ़िल्म संगीत बेहतरीन तबला वादकों में से एक हुए हैं। मारुति काका, आरडी बर्मन के मुख्य रिदम सहायक थे जिन्होंने पंचम दा का साथ छोटे नवाब से शुरू किया और अंत तक उनके साथ रहे। पंचम से उनकी मुलाक़ात उस समय से थी जब वो बड़े बर्मन दा के साथ काम किया करते थे।

उनका उनके बनाए गए गीतों में चुनरी संभाल गोरी, होठों पर ऐसी बात आदि गीतों के साथ और भी कुछ जानिये इस वीडियो में- 

अनुपम घटक आज इंडस्ट्री में जाना-पहचाना नाम है और पंचम दा के करोड़ों फैन में से एक हैं। अश्वनी, जो खुद बहुत ही अद्भुत बाँसुरी वादक है, उन्होंने और अनुपम ने, मारुतिराव कीर साहब और पंचम दा के रिदम पैटर्न की अनदेखी दास्ताँ दिखाने के लिए एक महफ़िल सजाई थी , उसी का एक अंश देखिए यहाँ 

मनोहारी सिंह, यानी मनोहारी दा के बिना पंचम दा की बात कोई कर ही नहीं सकता जिन्हें प्यारेलाल “ऑल-राउंडर” कहते थे। हालांकि उन्होंने संगीत निर्देशकों- कल्याणजी-आनंदजी, एसडी बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ काम किया लेकिन मनोहारी दा को आज भी पंचम के लिए अरेंज किए गए गीतों और उनमें बजाई गई धुनों के लिए जाना जाता है।

मनोहारी दा का पंचम के साथ होना अपरिहार्य ही था, क्योंकि पश्चिमी-उन्मुख गीतों की जो शैली पंचम दा लेकर आए थे उसमें सैक्सोफोन का उपयोग अक्सर किया जाता था और फ़िल्मी संगीत की दुनिया में मनोहारी दा से शानदार बजाने वाला था ही नहीं। आइए सुनते हैं उनके कुछ गीत…

पंचम के नवरत्नों के अंदर की तिकड़ी के तीसरे साथी थे बासु चक्रवर्ती जो शुरू में वायलिन बजाया करते थे किंतु बाद में चेलो बजाने लगे। पंचम दा का स्ट्रिंग विभाग इन्हीं के जिम्मे था। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वायलिन से चेलो की तरफ आने का सिर्फ एक कारण था कि वायलिन के 12 रुपये प्रति घंटा मिलते थे और चेलो का 18 रुपये प्रति घंटा।

साथ ही आपको बताता चलूँ कि शोले की मशहूर माउथ ओरगन की वो धुन जो जया के लैंप बुझाते वक़्त अमिताभ बजाते दिखते हैं, वो पंचम दादा ने नहीं बासु दा ने तैयार की थी। महबूबा-महबूबा गीत में वो मशहूर बोतल बासु दा ने ही बजाई थी। आइए देखते हैं उनके एक लाइव शो में बासु दा को वही कारनामा दोहराते हुए-

पंचम के नवरत्नों की तिकड़ी को सलाम करते हैं।

बाएँ से दाएँ- बासु, मनोहारी, पंचम दा और मारुति

आइए उस तिकड़ी के कारनामों पर एक साथ नज़र डालते हैं-