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पंचम के नवरत्नों में हारमोनिका बजाने वाले भानु और गिटार वादक भूपी दा की कहानी (7)

जाने वो कैसे लोग थे” शृंखला में इस हफ्ते हम पंचम का 81वाँ जन्मदिन सप्ताह मना रहे हैं जिसके चलते पंचम के नवरत्नों की तिकड़ी के बारे में हम पढ़ चुके हैं इसी शृंखला और पंचम की यादों के साथ चलते हुए हम उनके स्ट्रिंग सेक्शन के दो और रत्नों के बारे में बात करेंगे जिनका नाम है भानु गुप्ता और भूपिंदर सिंह जिनको सभी भूपी दा के नाम से जानते हैं

भानु गुप्ता का जन्म 1930 में रंगून, बर्मा में हुआ था और उन्होंने ब्रिटिश नाविकों से हारमोनिका बजाना सीखा था। 15 साल की उम्र में गुप्ता को उपहार के रूप में एक प्लास्टिक हारमोनिका मिली, जिसपर सबसे पहले उन्होंने बजाना सीखा था भारतीय राष्ट्रगान।

कोलकाता में रहते हुए, भानु नाइट क्लबों और कैबरे में अक्सर हारमोनिका बजाते थे। अंत में 1959 में नौ साल तक कोलकाता में रहने के बाद, भानु ने अपनी नौकरी छोड़ दी और मुंबई में बस गए। उनका पहला ब्रेक संगीत निर्देशक सी रामचंद्र की फ़िल्म पैगाम के साथ आया था। 

आपको याद है शोले के अमिताभ का वो माउथ ऑर्गन पीस जो वो जया भादुरी के लैंप बुझाने को देखते हुए बजाते हैं? वो इन्हीं भानु दा का बजाया हुआ था जिसकी धुन बासु दा ने बनाई थी जिसके बारे में हम ने पिछली बार बात की थी।

जल्द ही उन्हें बिपिन दत्ता मिल गए लेकिन उनकी लोकप्रियता बढ़ी सलिल चौधरी के साथ जहाँ एक दिन अपनी एक रिकॉर्डिंग के दौरान, उन्होंने एक पुराने  उपेक्षित पड़े एडुसोनिया गिटार को ठीक किया और उसपर अभ्यास करना शुरू कर दिया।

इन दिनों के दौरान वे संगीत निर्देशक जोड़ी सोनिक ओमी के बगल में रहते थे जहाँ लोकप्रिय मदन मोहन अक्सर आते थे। वहीं मदन मोहन ने भानु को सुना और 1963 में मदन मोहन ने उन्हें अपने साथ मिला लिया। उन्हीं दिनों आरडी बर्मन को एक दो गानों के लिए गिटारवादक की तलाश में थे। भानु गुप्ता को बुलाया गया और फिर उन दोनों का यह साथ 1994 में पंचम दा की मृत्यु तक जारी रहा।

पंचम दा भानु गुप्ता के साथ

उनके कुछ गीत इस प्रकार हैं देखिए- साहिबों (तीसरी मन्ज़िल), सुनो कहो (आप की कसम), चिंगारी कोई भड़के (अमर प्रेम), महबूबा (शोले), कुछ न कहो (1942), आदि। पंचम दा के एक गीत की कहानी उनसे ही सुनते हैं-

कुछ साल पहले 28 जनवरी 2018 को भानु दा भी पंचम का साथ निभाने चले गए।

नवरत्नों में से एक थे भूपिंदर सिंह जिनको ज़्यादातर लोग एक गायक के रूप में ही जानते हैं। उन्होंने कई गीत जैसे दिल ढूंढता है‘, ‘दो दीवाने इस शहर में‘, ‘नाम गुम जाएगा आदि को अपनी आवाज़ दी है। भूपिंदर गिटार वादक के रूप में जिन दिनों ऑल इंडिया रेडियो और दिल्ली दूरदर्शन केंद्र, दिल्ली से जुड़े थे उन्हीं दिनों 1962 में उनकी मुलाक़ात मदन मोहन से हुई थी।

पंचम दा के साथ भूपिंदर सिंह

इसी के साथ फिल्म हकीकत के साथ उनकी गायकी का सफ़र शुरू हो गया था। लेकिन आज हम आपको उनके परदे के पीछे वाले रूप से मिलवाएँगे जिसके साथ उन्होंने हवाइन गिटार, स्पेनिश गिटार और इलेक्ट्रिक गिटार बजाते हुए शानदार गीत प्रस्तुत किए। 

अभिलाषा के इस गीत के साथ से उनकी शुरुआत गिटार और पंचम के साथ हुई थी और करीब 25 साल से वो पंचम के साथ गाते और बजाते रहे। पंचम से मिलवाने वाले थे उनके मदन मोहन जी के यहाँ बने दोस्त भानु गुप्ता

और फिर आया था दम मारो दम जिसमें बजाए गए गिटार ने उनका नाम ऐसी बुलंदियों पर पहुँचा दिया था कि वो कभी नहीं भुलाए जाएँगे। यहाँ पर आपको सुनवाते हैं उसी गीत का कवर वर्ज़न-

इसके बाद आया था एक ऐसा गीत था जिसके लिए भूपिंदर 100 रुपये की शर्त भी हार गए थे। हुआ कुछ यूँ था कि एक रिकॉर्डिंग रद्द हो जाने के बाद पंचम उनको ज़बरदस्ती एक पिक्चर दिखाने ले गए थे।

और फिर कुछ दिन बाद भूपी दा ने एक नए गाने की रिकॉर्डिंग पर धुन तो बेहद शानदार बजाई थी पर यह नहीं बता पाए थे कि ये गीत की “प्रेरणा” कहाँ से मिली थी। सुनिए वो प्रेरणा गीत और उसके बाद बनाया गया पंचम का गीत-

हालाँकि, भूपिंदर पंचम की टीम का ख़ास हिस्सा थे लेकिन अन्य संगीत निर्देशकों जैसे मदन मोहन के लिए उनका “तुम जो मिल गए हो” लोग आज भी नहीं भूले हैं। फिल्म कादंबरी के लिए उन्होंने उस्ताद विलायत खान के लिए “एक अंबर की” ’गीत के लिए गिटार बजाया था।

उन्होंने रज़िया सुल्तान के गीतों के लिए संगीत निर्देशक खय्याम के साथ-साथ राम-लक्ष्मण, नौशाद और सोनिक ओमी आदि के साथ भी काम किया है। वह पाकीज़ा के थीम गीत के वाद्ययंत्रकारों में से एक थे जिसमें भूपिंदर ने सरोद ’की तरह 12-स्ट्रिंग गिटार का इस्तेमाल किया था ताकि इसे एक शास्त्रीय स्पर्श दिया जा सके।

चलते-चलते आपको ये बता दूँ कि पाकीज़ा वही फिल्म थी जिसके बाद केरसी लॉर्ड ने कभी नौशाद के साथ काम नहीं किया था। ऐसा क्यों हुआ, वो कहानी अगले सप्ताह…