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ब्रास सेक्शन के महारथी मनोहारी दा बर्मन साहब से कैसे मिले— जाने वो कैसे… भाग-14

पिछले कुछ हफ़्तों से आप हमारे साथ उस एक सफर पर हैं जहाँ ऐसे लोगों के नाम सामने आए थे जो आज तक परदे के पीछे ही रहे लेकिन जिनका नाम आज पूरी इंडस्ट्री में बड़े सम्मान से लिया जाता है।

आज आप जानेंगे एक ऐसे सितारे के बारे में जो काफी समय तक चांद की रोशनी में छुपे रहे थे। किंतु 2003 के आते-आते इनके बारे में आम संगीत प्रेमी भी जानने लगे थे

मनोहारी दा को आज कौन नहीं जानता किंतु सन 2002 में ऐसे बहुत कम लोग थे जिनको मनोहारी दा के काम के बारे में जानकारी थी।

मनोहारी दा, बसु दा और मारुति राव की तिगड़ी में से एक थे जो बड़े बर्मन और छोटे बर्मन के लगभग सभी गीतों में अंत तक शामिल रहे। मनोहारी दा जिनको ब्रास सेक्शन का महारथी कहा जाता था, पश्चिमी बंगाल के हुगली जिले में संगीतकारों के एक घर में पैदा हुए थे। पिता भीम बहादुर सिंह ब्रिटिश ज़माने में पुलिस बैंड में बांसुरी और बैगपाइप और मामा क्लैरिनेट बजाते थे। इनके दादाजी भी ट्रम्पेट वादक थे और म्यूजिक ऑपेराओं में हिस्सा लेते थे।

मनोहारी दा के चाचा और मामा तब के कलकत्ता के बाटानगर की बाटा शू कम्पनी के ब्रास बैंड में हिस्सेदारी किया करते थे। उनके चाचा ने बैंड के कंडक्टर हंगरी के रहनेवाले जोसेफ़ न्यूमैन से मनोहारी दादा को मिलवाया था और 1942 में 3 रुपये हफ़्ते की तनख्वाह पर नौकरी मिल गई थी। 

1945 में जोसेफ़ न्यूमैन ने एचएमवी जॉइन की और उन्हें बाटानगर का ब्रास बैंड छोड़ना पड़ा था। उनको मनोहारी दा की संगीत प्रतिभा पर भरोसा होने लगा था क्योंकि उन्हें विश्वास था कि अधिक अभ्यास से वे बेहतर होते जाएँगे और वैसा ही हुआ था।

 

ये वही न्यूमैन थे जिनकी वजह से इनकी मुलाकात हुई थी बड़े बर्मन साहब से। जोसेफ़ न्यूमैन कई संगीत निर्देशकों जैसे कमल दासगुप्ता, एसडी बर्मन, तिमिर बरन और पंडित रविशंकर के लिए संगीत अरेंज करते थे और मनोहारी दा उनकी नोटेशंस बजाते थे।

नाईट-क्लबों में बजाने की इच्छा ने मनोहारी दादा को सैक्सोफोन बजाना सीखने के लिए प्रेरित किया था। बाद में उन्होंने कई बड़े संगीतकारों जैसे बेनी गुडमैन और आर्टीसियो के साथ भी काम शुरू कर दिया था। 

वहीं ग्रैंड होटल कलकत्ता में कई बैंड्स के साथ काम कर चुके तेग बहादुर (ख्यात संगीतकार लुई बैंक्स के पिता) एक शानदार ट्रम्पेट प्लेयर थे। यहाँ वे जॉर्जी बैंक्स के नाम से और दुसरे चाचा बॉबी बैंक्स के नाम से ट्रम्पेट बजाया करते थे थे। इन सब के कारण नाईट-क्लबों में बजाने की उनकी इच्छा ज़ोर पकड़ती गई।

संगीतकार सलिल चौधरी के कहने पर 1958 में वे किस्मत आजमाने बंबई आ गए थे। सबसे पहले उन्होंने एसडी बर्मन के लिए फिल्म ‘सितारों से आगे’ में बजाया। मगर दादा की पहचान बनी थी कल्याण जी आनंद जी की फिल्म ‘सट्टा बाज़ार’ से।

 

आपको अचरज हो रहा होगा कि आज की कड़ी में मैंने आपको कुछ सुनवाया नहीं ना?

जी हाँ, आज की कड़ी में सिर्फ पढ़ने के लिए था, सुनने के लिए आप अगले हफ्ते तक इंतज़ार कीजिए किंतु एक गीत तो बनता ही है ना मनोहारी दा का ?

सुनिए 

चित्र श्रेय- राजेश सिंह (सुपुत्र मनोहारी सिंह)