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सेक्सोफोन के अलावा फ्ल्यूट, मेंडोलिन से मनोहारी दा ने कैसे सजाए गीत— जाने वो.. (16)

मनोहारी दा की जीवन यात्रा के अंतिम भाग में आपका स्वागत है। अब उस गीत की बात करते हैं जो उनका सबसे पसंदीदा था और इसे बजाकर उनका कहना था कि “तसल्ली” आ गई थी। दादा के अनुसार यह बहुत कठिन कंपोज़ीशन थी मगर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने धुन बनाने में कमाल कर दिया था। दादा ने भी पीछे नहीं रहते हुए अपने सेक्सोफोन से गाने को अमर कर दिया। सुना है आपने ये सेक्सो पीस?

और अगर आपको यह पसंद आया है तो फिल्म ‘गाईड’ के ‘तेरे मेरे सपने अब एक रंग’ में बजाया गया टुकड़ा भी आप भूले नहीं होंगे। 

ध्यान से सुनेंगे तो आप पाएँगे 0.53 सेकंड पर कैसे सेक्सोफोन धीरे से ‘मेरे तेरे दिल का, तय था इक दिन मिलना’ जैसी पंक्तियों को बस हलके-से छूकर पीछे हो जाता है।

फिल्म ‘माया’ में सलिल दा ने एक गीत रचा था ‘जा रे, जा रे उड़ जा रे पंछी’। इस गीत की शुरूआत की फ्ल्यूट के स्वरों से होती है और 1.43 सेकंड पर सेक्सोफोन आ जाता है।

जी हाँ, ये दोनों टुकड़े मनोहारी दा का ही कमाल था। उस दिन रिकार्डिंग के लिए एक साजिंदे के न आने की वजह से सलिल दा ने ये दोनों साज़ मनोहारी दा को बजाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी जिसे मनोहारी दा ने मुस्कुराकर मान लिया था। कहाँ हल्की-फुल्की फ्ल्यूट और कहाँ भारी भरकम सेक्सोफोन लेकिन इस काम को भी मनोहारी दा ने बखूबी कर दिखाया था। 

अंग्रेज़ी फ्ल्यूट (स्टील की बांसुरी), सेक्सोफोन और मेंडोलिन के साथ उन्होंने अनगिनत गीतों में अपना योगदान दिया था। ज़रा याद कीजिए- ‘तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे’ (सट्टा बाज़ार), ‘अजी रूठकर अब कहाँ जाइएगा’,और ‘ बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है’ (आरज़ू), ‘अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना’ (काला पानी) , ‘रुक जा ओ जाने वाली रुक जा’ (कन्हैया), ‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़ुबान परा (ब्रहमचारी), ‘शोख नज़र की बिजलियाँ, दिल पे मेरे गिराए जा’ (वो कौन थी), ‘है दुनिया उसी की , ज़माना उसी का’ (कश्मीर की कली)’, ‘हुजूरे वाला, जो हो इजाज़त ‘ (ये रात फिर न आएगी), ‘गाता रहे मेरा दिल’ और ‘जाग दिले-दीवाना, रुत जागी वसले यार की’ (ऊंचे लोग), ‘जाता हूँ मैं मुझे अब न बुलाना’ (दादी माँ), ‘रात अकेली है’ (ज्वेल थीफ), ‘रूप तेरा मस्ताना’ (आराधना), और आरडी बर्मन के तो लगभग सारे संगीत में कहीं वादक तो कहीं अरेंजर तो कहीं किसी और रूप में मौजूद हैं ही। मदन मोहन जी के साथ ‘वो कौन थी’, ‘हकीकत’ का वह गीत ‘मस्ती में छेड़ के तराना कोइ दिल” का सेक्सोफोन और ‘हँसते ज़ख्म’ में ‘तुम जो मिल गए हो’ में की फ्ल्यूट बजाया है। शंकर-जयकिशन की फिल्म ‘ब्रह्मचारी’, ‘आरज़ू’, ‘प्रोफ़ेसर’ आदि में आपको वे सुनाई दे जाएँगे।

वक़्त हो किसी दिन आप तो इन गीतों को फिर से एक बार सुनिएगा और मनोहारी दा को ढूंढिएगा इन गीतों में…
13 जुलाई 2010 को जब मनोहारी दा की मृत्यु हुई उस समय उनकी उम्र 79 साल की थी और डायलिसिस पर थे पर लाइव प्रोग्राम में तब भी बजाते थे। 2003 की फिल्म ‘चलते-चलते’ के गीतों में भी वो आपको सुनाई दे जाएँगे तो 2004 की फिल्म ‘वीर ज़ारा’ में भी उनके सेक्सोफोन की खनक सुनाई दे जाएगी।

उनकी यादें आज भी हमारे साथ हैं जब उन्होंने हमसे बात करते हुए मुस्कुराते हुए कहा था- “बस आप सभी का आशीर्वाद है”।