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जूलिएट की “सेक्रेटरी” बनकर पत्रों के उत्तर देने वाली स्त्रियों की कहानी में भगवद्गीता!

पिछले दशक के उत्तरार्ध में भारत में “फैक्ट चेक” करने वाली संस्थाएँ आ गईं, हालाँकि विदेशों के अख़बारों में “फैक्ट चेकर” काफी पहले से अस्तित्व में थे। “लेटर्स टू जूलिएट” की नायिका सोफी पेशे से “फैक्ट चेकर” ही होती है। फिल्म के शुरूआती दृश्य में ही उसे एक प्रसिद्ध पुरानी तस्वीर के वास्तविक या नाटकीय होने की जाँच करते दिखाते हैं।

निजी जीवन में सोफी एक खानसामे (कुक) विक्टर को पसंद करती थी और वे दोनों शादी का भी सोच रहे थे। इसके अलावा सोफी एक उपन्यास लिखना चाहती थी, जिसके लिए वह कोई अच्छी कहानी ढूंढ रही थी।

होने वाले पति विक्टर के साथ सोफी वेरोना (इटली) घूमने जाती है। विक्टर पूरे इलाके में किस्म-किस्म की खाने-पीने की चीज़ों को बनाना देखता-समझता रहता है। उसे अपना रेस्तरां खोलना था तो यह उसके लिए काम था।

इस क्रम में सोफी कुछ-कुछ वैसा ही अकेलापन महसूस कर रही होती है जैसा “गाइड” फिल्म में नायिका अपने पुरातत्वविद् पति के साथ घूमने आने पर महसूस करती थी। एक दिन अकेले घूमने निकली सोफी को एक दीवार पर चिपकी कई चिट्ठियाँ दिखती हैं।

ये चिट्ठियाँ स्त्रियाँ “जूलिएट” को लिखती थीं, जिनमें उनकी समस्याओं (अक्सर प्रेम से जुड़ी) का वर्णन होता था। उसे पता चलता है कि कुछ महिलाएँ खुद को “जूलिएट की सेक्रेटरी” बताती हैं और उनका दल इन सभी दीवार पर लगी चिट्ठियों के जवाब लिखकर वापस भेजता है!

थोड़ी खोजबीन के बाद सोफी भी इस दल के साथ मिलकर कुछ चिट्ठियाँ पढ़कर उनके जवाब देने लगती है। इसी क्रम में उसे किसी क्लेयर स्मिथ की चिट्ठी मिलती है जो दीवार की एक ईट के पीछे 1957 से पड़ी थी।

सोफी उस पुराने भुला दिए गए ख़त का जवाब दे डालती है। थोड़े ही दिनों में बूढ़ी हो चुकी क्लेयर अपने वकील पोते चार्ली के साथ वहाँ आ जाती है। क्लेयर और सोफी में तो फ़ौरन पटने लगती है, लेकिन अपने हमउम्र क्लेयर के पोते चार्ली से सोफी के उतने अच्छे संबंध नहीं बनते हैं।

सोफी ने अपने जवाब में क्लेयर को अपने खोए हुए प्रेम लोरेंजो को ढूंढने कहा था और क्लेयर वही करने लौटी थी। पेशे से “फैक्ट चेकर” सोफी ढूंढने में माहिर थी, तलाश में वो क्लेयर की मदद करने लगती है।

वे लोग जब ढूंढने निकलते हैं तो सिर्फ लोरेंजो नाम से ढूंढना कोई आसान काम नहीं, ये भी समझ में आने लगता है। जिन्हें वे ढूंढते हैं, उनमें से कोई ठरकी बुड्ढा निकलता है तो कोई मर चुका होता है। इनसे क्लेयर निराश होने लगती है और अपनी दादी के दुखी होने के लिए चार्ली भी सोफी को जिम्मेदार मानने लगता है।

जैसे-जैसे तलाश आगे बढ़ती है वैसे-वैसे चार्ली और सोफी में कभी मनमुटाव और कभी दोस्ती भी होती रहती है। जिस दिन चार्ली, क्लेयर और सोफी मान रहे थे कि तलाश का आखरी दिन है, उस दिन जाकर उन्हें वो लोरेंजो मिल जाता है जिसकी क्लेयर को तलाश थी!

वह भी बूढ़ा और विधुर हो चुका होता है। जैसे क्लेयर का पोता था, वैसे उसके पास पोते-पोतियों का पूरा भरा पूरा परिवार ही था। इसके बाद क्या होता है, या कहानी समाप्त कैसे होती है, ये हम पूरा नहीं बताने वाले।

हाँ ये बता देंगे कि फिल्म में चूँकि “जूलिएट” नाम का इस्तेमाल किया गया है, तो “रोमियो-जूलिएट” नाटक की ही तरह इसमें चार्ली भी लताओं-झाड़ियों पर चढ़कर बालकनी में खड़ी नायिका से बात करने जाता है। और अब ये भी बता दें कि इस कहानी के बहाने हमने फिर से आपको भगवद्गीता के कुछ श्लोक पढ़ा डाले हैं।

सबसे पहले तीसरे अध्याय का 33वाँ श्लोक देखिए–
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।।3.33

इस श्लोक में कहा गया है कि ज्ञानवान मनुष्य भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति पर जाते हैं, फिर इसमें किसी का निग्रह क्या करेगा? यह आसानी से क्लेयर में दिखेगा क्योंकि करीब 50 वर्ष बाद वह किसी लोरेंजो को ढूंढने वापस आ जाती है।

यह आपको सोफी के मंगेतर विक्टर में दिखेगा, जो अपनी सुंदर-सी वाग्दत्ता को अकेली छोड़कर किस्म-किस्म के पकवानों की तलाश में जुटा है। यह आपको सोफी में भी दिखेगा जो अपनी नौकरी छोड़कर उपन्यास लिखने बैठना चाहती है मगर जैसे ही उसे मौका मिलता है वह “फैक्ट चेकर” की तरह फिर से क्लेयर के साथ लोरेंजो को ढूंढने में लग जाती है।

कर्म और कर्मफलों के विषय में संभवतः दूसरे अध्याय का 47वाँ श्लोक, भगवद्गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है। हो सकता है ऐसा इसलिए हुआ हो क्योंकि जिस हेगल की विचारधारा को नक़ल करके मार्क्सवादी सिद्धांत बने और लेनिनवाद या टोर्टस्कीवाद जैसे वाद बाद में टूटकर निकले, उस हेगल को यह श्लोक मुख्य श्लोक लगता था।

जर्मनी और फिर विदेशों में इसके मुख्य माने जाने का कारण यही रहा होगा, हालाँकि भारतीय विद्वान और मनीषी ऐसा कुछ मानते नहीं। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47

इस श्लोक में कहा गया है कि तुम्हारे अधिकार में केवल कर्म आते हैं, उनका फल नहीं आता। तुम्हें कर्मफलों के प्रति आसक्त भी नहीं होना चाहिए और न ही (फल मिलेगा या नहीं, ऐसा कुछ सोचकर) कर्म न करने अर्थात् अकर्म में तुम्हारी रुचि हो।

इस श्लोक के आधार पर काम करती हुई “सेक्रेटरीज़ ऑफ़ जूलिएट” दिखेंगी। उनके लिए कोई ज़रूरी नहीं था कि वे किसी दीवार पर जूलिएट के नाम लिखी गई चिट्ठियों का जवाब दें। उनके चिट्ठियों का जवाब देने से उन्हें कोई श्रेय मिलता हो, प्रसिद्धि मिलती हो, या धन मिलता हो, ऐसा कुछ भी नहीं होता। इसके बाद भी वे चिट्ठियों का जवाब देती रहती हैं।

नायिका सोफी भी बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के इसमें आ जुटती है। शुरुआत के लिए कह सकते हैं कि वह अकेलेपन या बोरियत से बचने के लिए ऐसा कर रही थी। या फिर ये कहा जा सकता है कि वह इसमें अपने उपन्यास की कहानी ढूंढ रही थी, लेकिन थोड़े ही समय में ये लालच भी उसके पास नहीं होता।

भगवद्गीता के 18वें अध्याय के 63वें श्लोक में पूरी बातें समझाने के बाद भी भगवान कहते हैं –
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।18.63

यानी ये गोपनीय ज्ञान मैंने तुम्हें बता दिया है अब इस पर सम्यक रूप से विचार करने के पश्चात् तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा तुम करो। नायिका सोफी भी जब कर्मफल के बारे में सोचने के बदले केवल कर्म में जुटी होती है तो एक-एक करके विकल्प उसके सामने आते-जाते हैं।

क्लेयर या चार्ली के लिए भी स्थितियाँ ऐसी ही होती हैं। उनके कर्मों का क्या फल होगा, उनकी तलाश का कोई नतीजा निकलेगा भी या नहीं, अगर उन्हें ढूढने पर लोरेंजो मिल भी गया तो क्या होगा, ये सब कुछ भी उन्हें पता नहीं होता।

अंत में चार्ली, सोफी, या क्लेयर जो चुनाव करते हैं, वह संभवतः उनके लिए सबसे अच्छा विकल्प था और वह अपनेआप ही उन्हें मिल जाता है। बाकी “लेटर्स टू जूलिएट”, जिसे रोमांटिक कॉमेडी की श्रेणी में डाला जा सकता है, के बहाने से जो हमने बताया है वह नर्सरी स्तर का है और पीएचडी के लिए आपको स्वयं ही पढ़ना होगा, ये तो याद ही होगा!

आनंद प्रबंधन के क्षेत्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई के बाद व्यापारिक शोध का काम करते हैं। वे उपशास्त्री हैं और वर्तमान में संस्कृत से स्नातक के छात्र हैं।