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तीसरी मंज़िल से ड्रमर के रूप में प्रतिष्ठित होने वाले को क्यों बनाना पड़ा अपना ड्रम सेट

नासिर हुसैन के करियर में तीसरी मंज़िल का सबसे बड़ा महत्त्व यह था कि इसमें राहुल देव बर्मन के साथ उनके संबंधो की शुरुआत हुई थी।

हुसैन और विजय आनंद दोनों ही पंचम के साथ काफी समय से काम करने के इच्छुक थे। अनिरुद्ध भट्टाचार्जी और बालाजी विट्टल ने अपनी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता पुस्तक आरडी बर्मन: द मैन, द म्यूज़िक में कहा है कि शम्मी कपूर चाहते थे कि तीसरी मंज़िल में ओपी नैय्यर या शंकर-जयकिशन का संगीत हो।

नैय्यर साहब और शंकर जयकिशन के साथ शम्मी साहब पहले भी सफलता के झंडे गाड़ चुके थे और शम्मी साहब की सफल फिल्मों का एक अभिन्न हिस्सा बने हुए थे। अपने एक इंटरव्यू में शम्मी साहब का भी यही कहना था पर फिर जब उन्होंने सिटिंग रूम में पंचम को सुना तो बस पंचम के नाम पर ही ठप्पा लगा दिया था।

1966 में अपनी रिलीज़ के समय तीसरी मंज़िल ने दर्शकों को चौंका दिया था। विजय आनंद के निर्देशन और संपादन ने थ्रिल में कथानक को बुनते हुए हिंदी फिल्मों को एक नई शैली के जाल में उलझा दिया था। पंचम दा की धुनों ने, मजरूह साहब के बोलों ने और गोल्डी आनंद द्वारा परदे पर गीतों के चित्रण ने आज भी तीसरी मंज़िल को इतनी ऊँची मंज़िल पर पहुँचा रखा है कि कोई फिल्म भी उसके आस-पास नहीं पहुँच सकती। 

और अब जब संगीत की बात चल ही निकली है तो फिर उन सितारों की बात करना तो बनता ही है जिनको हम हमेशा सुनते तो रहे पर कभी परदे पर देख नहीं पाए। 

ऐसा नहीं कि परदे पर कभी कोई दिखा ही नहीं, लेकिन हुआ यह कि आपने ध्यान ही नहीं दिया और उनको एक्स्ट्रा मानकर हीरो या हीरोइन पर अपना ध्यान लगाए रहे। चिक चोकलेट जिनको हिंदी संगीत का लुई आर्मस्ट्रांग कहा जाता है, उनको मौका मिल चुका है। मौका तो हमारे भूपिंदर साहब को भी मिला चुका है फिल्म “आखिरी ख़त” में गिटार बजाते हुए।

तीसरी मंजिल का यह ड्रम पीस याद है आपको? मुझे पूरा विश्वास है कि आपने जब पहली बार सुना होगा तो सोचा ज़रूर होगा कि कौन था यह शख्स? पहले देखिए-

वो ड्रमर थे लेस्ली गोडिन्हो, जिन्हें आपने अभी हम विजय आनंद की क्लासिक तीसरी मंज़िल एक यादगार दृश्य में पर्दे पर एक छाया के रूप में देखा। गोडिन्हो, उन्हीं फ्रेंको वाज़ के ससुर हैं, जो अपने आप में ड्रमर के रूप में आज एक बहुत बड़ा नाम हैं।

गोडिन्हो का जन्म उरान में हुआ था और फिर धीरे-धीरे उनपर ड्रम का भूत ऐसा सवार हुआ कि सब छोड़कर विभिन्न नृत्य बैंडों में ड्रम बजाना शुरू कर दिया था। कुछ समय बाद 1954 रूडी कॉटन ने बैंकाक के ओएसिस क्लब में काम मिलने पर उनको ड्रमर में रूप में अपने बैंड में शामिल कर लिया।

उसी दौरान उनकी मुलाकात फ्रंसिज़ वाज़ से हुई और उनके द्वारा ही वो फ़िल्मी संगीत तक पहुँच गए। फ्रेंको वाज़ ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था, “हालाँकि लेस्ली मेरे पिता फ्रंसिज़ से उम्र में छोटे थे, लेकिन बाद में बहुत करीबी दोस्त और साथी बन गए थे। उन्होंने एक बार मुझे बताया था कि शुरुआती दिनों में उनके पास संगीत शो में भाग लेने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे और इसलिए वे फ्रेंको के पिताजी के कार्यक्रमों को देखने के लिए नारियल के पेड़ों पर चढ़ते थे।

अपने दोस्त फ्रांसिस वाज़ की तरह, लेस्ली ने उस दौर के सभी शीर्ष संगीत निर्देशकों के साथ काम किया था। गोडिन्हो के ड्रम के बिना तीसरी मंज़िल के लैंडमार्क साउंडट्रैक की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

2006 में अपनी मृत्यु से बहुत पहले दर्ज किए गए, ग्रेगरी बूथ को दिए एक साक्षात्कार में, गोडिन्हो ने अपनी शर्मीली मुस्कराहट के साथ बताया था कि जब विदेशी वस्तुओं के आयात प्रतिबंध से सभी प्रभावित थे तो उन्होंने अपने हाथों से एक पूरा ड्रम सेट बना डाला था।

मोहम्मद रफी साहब की टीम के वे हमेशा से अभिन्न अंग थे और करीब चालीस शो में उनके साथ रहे।

लेस्ली आज तक के भारत के सबसे शानदार ड्रमर हुए हैं जिन्होंने करीब 10,000 से भी ज्यादा फ़िल्मी गीतों में अपना योगदान दिया है। इनमें से कुछ हैंबदन पे सितारे, आसमान से आया फ़रिश्ता, बार-बार देखो आदि।