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किशोर देसाई की मैंडोलिन वादक के रूप में प्रतिष्ठित होने की कहानी— जाने वो भाग-12

1 अगस्त 1937 को जन्मे किशोर देसाई मुंबई स्थित उद्योगपतियों के पारंपरिक गुजराती परिवार से हैं। उनके रूढ़िवादी दादा एक कपड़ा मिल मालिक थे जो युवा किशोर देसाई के लिए संगीत के प्रति अपने अटूट जुनून को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरणा बने रहे।

किशोर देसाई की पूरी सफलता का श्रेय उनके पिताजी जवाहर लाल देसाई को जाता है जो एक बड़े मशहूर व्यापारी थे और नौ साल की उम्र से ही किशोर को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देने के लिए बाहर भेजने लगे थे।

अनिल बिस्वास ने उन्हें पहली बार भारतीय संगीत के कलाकर मंडल में आयोजित एक प्रतियोगिता में मैंडोलिन बजाते हुए सुना, जहाँ वे प्रतियोगिता के निर्णायक पैनल में से एक थे। वे किशोर से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने किशोर के लिए एक विशेष कप बनवाया क्योंकि अन्य न्यायाधीशों ने किशोर देसाई को प्रथम पुरस्कार नहीं दिया था। बिस्वास ने किशोर को बुलाया और कहा कि किशोर का वादन कुछ अलग ही था जिसके लिए वे प्रथम स्थान से अधिक कुछ पाने के हकदार थे।

15 साल की उम्र में ही किशोर देसाई ने अपने जादुई मेंडोलिन के साथ अपने जीवन की पहले फ़िल्मी गीत की रिकॉर्डिंग कर डाली थी। गीत के बोल थे, धुमक धुमक बाजे मोरा घुंघरवा, फिल्म थी बहु-बेटी और साल 1952 का था।

उनका कद उस समय इतना कम था कि बॉम्बे लैब में साढ़े चार फीट की ऊँचाई पर रखे माइक्रोफोन तक पहुँचने के लिए एक खास ऊँची कुर्सी बनाई गई थी जिसपर बैठकर किशोर ने मैंडोलिन वादन किया था। 

रिकॉर्ड के लिए, बहू -बेटी से पहले भी वे “सुबह की मंज़िल” में संगीत निर्देशक पंडित शिवराम कृष्ण के सहायक होने के साथ मेंडोलिन वादक थे। निमी और शेखर अभिनीत यह फिल्म पूरी नहीं बन पाई थी।

उसके बाद शंकर जयकिशन की फिल्म बसंत-बहार से उनकी फ़िल्मी गाड़ी चल निकली। कल्याणजी-आनंदजी भाई और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ मिलकर उन्होंने कभी न भूलने वाली धुनें दे डाली थीं। साथ ही उनकी अतिरिक्त साधारण प्रतिभा के चलते फिल्म उद्योग में उनकी साख एक बेहतरीन सहायक संगीत निर्देशक, अरेंजर और मैंडोलिन तथा सरोद वादक के रूप में आज भी है।

फ़िल्म संगीत में उनके शानदार योगदान के लिए प्रतिष्ठित दादासाहेब फाल्के लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से उन्हें सम्मानित किया गया था।

70 साल के कैरियर में अनिल दा, सी रामचंद्र, शंकर जयकिशन, मदन मोहन, कल्याणजी भाई, लक्ष्मी प्यारे, सचिन दा, पंचम दा कुछ ऐसे नाम हैं जिनके गीतों में अगर आपको मेंडोलिन सुनाई देगी तो किशोर देसाई की हो इसकी संभावना 99 प्रतिशत है।

जिस दौर में संगीत में आत्मा होती थी, वहाँ पहुँचने के लिए उनके कुछ गीत- लग जा गले (वो कोन थी), काँटों से खींच के (गाइड), खोया-खोया चांद (काला बाज़ार), हँसता हुआ नूरानी चेहरा, बिंदिया चमकेगी (दो रास्ते), ऐ मेरी ज़ोहरा जबी (वक्त), मेरे दिल कहीं और चल (दाग), मेरी जान मेरी जान (यहूदी), मैं चली में चली और ऐ गुलबदन (प्रोफेसर), तेरी प्यारी-प्यारी सूरत (ससुराल), धीरे-धीरे चल (लव मैरेज), संदेसे आते हैं (बॉर्डर), आदि।