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फिल्म उद्योग के दूसरी पीढ़ी के संगीतकार का ‘पाकीज़ा’ से क्यों टूटा दिल— जाने वो भाग-9

साल था 1969 का, जब हिंदी फिल्म संगीत प्रेमियों ने एक नए-से कलाकार राजेश खन्ना को अपने दिलो में बसा लिया था। इसका कारण था उसी साल प्रदर्शित हुई फिल्म आराधना के गीत और फिल्म में सुनी गई कुछ अद्भुत धुनें।

हर एक गीत लाजवाब था, लेकिन जिस गीत ने वास्तव में तहलका मचाया था, विशेष रूप से युवा श्रोताओं के मध्य, वह था- रूप तेरा मस्ताना। आपने शायद ध्यान दिया हो कि इस गीत के शुरू के 12 सेकंड्स का उपयोग पृष्ठभूमि में रोमांस का माहौल पैदा करने के लिए किया गया था।

इस गीत में एक कारीगरी और भी पहली बार हुई थी, पर वह कहानी किसी और दिन। फिलहाल बात करते हैं उस बाजीगर की जिसने इस गीत की शुरुआत में पृष्ठभूमि में पियानो अकॉर्डियन बजाया था। किशोर कुमार की उस “हस्की”-सी आवाज़ के पहले अपने पियानो अकॉर्डियन का अपनी उँगलियों का जादू बिखेरा था केर्सी लॉर्ड ने।

डॉन (1978) से “ये मेरा दिल” और यादों की बारात में “चुरा लिया है” जैसे गीतों में भी आप उनकी उंगलियों को की-बोर्ड पर थिरकते सुन सकते हैं।

1960 के दशक के आसपास नौशाद साहब को लगने लगा था कि उनको अब थोड़ा बदलने की ज़रूरत आन पड़ी है। एक विलक्षण संगीतकार होने के नाते उनको यह भी एहसास था कि इसके लिए उन्हें करना क्या होगा। उनकी ज़रूरत थी, एक नया म्युज़िक अरेंजर। कोई ऐसा व्यक्ति जो उनकी धुनों को समकालीन ध्वनि दे सके। उनका सौभाग्य था या यह कहिए भारतीय फ़िल्मी संगीत के लिए सौभाग्य था कि उन्हें उस व्यक्ति की खोज के लिए बहुत दूर नहीं जाना पड़ा।

नौशाद साहब ने जिस नवयुवक को अपने लिए चुना था, वे थे केर्सी लॉर्ड था। केर्सी की काबिलियत को परखने के लिए नौशाद साहब ने उसे राम और श्याम (1967) के एक दृश्य के लिए बैकग्राउंड स्कोर करने के लिए कहा। उस एक सीन के नतीजे ने नौशाद का दिल खुश कर दिया। केर्सी को नौशाद साहब की तरफ से हरी झंडी मिल चुकी थी। उनको नौशाद की अगली फिल्म साथी (1968) के लिए अपने जौहर दिखाने का मौका मिल गया जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

नौशाद उनको तब से जानते थे जब एक बच्चे के रूप में वे अपने पिता कैवस लॉर्ड के साथ रिकॉर्डिंग स्टूडियो आते थे। केर्सी लॉर्ड फिल्म उद्योग में दूसरी पीढ़ी के संगीतकार थे। उनके पिता, कावस लॉर्ड, एक मास्टर अरेंजर और पर्क्युशनिस्ट थे। कावस लॉर्ड, जिनको कावास काका के नाम से संगीत दुनिया जानती, ने ही हिंदी फिल्म को बॉन्गो और कॉन्गो का परिचय दिया था।

यह कहना गलत नहीं होगा कि उनका बचपन म्युज़िक स्टूडियो में संगीत के महारथियों के साये में ही गुज़रा। एंथोनी गोंसाल्विस को वे अपना गुरु मानते थे और अपनी सफलता का सारा श्रेय वे उस वक़्त को देते हैं जब उनके गुरु उसने ज़बरदस्त मेहनत करवाया करते थे।

“वे इतने कठिन “म्यूजिक पीस” लिखा करते थे कि उनको बजाने में जान ही निकल जाती थी और मैं कई बार उनके सेट पर रो देता था। एंथोनी सर आते थे और व्यंग्यात्मक रूप से कहते थे, ‘यह भी नहीं बजा सकते? बढ़िया है,अभ्यास नहीं कीजिए और बस फ़िल्में देखिए’।”

केर्सी ने एक पर्क्युशनिस्ट के रूप में अपनी शुरुआत की थी। वे वही छोटे लैटिन पर्क्यूशन इंस्ट्रूमेंट्स बजाया करते थे जो उनके पिता बजाते थे। धीरे-धीरे उन्होंने रिकॉर्डिंग में बॉन्गो और कॉन्सैस बजाना शुरू कर दिया, और बाद में मैलेट उपकरणों की एक शृंखला– वाइब्राफोन और ज़ाइलोफोन पर भी कमाल दिखाना शुरू कर दिया था।

हिंदी फिल्म संगीत में लॉर्ड परिवार का योगदान ग्लोकेंसपील (glockenspiel) भी था, जिसका इस्तेमाल फिल्म हम दोनों में प्रसिद्ध गीत “मैं जिंदगी का साथ” में लाइटर को खोलते समय की धुन के लिए किया गया था।

अकोर्डियन के अलावा केर्सी अमेरिकी पर्क्यूशन और इलेक्ट्रोनिका के भी माहिर थे। मूग (Moog) सिंथेसाइज़र को हिंदी फिल्म संगीत से परिचय करने वाले केर्सी लॉर्ड ही थे।

1960 के दशक के उत्तरार्ध में जब संगीत के स्वर और ध्वनि में परिवर्तन आ रहे थे, भारतीय संगीत निर्देशकों की उभरती नई पीढ़ी, जिनमें राहुल देव बर्मन सबसे प्रमुख नाम था, के लिए यह एकदम उपयुक्त था।

केर्सी की बेटी जैस्मीन ने एक ब्लॉग पर लिखा है कि नौशाद और एसडी बर्मन के गीतों में बुलाए जाने पर वे अक्सर स्कूल गोल कर देते थे।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की महत्ता को स्वीकारते हुए आगे चलकर उन्होंने पश्चिमी संगीत के अलावा हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और तबला भी सीखा। संगीत निर्देशक मदन मोहन को जब कुछ माया करने का सूझा तो उन्होंने “तुम जो मिल गए हो” को अरेंज करने के लिए केर्सी को ही याद किया था।

संगीत अरेंजर के रूप में उनका करियर, हालाँकि, बहुत दिनों तक चल नहीं पाया। वे हमेशा अपने द्वारा किए गए काम के लिए फिल्मों के क्रेडिट में अलग से “क्रेडिट लाइन” माँगते थे। (आमतौर पर अरेंजर्स को पारंपरिक रूप से संगीत सहायकों के रूप में श्रेय दिया जाता था और उनके नामों को अन्य विभागों के सहायकों के साथ जोड़ा जाता था)

ताबूत में आखिरी कील जब लगी जब उन्हें कमाल अमरोही की पाकीज़ा (1972) के लिए पृष्ठभूमि संगीत के अरेंज करने का श्रेय नहीं मिला।

फिरोज़ खान की धर्मात्मा (1974) के शीर्षक संगीत जिसका श्रेय संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी को दिया जाता है, असलियत में केर्सी साहब का ही कारनामा था। इस फिल्म के बाद उन्होंने फिल्मो के संगीत अरेंज करने काम बंद ही कर दिया था।

केर्सी ने 1940 के दशक के उत्तरार्ध से लेकर 1990 के दशक तक लगभग हर संगीतकार के साथ काम किया लेकिन ये आरडी बर्मन ही थे जिनके साथ किए गए काम को आज तक याद किया जाता है। उन्हीं के कहने पर केर्सी एक बार फिर सामने आये और शालीमार के लिए उन्होंने पार्श्व संगीत दिया।

हालाँकि यह भी एक विडंबना कि संगीत प्रेमियों को उनके 50 सालों में बजाये गए 5,000 गीतों के बारे में कुछ मालूम नहीं पड़ पाया। उस ज़माने में फिल्म उद्योग के बाहर कोई भी उनका नाम नहीं जानता था। लेकिन अपने जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में संगीत के प्रशंसकों ने उन्हें ढूंढ ही निकाला और दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया।