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कश्मीरी पंडितों के उत्पीड़न की नहीं, एक आम शरणार्थी की कहानी बताती शिकारा

यदि शिकारा आप कश्मीरी पंडितों द्वारा झेले गए उत्पीड़न को देखने के लिए जाने वाले हैं तो मत जाइए। यह फिल्म शरणार्थियों की पीड़ा को तो दर्शाती है लेकिन धार्मिक आधार पर हुए उत्पीड़न को नहीं।

फिल्म में शुरू से अंत तक कश्मीर के माहौल को दर्शाने के लिए एक प्रेम कहानी को आधार बनाया गया है लेकिन अंततः यह प्रेम कहानी ही फिल्म का केंद्र बिंदु बनकर रह जाती है, न कि कश्मीरी पंडितों का उत्पीड़न।

इस बात में संदेह नहीं है कि फिल्म के दोनों मुख्य कलाकारों का अभिनय उत्कृष्ट है लेकिन फिल्म के अंत तक उनके पात्र की विश्वसनीयता भी घट जाती है। ऐसा होने का कारण बताकर मैं फिल्म की कहानी उजागर नहीं करना चाहती।

कश्मीर पर आधारित अनेक फिल्मों में जैसे सरकार और तंत्र को वहाँ के हालातों के लिए दोषी दिखाया जाता है, ऐसा ही इस फिल्म में भी किया गया है। नायक का मित्र पुलिस हमले में उसके पिता की मृत्यु के बाद ही आतंक का रुख करता है, ऐसा दिखाया गया है।

कहीं भी कश्मीरी पंडितों के उत्पीड़न का कारण धार्मिक उकसावा नहीं दिखाया गया, बल्कि परोक्ष रूप से इसे सरकार के सर मढ़ते हुए कश्मीर की आज़ादी का मुद्दा बताया गया है। सत्य यह है कि अगर कश्मीर की आज़ादी की बात होती तो कश्मीरी पंडितों को क्यों इसका भाग नहीं माना गया था।

दिल दहलाने वाले जिन उत्पीड़नों के किस्से आपने सुने होंगे, उन्हें मात्र तीन-तीन मिनट के दो दृश्यों- घर जलाना व नायक के भाई की हत्या- में संक्षिप्त कर दिया गया। इसके अलावा आतंकी गतिविधियों के बढ़ने का कारण कई बार अमेरिकी हथियारों की उपलब्धता बताई गई है, न कि जिहादी मानसिकता।

एक दृश्य में 1992 में एक बच्चे को “मंदिर वहीं बनाएँगे” का नारा लगाते हुए अवश्य देखा जा सकता है लेकिन उसे भी नायक अप्रत्यक्ष रूप से “लीडर का काम जोड़ने का होता है, तोड़ने का नहीं” कहकर शांत कर देता है।

व्यक्तिगत रूप से फिल्म का सबसे हृदयविदारक दृश्य मेरे लिए तब का है जब नायक अपने आतंकवादी मित्र से सेना के माध्यम से मिलने जाता है। इसमें एक आतंकवादी के मुँह से दार्शनिक शब्दों को निकलता देखकर मेरा फिल्म के लेखन से विश्वास उठ गया।

दूसरी चुभने वाली बात इसमें यह थी कि हम उस देश के हैं जहाँ “मदर इंडिया” जैसी फिल्म में अपने बेटे के गलत राह पर जाने पर माँ भी उसकी हत्या कर देती है और ऐसे में एक मित्र द्वारा दूसरे मित्र का न सिर्फ आतंकवाद छुपाना, बल्कि उसे कुछ बुरा-बला भी न कहना हृदयविदारक था।

फिल्म में एक ओर जहाँ 19 जनवरी 1990 के पहले होने वाली आतंकी गतिविधियों को कुछ बड़े-बुज़ुर्ग मुस्लिमों द्वारा बच्चों की शरारत कहकर टालना दिखाया, वहीं बहुसंख्यक मुस्लिमों द्वारा इस उत्पीड़न की मूक सहमति भी फिल्म के अंत में उजागर हो जाती है।

नायिका के कुछ व्यक्तिगत दृश्य दिल छूने वाले हैं जैसे जब वह घर छोड़ने से पहले ईश्वर की कुछ मूर्ति अपने साथ ले जाती है। ऐसा ही एक दृश्य कश्मीरी विवाह में जाने की उसकी अपेक्षा पर पानी फिरने का है लेकिन इसमें भी कश्मीरी पंडितों के उनकी संस्कृति से दूर होने का दोष भी अप्रत्यक्ष रूप से उन्हीं के सर मढ़ दिया गया है।

विश्व में कहीं भी कोई शरणार्थी के साथ जैसा व्यवहार होता है और वह जैसा महसूस करता है, वह भले ही इस फिल्म में सत्य रूप से दिखाया हो, लेकिन निस्संदेह यह एक कश्मीरी पंडित की कहानी नहीं है।