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जन्म दिवस (11 अक्टूबर) पर विशेष लोकनायक जयप्रकाश से मुलाकात का वह क्षण
Ashok Kumar Sinha - 4th November 2018
जय प्रकाश नारायण

मेरा जन्म स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग डेढ़ दशक बाद सन 1962 में हुआ था। इसलिए स्वतंत्रता-आन्दोलन की लड़ाई में शामिल होने या उसके शीर्ष नेताओं को देखने-सुनने का अवसर मुझे नहीं मिल पाया था। मेरे जीवन में तो जीता-जागता एक ही आन्दोलन मिला-1974 का जयप्रकाश आन्दोलन, जिसे आजादी की दूसरी लड़ाई के नाम से भी जाना जाता है। लोकतंत्र में भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था के खिलाफ शुरू हुए 1974 के जयप्रकाश आन्दोलन की वही मूल अहमियत है जो फ्रांस की स्वतंत्रता, भाईचारे एवं समानता की क्रांति और रूस की बौलशेविक क्रांति की है। अपने ही देश में स्थापित व्यवस्था के खिलाफ सुपरिभाषित मोहभंग की ये क्रांतियाँ अकेली मिसाल रही है। मुझे फक्र है कि जयप्रकाश आन्दोलन, जो लोकतंत्र की जिजीविषा और संघर्षों का अंतिम आन्दोलन था, का मैं प्रत्यक्षदर्शी और प्रत्यक्ष भोक्ता तो बना ही, लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे महामानव को करीब से देखने, उनसे बाते करने तथा उनका आर्शीवाद पाने में भी कामयाब रहा।

मेरा बचपन भोजपुर जिला के चाँदी गाँव में बीता। पाँचवीं तक की पढ़ाई मैने गाँव के ही प्राथमिक विद्यालय से पूरी की। छठी कक्षा में मेरा नामांकन मेरे माता-पिता ने पटना के एक प्रतिष्ठित विद्यालय पटना हाईस्कूल, गर्दनीबाग में करा दिया। उस समय मेरी उम्र दस वर्ष की रही होगी। बचपन का मन था, कल्पनाओं और कहानियों में रस लेता था। उन दिनों नंदन, चंदा मामा और चंपक जैसी बाल-पत्रिकाएं बड़े चाव से पढ़ा करता था। मुझे पत्रिका का नाम तो ठीक से स्मरण नहीं है, लेकिन उन्हीं में से किसी एक में उन्हीं दिनों जयप्रकाश नारायण की जीवनी पढ़ने को मिली थी। सन 1942 में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान जयप्रकाश नारायण के साहसिक कारनामों को पढ़कर मैं तत्क्षण उनका मुरीद बन गया। उनके साहसिक कारनामे मेरे मन-प्राण में बस गए। तब किसी से यह जानकर और ज्यादा खुशी हुई थी कि वे अपने शहर पटना के ही कदमकुआँ मुहल्ले में रहते हैं। तत्पाश्चात् जयप्रकाश नारायण के दर्शन के लिए मेरा मन व्याकुल हो उठा। उन दिनों मैं पटना के यारपुर मुहल्ला में अपने मौसा श्री दीप नारायण प्रसाद के यहाँ रहकर स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रहा था। यारपुर से कदमकुआँ की दूरी काफी अधिक थी और फिर मेरे जैसे अबोध बालक के लिए वहाँ अकेले पहुँच पाना मुमकिन भी नहीं था। इसलिए मन मसोस कर रह गया। समय के साथ जयप्रकाश नारायण के दर्शन की इच्छा भी धुंधली होती गयी और मैं स्कूल की पढ़ाई में जुट गया।

बात सन 1974 की है। यानि आज से लगभग 44 वर्ष पहले की बात है। लेकिन ऐसा भान होता है, मानो कल की हो। उस दिन की एक-एक घटना मेरे मनो-मस्तिष्क में आज भी ताजा है। तब मेरी उम्र बारह वर्ष की रही होगी। भ्रष्टाचार, बेराजगारी तथा शिक्षा में सुधार जैसे मुद्दों को लेकर छात्र आन्दोलन जोरों पर था। छात्रों, नौजवानों के लगातार अनुरोध पर जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया था। छात्रों एवं आम जनता के साथ-साथ साहित्यकारों, रंगकर्मियों व दूसरी विधाओं के कलाकार भी आन्दोलन में कूद पडे़ थे। दिनोंदिन जयप्रकाश का नेतृत्व परवान चढ़ रहा था। सरकार का प्रतिरोध और दमन भी जारी था। एक दिन मुझे जानकारी मिली कि एक जुलूस का नेतृत्व करते हए जयप्रकाश नारायण 4 नवम्बर, 1974 को पटना के आयकर गोलम्बर से होकर गुजरेंगे। उस दिन पटना सचिवालय के घेराव का कार्यक्रम था। जयप्रकाश नारायण को देखने या उनसे मिलने की मेरी पुरानी इच्छा फिर बलवती हो उठी। मेरा किशोर मन बेचैन हो उठा।

मेरे निवास स्थान यारपुर से आयकर गोलम्बर की दूरी चंद मिनटों की थी। हालांकि सचिवालय के घेराव कार्यक्रम को देखते हुए सरकार ने पूरे शहर की नाकेबंदी कर दी थी। उस दिन पटना से होकर गुजरने वाली 58 रेलगाड़ियाँ या तो रद्द कर दी गई थीं या फिर उनका मार्ग परिवर्तित कर दिया गया था। पूरा पटना शहर पुलिस-छावनी में तब्दील हो गया था। शहर के हर मोड़ पर अर्द्ध सैनिक बलों की टुकड़ियाँ-पुलिस की गश्ती। मुझे किशोर होने का लाभ मिला। पुलिस चौकसी के बीच से मैं आयकर गोलम्बर पहुँच गया। पता चला कि आयकर गोलम्बर से पूरब मंदिरी मोड़ के निकट पुलिस ने बाँस की घेराबन्दी कर रखी है और जुलूस को वहाँ से आगे बढ़ने नहीं दिया जायेगा। उत्सुकतावश मैं वहाँ पहुँच गया। मंदिरी मोड़ के पास पुलिस की चौकसी और कड़ी थी। पुलिस वहाँ से लोगों को खदेड़ रही थी। लोग पीछे हटते, फिर टिड्डियों की तरह आ जुटते। मैं भी इस रेल-पेल में कई बार हटा और फिर आ गया। सबको प्रतीक्षा थी जयप्रकाश के आने की।

थोड़ी देर बाद वहाँ उपस्थित पुलिस वालों की सक्रियता और बढ़ गई। लोगों को फिर से खदेड़ा जाने लगा। तब मैं निकट में अवस्थित गार्डिनर रोड अस्पताल में खिसक लिया। वहाँ के कर्मियों को भी जयप्रकाश जी की एक झलक पाने की प्रतीक्षा थी।

चंद ही मिनटों में जुलूस मेरी आँखों के सामने था। जुलूस क्या था, लोगों का विशाल हुजूम था। मैंने इतनी बड़ी भीड़ इससे पहले कभी नहीं देखी थी। दूर-दूर तक सिर्फ मानव सिर ही दिखाई पड़ रहे थे। जयप्रकाश जीप पर सवार थे और जुलूस के आगे-आगे चल रहे थे। उनको पहचानना किसी के लिए मुश्किल नहीं था। एक धवल चेहरा, साफा बाँधे, अलीगढ़ी पायजामे में कंधे पर गमछा। पुलिस की घेराबंदी के निकट पहुँचकर जयप्रकाश जीप से उतर पड़े और आगे की ओर बढ़े। पुलिस अफसरों ने उन्हें रोकना चाहा लेकिन जयप्रकाश उन्हें अनसुना करते हुए आगे बढ़ गए। जय प्रकाश के आगे बढ़ते ही भीड़ ने घेराबंदी तोड़ दी। गगनभेदी नारा गूँजने लगा-

भ्रष्टाचार मिटाना है, नया बिहार बनाना है।

अंधकार में एक प्रकाश, जयप्रकाश, जयप्रकाश।

मेरा खून भी खौलने लगा। मैं अस्पताल के अहाते से निकल जुलूस में हठात खींच गया। मैं प्रयास में था कि जयप्रकाश नारायण के निकट पहुँच जाऊँ। जुलूस आयकर गोलम्बर के निकट पहुँचा ही था कि पुलिस ने आँसू गैस छोड़ा। फिर लाठियाँ भांजनी शुरू कर दी। सब मेरी आँखों के सामने हो रहा था। मेरी नजर तो जयप्रकाश जी पर टिकी थी। जयप्रकाश गुस्से में कांपते हुए पुलिसकर्मियों की ओर बढ़े और कहा-“मारना ही है तो मुझे मारो, बच्चों को क्यों मारते हो।“ अनहोनी की आशंका को देखते हुए नौजवानों ने उन्हें घेर रखा था। लाठियाँ नौजवानों को गिराते-भगाते जयप्रकाश जी की तरफ बढ़ रही थीं। लेकिन नौजवानों को अपनी चोटों से ज्यादा भारत छोड़ो आन्दोलन के क्रांति-पुरुष जयप्रकाश को बचाने की चिन्ता थी। किसी व्यक्ति के प्रति दीवानगी का ऐसा जुनून मैंने इससे पहले कभी न देखा और न सुना था। फिर भी एक लाठी जयप्रकाश के बायें कंघे पर जा लगी। चोट खाकर वे जमीन पर बेसुध गिर पड़े। उनका चश्मा दूर छिटक गया और नकली दाँत इधर उधर बिखर गये। चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई और पुलिस पदाधिकारी भाग खड़े हुए। जुलूस वहीं रुक गया। मुझे तो जैसे काठ मार गया। कुछ क्षणों के लिए सोंचने समझने की मेरी शक्ति ही चली गयी थी। प्रतिक्रिया स्वरूप आक्रोश का ज्वार तो फूटना ही था।

चंद सेकंडों के बाद जब मेरी तन्द्रा टूटी तो पूरा आसमान “जयप्रकाश जिन्दाबाद” के गगनभेदी नारों से गूँज रहा था। मैं तब बच्चा था, पर इतना छोटा भी नहीं कि हाथ उठा-उठाकर नारों में साथ न दे सकूँ। सो, मैं भी उस नारेबाजी में शामिल हो गया। इसी बीच पुलिस ने लोगों को गिरफ्तार कर बस में बिठाना शुरू कर दिया। मैं भी जुलूस का हिस्सा था। मुझे भी घसीटकर बस में ठेल दिया गया। तब बिहार के अधिकांश जेल आन्दोलनकारी छात्रों से भरे हुए थे। पटना के राजभवन के निकट अवस्थित संजय गाँधी जैविक उद्यान निर्माणाधीन था और बोटेनिकल गार्डेन के नाम से जाना जाता था। हमें गिरफ्तार कर बस से वहीं ले जाया गया।

बोटेनिकल गार्डेन भी गिरफ्तार आन्दोलनकारियों  से पटा हुआ था। श्यामनन्दन मिश्र, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा समेत दर्जनों नेतागण वहाँ बंद थे। केवल मैं ही था सबसे कम उम्र का किशोर। मुझमें गजब की हिम्मत आ गई थी। मैंने लोगों के पास जा-जाकर सुनना शुरू किया। खबरें तैर रही थी कि जयप्रकाश नारायण को गंभीर चोटें आयी हैं और उन्हें बचाने के प्रयास में नानाजी देशमुख समेत कई अन्य लोग भी घायल हो गये हैं।

शाम को चार बज चुके थे। मुझे जोरों की भूख लगी थी। लेकिन वहाॅं भोजन की बात तो दूर, पानी भी मयस्सर नहीं था। यह अफवाह जोरों पर थी कि सभी गिरफ्तार लोगों को रात्रि में केन्द्रीय कारावास, हजारीबाग के लिए रवाना कर दिया जायेगा। मैं घबरा गया। मैं गिरफ्तार था, इसकी सूचना मेरे घर वालों को नहीं थी। मैं घर से उन्हें कुछ बताकर भी नहीं निकला था। पता नहीं, उन पर क्या बीत रही होगी। यह सब सोच-सोचकर मैं काफी परेशान था।

शाम को 6.00 बज गये थे। तभी कानोकान आग की तरह यह खबर फैली कि गिरफ्तार लोगों का हालचाल जानने जयप्रकाश नारायण बोटेनिकल गार्डेन पहुँचने वाले हैं। एक बार तो हमें इस सूचना पर विश्वास नहीं हुआ। पुलिस की लाठी से बुरी तरह घायल हमारा सिपहसलार हमसे मिलने कैसे आ सकता है। लेकिन थोड़ी देर बाद ही जयप्रकाश नारायण को बोटेनिकल गार्डेन में सशरीर उपस्थित देख मेरे समेत अधिकांश आन्दोलनकारी हक्का-बक्का रह गये। आगे-आगे जयप्रकाश नारायण और उनके पीछे जिला प्रशासन के वरीय पदाधिकारी। पूरा बोटेनिकल गार्डन “जयप्रकाश जिन्दाबाद” के नारों से गूँजने लगा। आन्दोलनकारियों से घिरे जयप्रकाश अपनी चोट भुलाकर सबका हालचाल पूछते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। बीच-बीच में साथ चल रहे प्रशासनिक अधिकारियों को हम लोगों के खाने-पीने की व्यवस्था के संबंध में कतिपय हिदायतें भी देते जा रहे थे। सहसा उनकी नजर मेरे किशोर वय पर पड़ी और वे सबको छोड़कर मेरे पास पहुँच गये।

मुझे देखकर जयप्रकाश की त्योरियाँ चढ़ गईं। इतने छोटे बच्चे को पुलिस ने कैसे गिरफ्तार कर लिया-उन्होंने सवाल किया। प्रशासन के आला अधिकारियों के पास इसका कोई जवाब नहीं था। मैं बगल में था, उनका हाथ मेरे माथे पर। मेरी स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कहाँ मैं अपने जयप्रकाश को दूर से देखने के लिए उत्सुक था और कहाँ उनका हाथ मेरे माथे पर था।

अपने आराध्य को सामने खड़ा पाकर मैं सातवें आसमान पर था। यह उनका वृद्धावस्था का समय था। फिर भी कैसे अपूर्व शोभा उनके वृद्ध शरीर में थी। एक अविस्मित कर देने वाली छरहरी कद-काठी, सिर पर दुपल्लू टोपी, गले में अंगोछा। यह उनकी वेश’भूषा थी। आँखों से स्नेह की पावन धारा बरस रही थी। भीतर की निर्लेप स्वच्छता और सदाशयता मुस्कराहट के रूप में उनके चेहरे पर झलक रही थी। उन्हें देखकर अनायास ही मुझे राष्ट्रकवि दिनकर की इन पंक्तियों का स्मरण हो आया-

कहते हैं उनको जयप्रकाश,

जो नहीं मरण से डरता है,

ज्वाला को बुझते देख कुण्ड में,

स्वयं कूद जो पड़ता है।

है जयप्रकाश वह, जो न कभी,

सीमित रह सकता घेरे में,

अपनी मशाल जो जला

बाँटता फिरता ज्योति अंधेरे में।

जय प्रकाश कुछ देर मेरे पास ही खडे़-खड़े सबको सांत्वना देते रहे। मैं अभिभूत था। एक गाँधी को चित्रों में देखा था- दूसरे गाँधी का वात्सल्य पा गया सीधे। फिर मेरी तरफ देखकर उन्होंने कहा-“यह घोर अन्याय है।“ प्रशासन के लोग जयप्रकाश जी का भाव ताड़ गए और उनके लौटने के चंद मिनटों बाद ही पुलिसवालों ने मुझे रिहा कर दिया।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण से मिलन का वह दृश्य आज भी हमेशा मेरी आँखों के सामने नाचता रहता है। वैसे महापुरूष के चंद मिनटों के सान्निध्य को विधाता के वरदान के अलावा और क्या कह सकता हॅूँ। आज जब मैं उस दिन की घटना का जिक्र अपने परिचितों, दोस्तों और सगे-संबंधियों से करता हॅूँ तो सब मुझे इस तरह आश्चर्यभरी नजरों से देखते हैं, मानों कुछ देर की मुलाकात में ही उस महापुरूष की महानता का थोड़ा अंश मुझमें भी समा गया हो।