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अरेंजर सेबेस्टियन डिसूज़ा ने जिस काउंटर मेलोडी को लोकप्रिय बनाया, वह है क्या?

एक संगीत अरेंजर की प्राथमिक भूमिका अपने कलाकार, कलाकारों के एक समूह आदि की आवश्यकताओं को एक कंडक्टर, निर्माता या संगीत निर्देशक के सुझावों के आधार पर उस धुन को अलग-अलग वाद्य यंत्रों से सजाना है। अरेंजर यह सुनिश्चित करता है कि वाद्ययंत्र से टेम्पो तक, संगीत के हर अंश के प्रत्येक पहलू के बीच, अच्छी तरह से सामंजस्य स्थापित किया जाए। 

इसे ऐसे समझते हैं कि अगर एक किसी एक धुन को बाद में कश्मीर में फिल्माया जाना है तो उस संगीत में पंजाबी ढोल नहीं संतूर को रखा जाएगा और यह दायित्व संगीत अरेंजर का ही होता है।

आपको एक गाने की बनने की कहानी और बने हुए गीत दोनों को सुनवाता हूँ। 

पहले सुनते हैं कि गीत कैसे बन रहा होता है। ध्यान रहे कि इस धुन को अभी शब्द भी नहीं मिले हैं।

और अब सुनते हैं अरेंजर द्वारा बनाए हुए गीत को-

ये जो आप अंतर देख रहे हैं पहले और दूसरे वीडियो के बीच में, बस यही काम है संगीत अरेंजर का।

यह कहना गलत नहीं होगा कि संगीत अरेंजर्स पर्दे के पीछे शो स्टॉपर हैं। एक संगीत अरेंजर उपयोग किए जाने वाले वाद्ययंत्रों को तय करता है, मेलोडी को बढ़ाता है और टेम्पो को तय करता है। संगीत निर्देशक एक ही इंस्ट्रूमेंट पर राग बनाता है लेकिन संगीत अरेंजर यह तय करता है कि किस राग के लिए कौन-सा वाद्य बजाया जाए। 

और इसी जानकारी के साथ चलिए संगीत अरेंजर्स की दुनिया में जिनके होने से हिंदी फिल्म में चार चाँद लग गए थे।

एंथनी साहब के साथ फ़िल्मी दुनिया जिनका नाम बहुत इज्ज़त के साथ लिया जाता है, वे हैं सेबेस्टियन डिसूज़ा जो की गोवा से ही थे।

यदि आप शंकर-जयकिशन, ओपी नैय्यर या सलिल चौधरी द्वारा रचित कोई फिल्मी गीत सुनते हैं, तो आपको पृष्ठभूमि में गाने के साथ-साथ एक धुन भी सुनाई देती है। यह समानांतर धुन वायलिन, सेलो, पियानो, स्पेनिश गिटार के साथ बनाई गई है। 

सुनिए ध्यान से ज़रा… 

काउंटर-मेलोडी के रूप में जानी जाने वाली इस “एक गीत के लिए समानांतर धुन” को गोवा के एक वायलिन वादक- सेबेस्टियन डिसूज़ा ने पेश किया था। डिसूज़ा फिल्मी गीतों में काउंटर-मेलोडी बनाने में अग्रणी थे। उनके द्वारा इसको पेश करने के बाद यह तकनीक लोकप्रिय होती चली गई और 1950 से डिसूज़ा हिंदी फिल्म उद्योग के कई संगीत निर्देशकों के सबसे पसंदीदा संगीत अरेंजर बन गए। कुछ समीक्षकों का मानना है कि इस काउंटर मेलोडी को पहले के भी संगीतकारों के काम में देखा गया था। पर शायद मुख्य तौर पर इसको अपने हर काम का हिस्सा बनने का श्रेय डिसूज़ा साहब को ही जाता है। 

1906 में पैदा हुए डिसूज़ा 1942 में लाहौर गए और होटल स्टिफ़ेल्स में अपना बैंड शुरू कर दिया। यह बैंड 1947 तक जारी रहा और फिर विभाजन के बाद, वह बॉम्बे चले आए जहाँ फिल्म उद्योग में एक वायलिन वादक के रूप में अपना करियर शुरू किया। किंतु अभी बड़ा ब्रेक मिलना बाकी था। संगीत अरेंजर के रूप में डिसूज़ा का पहला कार्य ओपी नैय्यर के साथ था, जब नैय्यर ने अपना पहला गाना प्रीतम आन मिलो बनाया जो कि सरोज मोहिनी नय्यर (ओपी नैयर की पत्नी) द्वारा लिखा गया था।

तीन साल बाद, नैय्यर ने अपनी पहली फिल्म, आसमान, एक स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में साइन की। उस समय उन्होंने डिसूज़ा को फिर से अपने अरेंजर के रूप में काम करने के लिए बुलाया था। इस प्रकार, डिसूज़ा ने 1952 में ओपी नैय्यर के साथ फिल्म संगीत में अपने करियर की शुरुआत की थी। 

ये जोड़ी 1973 तक अपना जादू बिखेरती रही जिनकी आखिरी फिल्म थी “प्राण जाए पर वचन ना जाए” थी, संयोग से गायिका आशा भोसले की भी नैय्यर साहब के साथ आखिरी फिल्म थी। 

इस फिल्म के साथ ओपी साहब और आशा की प्रेम कहानी पर भी फुलस्टॉप लग गया था। ये गीत जो फिल्म में तो नहीं था किंतु इसको फिल्म फेयर अवार्ड मिला था।

1952 में डिसूज़ा के दोस्त सनी कैस्टेलिनो, जो शंकर-जयकिशन के लिए एक अरेंजर्स के रूप में काम करते थे, ने उन्हें शंकर जयकिशन से परिचित कराया। अमिय चक्रवर्ती की दाग से डिसूज़ा के काम की शुरुआत शंकर-जयकिशन के साथ भी हो गई जिसने आगे चलकर हाहाकार मचा दिया। दाग में, डिसूज़ा ने तलत महमूद और लता मंगेशकर से “ऐ मेरे दिल” गाना गवाया और इस एक गीत के लिए एक यादगार काउंटर-मेलोडी का निर्माण किया था। सेबेस्टियन साहब ने, इस गाने में वायलिन और मैंडोलिन को साथ में लेकर मेलोडी बनाई थी।

सुनिए उनके बारे में प्रसिद्ध अरेंजर अनिल मोहिले साहब क्या कह रहे हैं।

डिसूज़ा ने 23 साल तक लगातार बिना ब्रेक के शंकर जयकिशन के साथ काम किया,जो किसी भी अरेंजर्स के लिए रिकॉर्ड है। उन्होंने सलिल चौधरी, वसंत देसाई, एस डी बर्मन, मदन मोहन, रोशन, दत्ताराम और एन दत्ता जैसे महान संगीत निर्देशकों के लिए भी काम किया। 

जिस काम को एंथनी गोंसाल्वेस ने शुरू किया था, सेबेस्टियन साहब ने उसको आगे बढ़ाते हुए और भी विस्तृत और अलंकृत कर दिया। उनके कुछ गीत पेश हैं आपके लिए-

गीत फिल्म संगीत निर्देशक
मेरा नाम चिन चिन चू हावड़ा ब्रिज (1958) ओपी नैय्यर
रात के हमसफर ऐन ईवनिंग इन पैरिस (1967) शंकर-जयकिशन
आजा सनम मधुर चांदनी चोरी चोरी (1956) शंकर-जयकिशन
ऐ मालिक तेरे बंदे हम दो आँखें बारह हाथ (1957) वसंत देसाई
आजा रे परदेसी मधुमति (1958) सलिल चौधरी