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कॉन्गो जैसे वाद्ययंत्रों को हिंदी फिल्म संगीत में लाने वाले लॉर्ड— जाने वो कैसे लोग थे भाग-5

प्रसंग- संगीत के भूले-बिसरे सितारों को जानने की शृंखला में पढ़ें बॉन्गो, कॉन्गो, कोबाचे जैसे वाद्ययंत्र कैसे आए हिंदी फिल्मों में।

बात उन दिनों की है जब 19वीं शताब्दी में, अंग्रेज़ी सरकार ने ये ज़रूरी कर दिया था कि सभी लोग अपने नाम के आगे कुलनाम भी लगाएँगे। ये सबसे ज्यादा परेशानी का सबब बना था पारसियों के लिए चूँकि वे अभी तक किसी कुलनाम का उपयोग नहीं किया करते थे। आखिरकार उसका इलाज भी उन्होंने ही ढूंढ निकाला था और अपने काम को ही अपना कुलनाम बना डाला था। उसी के बाद हमने सुने थे बाटलीवाला, मोटरवाला, वकील, मिस्त्री, कांट्रेक्टर आदि सरनेम।

उन्हीं दिनों अंग्रेज़ों का पाला पड़ा था एक ऐसे पारसी शख्स से जिसका रहन-सहन, बातचीत का तरीका सभी शाही अंदाज़ का था। उस शख्स की आदतों और तौर-तरीकों को देखते हुए अंग्रेज़ों ने उस व्यक्ति का नामकरण किया था “लॉर्ड”, बिना ये सोचे समझे कि आने वाले समय में हिंदी फिल्म संगीत में लॉर्ड परिवार की हैसियत किसी “लॉर्ड” से कम नहीं रहने वाली है।

उसी व्यक्ति के बेटे का नाम था कावस जो आगे चलकर हिंदी फिल्म संगीत जगत में कावस काका के नाम से जाने गए। 1911 में पुणे में जन्मे, कावस लॉर्ड संगीत सीखने के लिए शहर आए थे जहाँ कुछ दिनों बाद चिक चॉकलेट ने उनको अपने बैंड में शामिल कर लिया था।

वहीं पर उन्हें सी रामचंद्र ने देखा और फिर शुरुआत हुई काका कावस की हिंदी फिल्म संगीत यात्रा। आप जानकर हैरान रह जाएँगे कि बॉन्गो, कॉन्गो, कोबाचे, कास्टानेट, रेसो रेसो और ट्रायंगल जैसे पश्चिमी वाधयंत्र हिंदी फिल्म संगीत में उन्हीं की देन हैं।

 

उन्हीं दिनों गगिम्बास नामक एक बैंड को टाटा परिवार के एक सदस्य द्वारा पेरिस से ताज होटल में प्रदर्शन के लिए लाया गया था। जब वह बैंड वापस जा रहा था तब काका ने बैंड से बॉन्गो और कॉन्गो जैसे उपकरण खरीद लिए और इस प्रकार इन वाद्ययंत्रों को हिंदी फिल्म उद्योग में लाया गया।

सोचिए अगर आज के हिंदी फिल्म संगीत में से बॉन्गो और कॉन्गो की रिदम निकाल दी जाए तो उन गीतों का क्या हाल होने वाला है? कॉन्गो बजाने का उनका तरीका हर गीत में एक जैसा ही नहीं होता था। जैसे इस गीत में वो कॉन्गो को साधारण तरीके से बजा रहे हैं।  

लेकिन अगले गीत में वो आपको कॉन्गो पर अपने नाखूनों का इस्तेमाल करते हुए सुनाई देंगे। इतना ही नहीं, आप उनको कॉन्गो पर ब्रश का इस्तेमाल करते हुए अगले गीत में सुन सकते हैं-

1950 से लेकर 1990 तक के अपने फ़िल्मी सफ़र में कावस काका ने हिंदी फिल्म संगीत के सभी दिग्गजों के साथ काम किया। नौशाद, सी रामचंद्र, अनिल बिस्वास, एसडी बर्मन, श्याम सुंदर, शंकर-जयकिशन, ओपी नैय्यर, रोशन, मदन मोहन, जयदेव और पंचम जैसे तमाम बड़े नामों के साथ वो आखिरी तक जुड़े रहे।

काका का इंटरव्यू आप यहाँ देख सकते हैं जिसे निर्माता रुद्रदीप भट्टाचार्जी की डॉक्यूमेंट्री द ह्यूमन फैक्टर से लिया गया है।

एक बातचीत में होमी मुल्लन, जो पंचम के नवरत्नों में से एक थे, ने बताया था कि आरडी की लगभग सभी रिकॉर्डिंग में कावस काका उपस्थित रहते थे। होमीजी, जो स्वयं पर्क्यूशन के मास्टर थे ने स्वीकार किया था कि कावस लॉर्ड जैसा कोई दूसरा बोंगो और पर्क्यूशन खिलाड़ी हो नहीं हो सकता। 

उन्हीं काका कावस के बेटे थे केर्सी लॉर्ड और बुजी लॉर्ड जिन्होंने अगले कुछ सालों में अपने पिता का नाम रोशन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लॉर्ड परिवार एक ऐसा परिवार था जिसने बॉलीवुड के लगभग हर दिग्गज संगीत निर्देशक के साथ काम किया है।

काका 2007 में हमें छोड़कर इस दुनिया से चले गए और अपने पीछे छोड़ गए एक ऐसा नाम जिसकी बराबरी आज तक कोई नहीं कर पाया। उनके अंतिम दिनों का वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं