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संगीत जगत में भारत के लुई आर्मस्ट्रांग कौन हैं जिनकी अंतिम विदाई ट्रम्पेट के साथ हुई?

भूले बिसरे, परदे के पीछे के सितारों के किस्से को आगे बढ़ाते हुए चलते हैं अब उनकी तरफ जिन्हें संगीत जगत में भारत के लुई आर्मस्ट्रांग के नाम से जाना जाता है। 

अपने साथी गोवानी संगीतकारों की तरह वे भी दिन में तो किसी फिल्म स्टूडियो में रहते थे किंतु रात होते ही उनपर जैज़ का जूनून सवार हो जाता। 1940 के दशक के मध्य तक उनका नाम रंगून और मसूरी तक पहुँच चुका था और वे स्वयं को एक लोकप्रिय बॉम्बे जैज़ संगीतकार के रूप में स्थापित कर चुके थे।

कुछ समय पश्चात वे स्पॉटलाइट्स नामक एक बैंड के स्थाई सदस्य हो चुके थे। आखिरकार साल 1945 में उनकी मेहनत और किस्मत रंग लाई जब उन्होंने एक प्रतियोगिता में करीब दर्जन भर लोगों को हराकर ग्रीन होटल, जो कि ताज समूह का होटल था, द्वारा आयोजित प्रतियोगिता को जीत लिया।

चिक एंड द म्युज़िक मेकर्स नामक बैंड की स्थापना भी उन्होंने उसी साल कर डाली थी। अब तो आपको नाम का कुछ अंदाज़ा हो ही गया होगा। वह नाम था चिक चॉकलेट जिन्हें हिंदी फ़िल्मी संगीत जगत में भारत के लुई आर्मस्ट्रांग के नाम से जाना जाता है।

कुछ ही दिनों में चिक चॉकलेट, सी रामचंद्र और मदन मोहन जैसे संगीत निर्देशकों के लिए एक ज़रूरत बन चुके थे। (चिक को पहली बार क्रेडिट भी मदन मोहन ने फिल्म भाई-भाई में अपने सहायक के रूप में दिया था।) उसी साल उन्होंने अपने फ़िल्मी सफर की शुरुआत भी कर ली जब उन्होंने नादान (1951), रंगीली (1952), और कर भला (1956) में संगीत दिया। सुनिए नादान फिल्म का यह गीत जिसे आवाज़ दी थी तलत महमूद ने-   

और फिर आती है फिल्म समाधि एक जिसमें चिक के द्वारा अरेंज किए गए गीत ने भारतीय फिल्म संगीत को परिचय करवाया था “स्विंग” से जिसकी पहली बानगी सुनी थी लोगों ने और वह गीत था- “गोरे-गोरे, ओ बांके छोरे“।

उसके बाद आई फिल्म अलबेला जिसमें उनके द्वारा बनाए गए गीत शोला जो भड़के ने उस समय तहलका मचा दिया था। यह वही फिल्म थी जिसने भगवन दादा और सी रामचंद्र साहब को नए आयाम दिए थे।

इसी फिल्म के एक गीत में चिक साहब ने एक गीत में अपनी शक्ल भी दिखाई थी जिसमें वो और उनके साथी झालरदार ड्रेस पहन कर स्टेज पर अपने करतब दिखा रहे थे। ये फिल्म इतनी कामयाब हुई कि इसके बाद चिक और उनके बैंड ने स्टेज पर इस ड्रेस को अपनी यूनिफार्म बना लिया।

चिक चॉकलेट का करियर दुखद रूप से काफी छोटा रहा और  मई 1967 में 51 बरस की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। उनके अंतिम समय में उनके करीब बॉम्बे के अग्रणी अकॉर्डियन वादक गुडी सर्वई और ड्रमर फ्रांसिस वाज़ थे और उनकी अंतिम इच्छा अनुसार उनकी ट्रम्पेट को उनके सीने पर रखकर उनको विदा कर दिया गया था। 

कुछ ही समय बाद, चेतन आनंद की आखरी खत स्क्रीन रिलीज़ हुई थी जिसके एक गीत “रुत जवान जवान” में भारत के लुइस आर्मस्ट्रांग को आखिरी बार देखा गया था। साथ ही देखा गया था पहली बार गायक भूपिंदर को पहली बार स्क्रीन पर गिटार बजाते और गीत गाते हुए।