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संगीत के लिए गोवा से बंबई भागकर आए एंथोनी गोंसाल्वेस— जाने वो कैसे लोग थे भाग-1

यूँ तो आरडी बर्मन, मदन मोहन और नौशाद जैसे बॉलीवुड के सबसे बड़े संगीत निर्देशकों का आकर्षण वर्षों बीत जाने के बाद भी बना हुआ है। लेकिन, जैसे अभिनेता और अभिनेत्रियाँ किसी भी फिल्म के पहचाने हुए चेहरे होते हैं, ऐसे कई अनदेखे चेहरे भी होते हैं, जिन्होंने इन महान संगीतकारों को अपने कालातीत गीत बनाने में मदद की है।

मुझे जिस गीत की पहली याद है उसका ज़िक्र आगे कभी करूँगा पर अभी ज़िक्र इस बात का कि जन्म के साथ ही कानों में संगीत घुलता रहा था। जिस दशक की मेरी पैदाइश है वो दशक पंचम दा का था और यही कारण है कि मैं भी उनके लाखों हज़ारों फैन में से एक हूँ। जब पंचम दा को “तरीके” से सुनना शुरू किया तो उनके संगीत पर ध्यान गया। संगीत पर ध्यान गया तो संगीत को सजाने वालों के काम पर ध्यान जाना लाजिमी ही था।

भाग्य से 2008 में सिंगापुर में पंचम दा के “असली गैंग” यानी कि उनके म्युज़िक सिटिंग रूम मैं बैठने वालो को लाइव सुने का मौका मिल गया। तब मैंने जाना था मनोहारी दा को, किशोर सोढा जी, रमेश एयर जी को, भानु गुप्ता जी, होमी दा और कांचा जी को।

उस दिन के बाद से मेरी यात्रा शुरू हुई थी इन गुमनाम सितारों को जानने की जिन्होंने परदे के पीछे रहकर इतना शानदार काम किया कि आप आज भी उनके बनाए गीतों को गुनगुनाते हैं। बस फर्क इतना है कि आप उनका नाम नहीं जानते। 

सोचता हूँ कहानी वहाँ से शुरू करूँ, जहाँ से शुरू हुई थी। यानी कि चलते हैं गोवा जिसने हिंदी फिल्म संगीत को एक नई दिशा दी थी। कई सारे नाम है किंतु शुरुआत तो अमिताभ से, आई मीन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के गुरूजी से ही करनी पड़ेगी। 

तो अब बात करते हैं एक ऐसे शाहकार की जिनका नाम सामने ही नहीं आ पाता अगर सोशल मीडिया ना होता। वो हमेशा के लिए गुम हो गए होते अगर कुछ संगीत प्रेमियों को संगीत के साथ उसके बनने की कहानी पढ़ने की ज़िद ना होती। वो थे, एंथोनी साहब, जी हाँ जिनको लक्ष्मी-प्यारे की जोड़ी अपना गुरु मानती थी। गोवा से मुंबई का सफर तय कर के संगीत को एक नए आयाम तक ले जाने की कहानी है इनकी..

इनके बारे में मीडिया में बहुत कुछ लिखा या बताया नहीं गया है लेकिन उनकी उपलब्धियाँ अविस्मरणीय हैं। सफर गोवा में छोटे से गाँव से शुरू हुआ, जहाँ पर बहुत अधिक संसाधन नहीं थे। गोंसाल्वेस साहब ने मुंबई फिल्म उद्योग में 1950-60 के दशक में जबरदस्त योगदान दिया था।

गोंसाल्वेस ने मुंबई में भारतीय फिल्म उद्योग के अधिकांश दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया था जिनमें नौशाद, बड़े बर्मन साहब, शंकर-जयकिशन और एलपी की जोड़ी शामिल है। प्यारेलाल की सबसे अविस्मरणीय रचना मई नेम इज़ (मेरा नाम) एंथोनी गोंसाल्विस उनके गुरु एंथोनी गोंसाल्विस को ही एक श्रद्धांजलि थी। 

उनकी पुत्री, लक्ष्मी, जो अभी भी गोवा में रहती हैं, के अनुसार उनके पिता के मुंबई प्रस्थान की कहानी बहुत दिलचस्प थी। उनके पिता उन्हें बंबई जाने की अनुमति नहीं दे रहे थे और दूसरी तरफ उनके भाई और बहनें उन्हें बंबई जाने में मदद कर रहे थे। किंतु अंत में गोन्साल्वेस अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध अपनी मौसी की मदद से बंबई भागने में सफल रहे।

अगर वो गोवा में रह जाते तो शायद हमारे पास कभी भी एक महान एंथोनी गोंसाल्विस नहीं होते जिन्होंने भारतीय संगीत उद्योग में अपनी गहरी छाप छोड़ी। उनके अरेंज किए हुए गीत आज भी अमर हैं।

आइए देखते हैं कुछ झलकियाँ जब उनको भारतीय संगीत में उनके योगदान के लिए पुरस्कार दिया गया था।

आपको कुछ गीतों के मुखड़े बताते हुए इस शृंखला के पहले भाग को विराम देता हूँ। आइए उनके द्वारा अरेंज किए गए करीब हज़ार गीतों में से कुछ गीतों पर नज़र डाल लेते हैं।

  1. चलते चलते यूँ ही– पाकीज़ा (1972)
  2. दिल जलता है– पहली नज़र (1945)
  3. हम आपकी आँखों में– प्यासा (1957)
  4. इन्हीं लोगों ने– पाकीज़ा (1972)
  5. ज्योति कलश छलके– भाभी की चूड़ियाँ (1960)
  6. सीने में सुलगते हैं अरमान– तराना (1950)

अन्थोनी साहब के दिल टूटने की कहानी अगले हफ्ते…