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संगीत के दीवाने एंथनी गोंसाल्वेस क्यों फिल्म उद्योग से हुए दूर- जाने वो कैसे लोग थे भाग-2

नरेश फर्नान्डिस एक मशहूर लेखक हैं और इन गुमनाम हुए संगीत के सितारों के ऊपर बहुत काम कर चुके हैं। एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि उनके एक दोस्त ने उन्हें एक नए चरित्र के बारे में बताया था जिसे उन्होंने राज कॉमिक्स में प्रकाशित एक कहानी में खोजा था।

ये एक ऐसा गिटार बजाने वाले संगीतकर की कहानी थी जिसने “क्राउनम्यूज़िक” नामक एक जादुई ध्वनि तैयार की थी। लेकिन उसके ईर्ष्यालु प्रतिद्वंद्वियों ने उसे मौत के घाट उतार दिया ताकि वे उसके काम को चुरा सकें। अब, प्रत्येक रात वह सुपरहीरो कब्र से निकलता है और अपनी ज़िंदगी से हताश हुए लोगों को आत्महत्या करने से रोकता है।

फर्नाडिज़ ने राज कॉमिक्स से कई बार संपर्क स्थापित करने की कोशिश करते हुए इस किरदार के बारे में जानना चाहा किंतु वे असफल रहे। आप जानना चाहेंगे उस पात्र का नाम?

जी हाँ उस पात्र का नाम था एंथनी जो एंथनी गोंसाल्वेस साहब की जिंदगी से मेल खाता था। चलिए लौट कर चलते हैं एंथनी साहब की जिंदगी की किताब के उन पन्नों की तरफ जो बहुत कम लोगों ने पढ़े हैं। यूँ तो काफी कुछ फर्नान्डिस वे अपनी इस किताब और अपनी डाक्यूमेंट्री में बताया है किंतु वह अभी भी आम जन तक पहुँचा नहीं है।

लगभग हर रविवार को, बांद्रा के लिंकिंग रोड पर सुशीला सदन में उनके अपार्टमेंट में संगीत सीखने वालों की महफ़िल लगा करती थी। कुछ सालों बाद उनमे से दो छात्रों ने काफी नाम कमाया था और वो थे आपके अपने पंचम दा और एल-पी जोड़ी वाले प्यारेलाल जी। गोंसाल्वेस साहब राग-आधारित संगीत के दीवाने थे और वे अक्सर कहते थे कि रागों की मेलोडी और रिदम ने उनके दिल और दिमाग पर हमेशा के लिए कब्ज़ा कर रखा है।

मुंबई आने के बाद उनके जुगलबंदी के कार्यक्रमों में पन्नालाल घोष, पंडित राम नारायण, पंडित श्याम सुंदर और उस्ताद इनाम अली खान देखे जाने लगे थे। उन्होंने अपनी रचनाओं को सोनातीना इंडियाना, कॉन्सर्टो इन राग सारंग और कॉन्सर्टो फॉर वायलिन और ऑर्केस्ट्रा इन टोडी टैट का नाम दिया रहा।

अप्रैल 1958 में आखिरकार उनके सपनों को पर मिल ही गए जब बहुत मुश्किलात के बाद गोंसाल्वेस साहब ने इंडियन सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा की स्थापना की। उस कंसर्ट में करीब 100 से ऊपर संगीतकारों के एक समूह को विशेष रूप से उनकी रचनाओं को प्रस्तुत करने के लिए इकट्ठा किया गया था। उस रोज़ सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज में बेताब हो रहे दर्शकों  के सामने एकल गायक और गायिका के रूप में मन्ना डे और लता मंगेशकर को प्रस्तुत किया गया था, जो उस ज़माने में एक बड़ा कारनामा था।

हिंदी फिल्म संगीत को 30 साल बाद 1965 में अपनी जादूगरी से मंत्रमुग्ध कर देने के बाद बाद संन्यास लेकर एंथनी साहब ने अमरीका जाने का मन बना लिया था। इस बारे में उनकी पुत्री लक्ष्मी का कहना था, “मेरे पिता ने मुंबई के संगीत उद्योग के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन उन्हें कभी भी इसके लिए उचित श्रेय नहीं मिला।”

लक्ष्मी के अनुसार, भारत छोड़ने के पीछे प्रमुख कारण उनके प्रति केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री का अशिष्ट व्यवहार था। उनका ऐसा दिल टूटा कि वे संगीत से दूर होते चले गए….

“जब उन्हें एनीमेशन फिल्म में संगीत प्रदान करने के लिए वॉल्ट डिज़नी से अवसर मिला तो मेरे पिता ने इसपर काम किया और स्क्रिप्ट लिखी और करीब छह महीने लगाकर पूरे संगीत को लिखा। उसके बाद, उन्हें भारत सरकार की स्वीकृति लेनी थी जिसके प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। ये कार्य भारत के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के माध्यम से ही किया जाना था। इसलिए आखिरकार एंथनी साहब सूचना और प्रसारण मंत्री से मिलने दिल्ली गए, जिन्होंने उनका अपमान करते हुए कहा था कि कैसे एक ईसाई संगीत संगीतकार भारतीय संगीत का निर्माण कर सकता है।”

इस सदमे से फिर एंथनी साहब उबर नहीं सके। 

1965 में उन्होंने फिल्म उद्योग छोड़ दिया था और न्यूयॉर्क में सिरैक्यूज़ विश्वविद्यालय से यात्रा अनुदान के माध्यम से अमेरिका चले गए थे। वह अमेरिकन सोसाइटी ऑफ कम्पोज़र्स, पब्लिशर्स और ऑथर्स के सदस्य भी बन गए थे। 

कुछ वर्षों बाद वे फिर भारत लौट आए और अपने गोवा के पैतृक गाँव मजोर्दा में बस गए। संगीत रचना जारी रखा था उन्होंने हालाँकि वे फिर कभी हिंदी फिल्मों में शामिल नहीं हुए।

और फिर एक दिन निमोनिया और रक्तचाप के कारण के 2012 में उनका निधन हो गया और एक युग का अंत हो गया।

आपको मौका लगे तो आप “एंथनी गोंसाल्वेस: द म्यूज़िक लेजेंड” नाम की डाक्यूमेंट्री देख सकते हैं जो श्रीकांत जोशी और अशोक राणे द्वारा निर्देशित है।

अगले अंक में बात करेंगे कि आखिरकार अरेंजर इतने विशेष क्यों हुआ करते थे?