विचार
भगत सिंह ने काउन्सिल हाउस में जो बम फेंका था, उसकी जानकारी पहले से गांधी को थी?

मई 1988 में आकाशवाणी की राष्ट्रीय प्रसारण सेवा आरंभ हुई। उसके कुछ दिन बाद ही बिहार में भयानक भूकंप आया था। बताया जाता था कि यह भूकंप सन् 1936 में बिहार में आए भूकंप से भी भयानक था। उसके चलते बिहार में भारी तबाही हुई थी।

आकाशवाणी महानिदेशालय के स्तर पर तय हुआ कि इस भयानक आपदा पर केंद्रित एक रिपोर्ट का प्रसारण राष्ट्रीय स्तर पर किया जाए। ज़िम्मेदारी मुझे दी गई। यह शायद इसलिए कि मैं सन् 1983 से 1987 तक रांची केंद्र पर पदस्थ था और बिहार की अच्छी जानकारी मुझे थी।

यात्रा का पहला पड़ाव पटना था लेकिन मैंने सबसे पहले उन क्षेत्रों की यात्रा करना आवश्यक समझा जहाँ भारी तबाही हुई थी और सरकार ने राहत कार्य चलाए हुए थे। सबसे पहले पटना से पूर्णिया जाना तय हुआ। उसके बाद दरभंगा गया जहाँ मीलों तक पानी ही पानी भरा था।

बिहार से लेकर दिल्ली तक हंगामा मचा हुआ था और देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भूकंप प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया। ‘विपक्ष जितना हल्ला कर रहा है वास्तव में उतना नुकसान नहीं हुआ है’ कहकर उन्होंने जनता के जले पर नमक छिड़कने का काम किया।

इसके बाद पूरी की पूरी कांग्रेस पार्टी सब कुछ छोड़कर प्रधानमंत्री की बात को सच साबित करने में जुट गई। लेकिन देश और स्वयं बिहार की अनेक स्वयं सेवी सस्थाएँ जनता की सेवा में जुटी थीं। बिना शोर-शराबे और हल्ला-गुल्ला किए। चुपचाप। अकेले।

दरभंगा और भागलपुर में भूकंप का प्रभाव एकदम वैसा ही भयावह था जितना पूर्णिया में। इस क्षेत्र में एक ऐसा चश्मदीद गवाह भी मिला जो  सन् 1936 के भूकंप और आज़ादी की लड़ाई के अनुभव से गुज़रा हुआ वय और बुद्धि दोनों से परिपक्व था। नाम था पंडित श्याम नंदन मिश्र।

मध्यम कद। चमकती हुई आँखें। चेहरे पर तेज। खद्दर के कपड़े। यानी सादगी की प्रतिमूर्ति। उनकी आयु होगी कोई 80-85 वर्ष। वे महात्मा गांधी के अनुयायी थे और एक समय में गांधी के सहयोगी भी रहे थे। स्वतंत्रता के बाद राजनीति से ऐसा मोह भंग हुआ कि सन्यस्त भाव में चले गए और दरभंगा के लहरिया सराय में रहने आ गए।

आसपास के क्षेत्र का एक बड़ा समूह उनका अनुयायी भी बन गया था। समूह के लोग प्रतिदिन शाम को उनका प्रवचन सुनने भी आते थे। हम लगभग उसी समय उनके दर्शन के विचार से उनके आवास पर पहुँचे थे। उनका आवास एक गली से निकलकर दाहिनी ओर पड़े मैदान में था।

गाड़ी से ही ध्यान गया कि भूकंप की वजह से घर की बाहरी दीवार पर ऊपर से नीचे तक एक खतरनाक दरार पड़ गई थी। दरार ने बातचीत शुरू करने का एक आधार दे दिया। लेकिन आधार तो तब काम आता जब सामने वाला भी उस विषय पर बात करने को तैयार हो।

उन्होंने साफ कह दिया, ‘तुम अगर यह चाहते हो कि मैं सरकार या किसी राजनेता की आलोचना करूँ,तो यह संभव नहीं है।’

मैंने कहा, ‘नहीं पंडित जी उद्देश्य किसी की आलोचना कराना नहीं है। मैं तो सिर्फ यह जानना चाहता था कि अपने सन् 1936 का भूकंप और उससे मची तबाही का मंज़र देखा है। सन् 1936 और 1988 की तबाही और व्यवस्था के बारे में जानने की इच्छा से बात छेड़ी थी। आप उत्तर देना चाहें तो ठीक है, नहीं देना चाहें तो आपकी इच्छा है। आपके घर की बाहरी दीवार पर दरार देखी है इसलिए सोचा कि दोनों भूकंपों की  तीव्रता, उससे हुई तबाही और राहत कार्यों के बारे में आपसे जानकारी प्राप्त करना उचित होगा।’

उन्होंने बड़ी सतर्कता से उत्तर दिया। बोले, ‘मैंने कहा न कि मैं किसी की आलोचना करने वाला नहीं हूँ।’

‘ठीक है, पंडित जी। जैसी आपकी इच्छा। पर, आप गांधी जी के साथ रहे हैं। उनके साथ के कुछ प्रेरक संस्मरण ज़रूर आपके पास होंगे। आपके आशीर्वाद स्वरूप उन्हें रिकॉर्ड करके प्रसारित करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। लेकिन यह भी आपकी इच्छा पर निर्भर है। आप चाहें तो रिकॉर्ड कराएँ, या न कराएँ।’

‘हाँ, यह ठीक है। मगर मेरी एक शर्त है।’ मैं दुनिया को एक संदेश देना चाहता हूँ। उसे प्रसारित करना होगा।’
‘आपकी सारी शर्तें माथे पर, पंडित जी। जो आदेश देंगे पूरा होगा।’

मैंने उनकी बात का उत्तर देते हुए उन्हें आश्वस्त किया तो बोले, ‘ठीक है। कल सुबह सात बजे आ जाना।’
हम लोग अगले दिन ठीक समय पर उनके आवास पर पहुँच गए।

वे भी तैयार बैठे थे। पहुँचते ही अंदर बुला लिया। बैठते ही मैंने संदेश रिकॉर्ड कराने की याद दिलाई। वे कुछ नहीं बोले।
‘लो… पहले प्रसाद पाओ…… इसके बाद रिकॉर्डिंग करेंगे।’

प्रसाद खिलाने के बाद उन्होंने संदेश रिकॉर्ड करना शुरू किया, ‘यह भूकंप तो एक ट्रेलर है। इस तरह के भूकंप पूरी दुनिया में आने के संकेत मिल रहे हैं। ऐसी तबाही मचेगी कि पूरी दुनिया थर्रा जाएगी।’

उस संदेश में उन्होंने दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, समेत पूरी दुनिया का मानचित्र बता दिया, जहाँ बाढ़, भूकंप और भयानक बीमारियों से होने वाली तबाही का उल्लेख किया। उनकी सन् 1988 में की गई भविष्यवाणी आज सच में पूरी होती दिख रही है।

भारत, रूस, चीन, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीकी देश तथा पृथ्वी के और दूसरे हिस्सों में आई बाढ़, भूकंप जगह-जगह जंगलों में आग, सुलगते ज्वालामुखी और कोविड-19 जैसी महामारी के कारण दुनिया में जो आफत आ रही है उससे मानवता त्राहि-त्राहि कर रही है।

इसके बाद मैंने उनसे गांधी के साथ के अनुभव रिकॉर्ड करने का आग्रह किया। उन्होंने दो संस्मरण रिकॉर्ड कराए। एक में उन्होंने बताया कि एक बार दिल्ली जाने से पहले बापू से मिलने गए तो ‘बा’ ने महादेव देसाई के लिए पराठे बांध कर दिए। इतने में बापू भी आ गए।

उन्होंने पूछा, ‘श्याम नंदन दिल्ली जा रहा है, उसके रास्ते के लिए कुछ नहीं रखा?’ बा के मना करने पर बापू नाराज़ हो गए। बोले, ‘तुम कैसी माँ हो श्याम नंदन और महादेव में फर्क करती हो। पता नहीं तुममें कब बदलाव आएगा!’ और फिर बापू के आदेश पर बा ने पंडित जी के लिए भी पराठे बांध कर दिए।

दूसरा अनुभव हम सबको चौंकाने वाला था। उसमें उन्होंने बताया कि सन् 1929 में काउन्सिल हाउस में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम गिराया था, वह गांधी जी की जानकारी में गिराया गया था। सुभाष बाबू ने उसके लिए धन की व्यवस्था की थी।

पंडित जी ने बताया कि उस समय स्वयं बापू ने कहा था, ‘देखो, मुझे लोग अहिंसा का पुजारी मानते हैं। ऐसा कुछ मत करना की ज्यादा खून खराबा हो।’ और सन् 1929 में आखिर वह दिन आ गया जब काउन्सिल हाउस में बम गिरा दिया गया।

आज जिसे हम संसद भवन के नाम से जानते हैं, पहले उसे काउन्सिल हाउस ही कहा जाता था। पंडित जी के इस संस्मरण ने मुझे चौंका दिया कि बापू की जानकारी में, उनके ही आश्रम में, काउन्सिल हाउस में बम फेंकने की योजना बनाई गई!

और, पंडित श्याम नंदन मिश्र, जो तब बापू के आश्रम में ही थे, योजना के सूत्रधार बने! सुभाष बाबू ने योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए धन की व्यवस्था की! जिस समय बम फेंका गया उस समय तबके सुप्रसिद्ध पत्रकार दुर्गा दास भी दर्शक दीर्घा में मौजूद थे।

इस घटना के बारे में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक इंडिया फ्रॉम नेहरू टू कर्ज़न  में लिखा– ‘8 अप्रैल (1929) को जैसे ही अध्यक्ष बिट्ठल भाई पटेल सेफ्टी बिल पर अपनी रूलिंग देने खड़े हुए भगत सिंह ने असेम्बली के फर्श पर बम लुढ़का दिया। मैं पत्रकार दीर्घा से बाहर निकलकर प्रेस रूम की तरफ दौड़ा।

मैंने एक संदेश डिक्टेट कराया और एपीआई के न्यूज़ डेस्क से कहा कि वे इसे लंदन में रॉयटर और पूरे भारत में फ्लैश कर दें। भगत सिंह ने बम इस बात का ध्यान रखा कि वे उसे कुर्सी पर बैठे हुए सदस्यों से थोड़ी दूरी पर फर्श पर इस तरह लुढ़काएँ कि सदस्य उसकी चपेट में न आएँ।

आगे चलकर देश के जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक विदाउट फियर – द लाइफ एंड ट्रायल भगत सिंह में लिखा– ‘ये बम कम क्षमता वाले थे और इस तरह फेंके गए थे कि किसी की जान न जाए। बम फेंकने के तुरंत बाद दर्शक दीर्घा से इन्कलाब ज़िंदाबाद के नारों के साथ पेड़ के पत्तों की तरह पर्चे नीचे गिरने लगे।

वायसरॉय ने वक्तव्य जारी कर कहा कि दोनों आक्रमणकारियों ने किसी की हत्या नहीं की। उन्होंने माना कि अगर वे चाहते तो कहर बरपा सकते थे। ‘उनका निशाना तो बस सेंट्रल असेंबली था।’ ये तीनों वक्तव्य भी पंडित श्याम नंदन मिश्र के कथन की एक प्रकार से पुष्टि करते हैं जो गांधी के हवाले से उन्होंने बताया था।

पंडित श्याम नंदन मिश्र के इस चौंकाने वाले संस्मरण ने गांधी के अहिंसा के सिद्धांत को एक झटके में ध्वस्त होने के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। इस 45 मिनट की रिकॉर्डिंग ने मुझे तो एक सफल प्रसारक के स्तर पर ला दिया लेकिन जो संस्मरण रिकॉर्ड हुए उन्होंने गांधी को लेकर बहुत सारे प्रश्न मेरे मस्तिष्क में खड़े कर दिए थे। क्या वास्तव में ऐसा हुआ होगा? यदि हाँ, तो क्या यह मान लिया जाए कि सन् 1929 तक आते-आते गांधी अपने ही अहिंसा के सिद्धांतों से आज़ादी की लड़ाई लड़ने और जीतने के प्रति सशंकित हो गए थे?

सोमदत्त वरिष्ठ लेखक हैं व आकाशवाणी में उप-निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। संपर्क- ssomdutt70@gmail.com