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बैंजो और हिंदी फिल्म संगीत (सरगम के सितारे)

नौशाद साहब, नैय्यर साहब से लेकर पंचम दा, लक्ष्मी-प्यारे, बप्पी लहरी, अनु मालिक, आनंद मिलिंद, जतिन-ललित और प्रीतम की पीढ़ी वाला संगीत सुन लेने के बाद भी आज मेरा 1960-70 के संगीत में दिल अटकने का कारण शायद यह हो सकता है कि जब मेरा जन्म हुआ तो घर में 1960-70 का संगीत ही दिन-रात सुना जाता था।

शेरो-शायरी का ज्यादा शौक ना होने के कारण दिल शब्दों की जादूगरी की जगह मुखड़े और अंतरे के बीच में बजने वाले संगीत में उलझता चला गया। सच बताइए क्या आपके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ कि भारतीय फिल्म संगीत सुनते-सुनते आप किसी एक जगह पर ऐसे अटक जाते हैं कि पूरा गीत नहीं सिर्फ कुछ वाद्य यंत्र ही कानों में गूंजते रह जाते हैं।

आपने कभी गौर किया कि जब आप अंताक्षरी में “आवारा हूँ” गीत गाते थे तो उसे साथ ही वो संगीत का टुकड़ा भी गा देते थे? ऐसे जाने ही कितने जाने-अनजाने संगीत के टुकड़े हिंदी फिल्म संगीत निर्देशकों और संगीतकारों की अविश्वसनीय प्रतिभा से हमारे जीवन में घुल-मिल चुके हैं।

इस शृंखला में हम उन्हीं कुछ वाद्य यंत्रों की बात करने वाले हैं जिनसे हमारा फ़िल्मी संगीत सजा रहा है। पारंपरिक भारतीय वाद्य यंत्रों से लेकर वैदिक युग तक यूरोप के ऑर्केस्ट्रा के प्रमुख वाद्य यंत्रों से लेकर ब्राजील और अफ्रीका के अनसुने वाद्ययंत्रों तक, भारतीय फिल्म संगीत के जादूगरों ने सब कुछ ही अपने संगीत में झोंक डाला।

हिंदी फिल्म संगीत निर्देशकों के वाद्य यंत्रों की पसंद उनकी सरलता और रचनात्मकता का अप्रतिम प्रतिबिंब है। जब तार वाले संगीत वाद्य यंत्रों की बात आती है, बैंजो, सेलो, गिटार, मैंडोलिन, संतूर, सारंगी, सरोद, सितार, तानपुरा, वायलिन, बांसुरी और शहनाई सहित कई वाद्य यंत्र हिंदी फिल्म संगीत का हिस्सा रहे हैं।

शुरुआत हम करने वाले हैं बैंजो से जिसे आपने कुछ फिल्मों में सुना तो कुछ फिल्मों में देखा भी होगा। आधुनिक बैंजो उन उपकरणों से निकला है जिनके बारे में माना जाता है कि वे 17वीं शताब्दी के बाद से पश्चिम अफ्रीका से गुलाम लोगों द्वारा कैरिबियन में उपयोग में लाए गए थे।

उत्तरी अमेरिका में बैंजो के लिखित संदर्भ 18वीं शताब्दी में दिखाई देते हैं, और 19वीं शताब्दी के आसपास बैंजो व्यावसायिक रूप से हर जगह छाता चला गया। ऐसा भी माना जाता है कि चूँकि पुर्तगालियों द्वारा दक्षिण अमेरिका के कई गुलाम लोगों को वहाँ लाया गया था, इसलिए हो सकता है कि वे अपने साथ वाद्य यंत्र भी ले आए हों।

आपको अमर अकबर एंथोनी की “पर्दा है पर्दा” कव्वाली की शुरुआत याद है? आपको आज तक अगर यह लगता है कि बैंजो इसे कहते हैं तो आप गलत थे। बैंजो आप इस गीत में मीना कुमारी जी के हाथ में देख सकते हैं।

अब रही बात पर्दा है पर्दा के उस वाद्य यंत्र की बात तो उसको बुलबुल तरंग कहते हैं जिसे रशीद खान साहब ने फिल्म में बजाया था। यही कारनामा उन्होंने मोहरा फिल्म के तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त में दिखाया था। और माधुरी दीक्षित को द माधुरी दीक्षित बनाने वाला गीत कैसे भूल सकते हैं आप?

फिलहाल आप शम्मी कपूर का वो गीत सुनिए जिसमें बैंजो ना सुनाई देगा और न दिखाई देगा। अगले सप्ताह आप सभी के सामने चेलो को लेकर आएँगे।