राजनीति
बांग्लादेश के समाज और राजनीति में कैसे हिंदुओं के उत्पीड़न को सही ठहराया जाता है

बंगाली हिंदुओं का सबसे बड़ा वार्षिक त्यौहार है दुर्गा पूजा। यह उत्सव नवरात्रि के साथ-साथ चलता है और इसका अंत विजयदशमी यानी दशहरे से होता है। इस वर्ष बांग्लादेश में यह त्यौहार हिंसा की चपेट में आ गया जहाँ बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी और इससे संबंधित संगठनों ने दुर्गा पूजा पंडालों को निशाना बनाया।

उनका दावा था कि हनुमान भगवान् की गोद में रखकर क़ुरान का अपमान किया गया और कुछ अफवाहों में तो यह भी कहा गया कि क़ुरान को देवी दुर्गा के चरणों में रखा गया था। सोशल मीडिया पर अफवाहों के आधार पर कई पूजा स्थलों, हिंदू घरों और मंदिरों पर हमला हुआ।

क़ुरान का अपमान

क़ुरान के अपमान के जमाती आरोप इस पूर्वधारणा पर आधारित हैं कि मतों के बीच टकराव है। जमातियों को लगता है कि हर मत उन्हीं के मजहब की तरह है जिसका आधार है अन्य मतों पर विजय पाना और अपनी गुण-दोष की व्याख्याओं को उस देश के कानून में लागू करवाना।

मूर्तिभंजन, यानी “गलत” धार्मिक स्थलों का विध्वंस और “गलत” पूजन वस्तुओं का अपमान, को इस्लाम की विजय और काफिर (इस्लाम को न मानने वालों) की पराजय का प्रतीक माना जाता है। इस्लामी शब्दकोश में काफिर वह होता है जो “गलत” ईश्वरों, मूर्तियों को दिव्य समझता है, अनेक देवताओं में विश्वास रखता है, आदि।

मतांध हो चुके जमातियों को यह नहीं सूझा कि हिंदुओं के ऊपर कोई बाध्यता नहीं है कि अपने त्यौहारों में या वैसे भी वे इस्लाम या अन्य मतों का अपमान करें या उन्हें नीचा दिखाएँ। इस्लामी गाज़ियों के लिए मूर्ति तोड़ना, “गलत” पूजा स्थलों को गिराकर वहाँ मस्जिद बनवाना गौरव का विषय था (जैसे अयोध्या में बाबरी मस्जिद) क्योंकि इसे महान् मजहबी कृत्य माना जाता है।

वहीं, हिंदू के लिए ऐसी कोई मानसिक या धार्मिक आवश्यकता नहीं है कि वह हिंदू देवी-देवता के चरणों या गोद में क़ुरान को रखे। हिंदू धर्म में पवित्र अवसरों पर इस्लाम का अपमान करने के तरीकों पर नहीं सोचा जाता है। इसके अतिरिक्त, देवी दुर्गा या हनुमान भगवान् के चरणों या गोद में स्थान पाने को हिंदू एक आशीर्वाद समझते हैं।

यदि हिंदू क़ुरान का अपमान करना चाहते थे तो उसे महिषासुर के हाथ में रखते या रामलीला में दशानन के मुख में, न कि देवी दुर्गा के चरणों या हनुमान भगवान् की गोद में। काफिरों पर हमला करने के लिए एक बहाना खोजना जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक अबुल अला मौदुदी की पसंद का काम लगता है।

अपनी कृति ताफ़िम-उल-क़ुरान में उनका मानना है कि झूठ बोलना इस्लाम में पाप है लेकिन व्यावहारिक जीवन में झूठ बोलना पड़ता है, इसलिए न सिर्फ इसकी अनुमति है, बल्कि यह अनिवार्य है। बांग्लादेश पर दृष्टि रखने वाले जानते हैं कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए क़ुरान के अपमान का आरोप एक सामान्य पद्धति है जिसके बाद हमला किया जाता है।

2017 में ईशनिंदा के आरोप ज़ोरों पर थे जब क़ुरान की प्रतियों पर मल-मूत्र विसर्जित करने का आरोप लगा। उस समय उत्पीड़न की एक लहर चली और एक रात में सैकड़ों हिंदुओं के घरों को जला दिया गया था। बाद में पता चला कि जिस व्यक्ति ने क़ुरान पर मल-मूत्र विसर्जित किया था, वह एक मुस्लिम था।

2016 में एक हिंदू नाबालिग ने पहले से चक्कर काट रहे चित्र को साझा किया था। इस चित्र में काबा के ऊपर बैठे भगवान् शिव को देखा जा सकता था जिसके चलती कट्टरपंथियों ने फिर उत्पात मचाया। 2012 में बौद्धों पर क़ुरान की एक प्रति जलाने का आरोप लगा था जिसके बाद 2,000 बौद्ध घरों में तोड़-फोड़ की गई थी।

अल्पसंख्यकों एवं उनके धार्मिक स्थलों पर होने वाले हमलों में जमाती उकसावा महत्त्वपूर्ण है जिनका उद्देश्य होता है पवित्र वस्तुओं को नीचा दिखाना, मूर्तिभंजन, मूल्यवान सामानों की लूट और उस मत को मानने वाले लोगों से मार-पीट। क़ुरान या इस्लाम के अपमान के झूठे आरोपों की प्रेरणा हैं मौदुदी।

इस प्रकार की पूर्व घटनाओं को देखते हुए इस बात का बहुत कम महत्त्व रह जाता है कि क्या सच में क़ुरान को देवी के चरणों में रखा गया था या अपमान करने वाले चित्रों को साझा किया गया था। कुल मिलाकर परिणाम यह होता है कि अपने धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए झूठ को बढ़ावा दिया जाता है।

इस्लाम की पार्टियाँ

जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) का शाब्दिक अर्थ है इस्लाम की पार्टी। इस शब्दावली से हम समझ सकते हैं कि जमात-ए-इस्लामी एक राजनीतिक पार्टी है। विभाजन-पूर्व ब्रिटिश भारत में 1941 में इसकी स्थापना हुई था और मौदुदी द्वारा स्थापित इस पार्टी की वंशज पार्टियाँ भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हैं।

स्वतंत्रता के बाद भारत के तीन भागों में बट जाने के कारण इन पार्टियों ने व्यावहारिक स्वायत्तता तो अपना ली है लेकिन उनकी विचारधारा और विचारों की जड़ एक ही है। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों में ‘इस्लामिक शसंत्रता आंदोलन’ (आईएसए) अर्थात् ‘इस्लामी शासन के लिए आंदोलन’ की भी भूमिका है।

जेईआई चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित है लेकिन यह नहीं। 2018 के आम चुनावों में मतों की संख्या में आईएसए चौथी सबसे बड़ी पार्टी रही थी। सत्ताधारी और प्रमुख विपक्षी दलों से काफी दूर रहने के बावजूद भी महत्त्वपूर्ण है कि इसने समाजवादी, लोकतांत्रिक और कामगारों की जत्था पार्टी को पीछे छोड़ दिया।

सैद्धांतिक और संगठनात्मक रूप से जेईआई से आईएसए का घनिष्ठ संबंध है। मौदुदी इक़ामत-ए-दीन को एक संपूर्ण नियम, विनियम और आचार संहिता मानते थे क्योंकि इसमें जीवन के हर भाग को इस्लाम के प्रथम सिद्धांतों से जोड़ा गया है जैसे इस्लाम की जड़ों से फूटने वाले ये अंकुर हों।

जेईआई अपना उद्देश्य पैगंबर के दिव्य दर्शन का विश्व में प्रसार बताता है। पैगंबर को मिलने वाले ज्ञान और पैगंबर के जीवन के बीच जो महत्त्वपूर्ण संबंध है, वह है कानून। जमाती का मूल विश्वास है कि जिन कानूनों को स्वयं अल्लाह ने उजागर किया है, केवल वही वैध हैं।

कोई और कानून मानव-निर्मित है और इसलिए उसकी वैधता का दावा झूठा है। जेईआई के संसार में पंथ निरपेक्षता ‘ला दीन’ अर्थात् बिना धर्म के है, एक मुस्लिम के लिए मानव-निर्मित, अल्लाह-विहीन संविधानों को मानना आवश्यक नहीं है, वह केवल अल्लाह को मानता है, उसकी सेवा करता है और उसी की महानता स्वीकारता है।

इस्लामिक आंदोलन की शुरुआत जेईआई पर लगे वैधानिक प्रतिबंधों से बचकर काम करने और 1971 के नरसंहार में भूमिका के कारण खराब छवि से बचने के लिए हुई थी। बांग्लादेशी इस्लामी क्रांति आंदोलन को प्रेरित करने वाले नेता थे मति-उर-रहमान निज़ामी जिन्हें युद्ध अपराधों के लिए 2016 में फाँसी दे दी गई थी।

उन्होंने काडर को निर्देशित करने के लिए एक पुस्तक लिखी थी इस्लामी आंदोलन ओ संगठन। इसमें इक़ामत-ए-दीन की एक प्रदर्शनी है- “इक़ामत-ए-दीन का अर्थ है समाज में इस्लाम को एक विजयी विचारधारा की तरह स्थापित करना। यदि क़ुरान-सुन्नाह से अलग कानून कोई देश मानता है तो व्यक्तिगत आस्था के बावजूद भी लोग वहाँ दिव्यता को प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सत्ता में बैठे लोगों का अनुसरण करने के अलावा उसके पास कोई और विकल्प नहीं है। इसलिए यदि शासक गैर-इस्लामी होते हैं और इस्लामी मूल्यों का विरोध करते हैं तो लोग इस्लाम को पालन नहीं कर पाएँगे।” जिहाद फिसाबिलिल्लाह की भूमिका समझाते हुए वे लिखते हैं, “इस्लामी क्रांति और जिहाद के दौरान टकराव और सामना अपरिहार्य हैं।”

काफिरों का नाश इक़ामत-ए-दीन का अभिन्न भाग है। बांग्लादेश के संदर्भ में इसका अर्थ हुआ कि संवैधानिक व्यवस्था और निर्वाचित सरकार को हटाकर ऐसा शासन लाया जाए जो शरिया तथा इस्लामी शासन की सभी विशेषताएँ अपनाए।

जमातियों की दृष्टि में वर्तमान सरकार और जिस पार्टी से सरकार बनी है, दोहरे भ्रष्ट हैं क्योंकि एक तो वे पंथ निरपेक्षता, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र का समर्थन करते हैं तथा साथ ही बहु-ईश्वरावदियों और मूर्ति पूजने वालों को उनके धार्मिक समारोह आयोजित करने देते हैं।

सूरा अत-तवबा (9:111) कहता है, “अल्लाह स्वयं को मानने वालों का जीवन और उनकी वस्तुएँ लेता है लेकिन बदले में उन्हें जन्नत देता है। वे अल्लाह के लिए लड़ते हैं और मरते व मारते हैं।” इसका उद्धरण देते हुए निज़ामी कहते हैं कि इसमें इस्लाम की संपूर्ण विजय की स्थापना तथा फितना व फसाद को हटाने का निर्देश है।

फितना का अर्थ है दीन का अपमान या उसपर झूठ फैलाना। फसाद का अर्थ है सड़न, भ्रष्टाचार, अभाव, अनैतिकता। फितना करने वाले किसी मुस्लिम भूमि में बदमाश होते हैं। जो घटनाएँ हो रही हैं, उससे दिखता है कि कैसे इन भारी-भरकम शब्दों को बांग्लादेश में लागू किया जा रहा है।

पुस्तक में एक उप-अध्याय मरूज और मुनकर को समर्पित किया गया है। ये अरबी शब्द हैं जिनका अर्थ क्रमशः अच्छाई और बुराई है। इस्लाम के जानकार इन शब्दों को तुरंत समझ जाएँगे। अच्छाई को बढ़ाना और बुराई को कम करने का काम अफगान तालिबान से संबंधित है, विशेषकर 1996 से 2001 के बीच के इसके पहले कार्यकाल से।

इस शब्दावली का निज़ामी की पुस्तक में होना और बांग्लादेशी इस्लामी क्रांति आंदोलन से इसका संबंध होना कोई संयोग नहीं है। यह अलग रूप, अलग परिस्थितियों में एक ही विचारधारा है। बांग्लादेशी जमातियों और इस्लामिक आंदोलनवादियों का वही उद्देश्य है जो तालिबान का है- राज्य सत्ता पर नियंत्रण और इसका उपयोग करके इस्लाम लागू करना।

बांग्लादेश में राज्य और इस्लाम

भारत में अधिकांशतः बांग्लादेश को संस्कृति व भाषा की दृष्टि से देखा जाता है, संभवतः इसलिए क्योंकि भाषा और राजनीतिक स्वायत्तता के आधार पर ही यह पाकिस्तान से अलग हुआ था। संतुलन और धार्मिक-सांस्कृतिक बहुवाद के प्रति झुकाव के बावजूद इस्लामी पुनर्जागरण संगठित है और बांग्लादेश में सार्वजनिक समर्थन प्राप्त कर रहा है।

किसी भी दूसरे मुस्लिम देश की तरह वहाँ इस्लाम के व्यापक प्रभुत्व को कोई गंभीर चुनौती नहीं है। ऐसी परिस्थितियाँ इस्लामी कट्टरवाद, चाहे वह अपरिष्कृत जमाती और आंदोलनी श्रेणी का ही क्यों न हो, की वृद्धि में सहायक होती हैं।

शिष्टता और राजनीतिक शुद्धता की चाह यदि हम रखते हैं तो सबसे बड़े बंगाली हिंदू त्यौहार पर हमलों को कमतर समझते हुए हम इसे मात्र कुछ मुस्लिम कट्टरवादियों और असामाजिक तत्वों का काम समझ लेंगे लेकिन यदि हम इमानदार रहें तो कोई संदेह नहीं है कि मूर्ति पूजा और बहु-ईश्वरवाद के प्रति घृणा का रूप हैं ये हमले।

बांग्लादेशी राज्य का शासन एक पंथ निरपेक्ष मानसिकता वाली प्रधानमंत्री कर रही हैं जिन्होंने कह दिया है कि चाहे अपराधी किसी भी मत को मानते हों, न्याय किया जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री के ये दावे खोखले हो जाते हैं क्योंकि उनके बयान के अगले दिन ही इस्कॉन मंदिर पर हमला कर दिया गया था।

पाकिस्तानी सेना के साथ मिले हुए युद्ध अपराधी को फाँसी लगाना प्रधानमंत्री की एक उपलब्धि है लेकिन यही तत्परता हिंदुओं व अन्य अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए नहीं दिखाई जा रही है। आवामी लीग स्वयं को एक अच्छी शक्ति के रूप में दिखाती है और कट्टरवादियों की सत्ता की संभावनाओं को कम करती है।

हालाँकि, सलाह है कि इसपर पूरा विश्वास न किया जाए, विशेषकर तब जब ज़मीनी स्तर पर प्रताड़ित हो रहे हिंदुओं ने जमातियों के साथ आवामी लीग के मिले होने की शिकायतें कीं हैं। इस चिंताजनक दावे की ध्यानपूर्वक जाँच आवश्यक है लेकिन सेक्युलर बांग्लादेशी मीडिया ने इसपर अधिक ध्यान नहीं दिया है।

हालाँकि, वास्तविक विश्लेषण बताता है कि सरकार अव्यवस्था से बचने के लिए कड़ी कार्रवाई से बचेगी और सिर्फ कुछ लोगों पर मामला दर्ज करेगी व बताएगी कि ये सिर्फ कुछ कट्टरवादियों का काम था। यह संतुलन करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि पुलिस की गोलीबारी में चार जमाती मारे गए हैं जो सरकार के विरुद्ध उन्हें और भड़काने का काम करेगा।

न्याय मिलेगा या नहीं समय बताएगा लेकिन लगता है कि सरकार को न्याय में अधिक रुचि नहीं है। दीर्घ अवधि में बांग्लादेशी जमातियों और उनसे संबंधित लोगों का सामना करते हुए, उनके आतंक में समझौता करके सरकार चलाने की कोई स्थाई रणनीति नहीं दिखती है।

विकल्प है कि कानून की शक्ति से उनका दमन किया जाए लेकिन वैधता संकट से जूझ रही सरकार इतना कड़ा कदम नहीं उठाएगी। दूसरी ओर, सभी कमियों के बावजूद जमातियों को अल्लाह के बंदे माना जाता है और उनकी प्रेरणा है कि वे अपने अनुसार देश को ढालें।

बांग्लादेश में इस्लाम और सेक्युलरिज़्म के बीच लंबी लड़ाई में धार्मिक अल्पसंख्यक फँस गए हैं। हिंदू और भारतीय दृष्टिकोणों से देखें तो आवामी लीग से आस लगाने के कड़वे परिणाम होंगे। इस सेक्युलर पार्टी को समर्पित मुस्लिमों का समर्थन मिलता है और इस्लाम से किसी भी प्रकार का पंगा लेने से वह बचती है।

थोड़ा सोचिए- जनसांख्यिकी और कानून के बीच तनाव से बांग्लादेश की यह दुर्दशा हुई है। मौदुदी की एक कहावत है, “एक इस्लामी राज्य एक मुस्लिम राज्य हो सकता है लेकिन एक मुस्लिम राज्य तब तक इस्लामी राज्य नहीं है, जब तक राज्य का संविधान सुन्नाह और क़ुरान पर आधारित नहीं है।” इस वाक्य पर गहन विचार करना होगा। इस्लामी क्रांति को हम तब तक समझ नहीं पाएँगे तब तक इस बिंदु पर स्पष्टता नहीं आती।

इस लेख का अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक निष्ठा अनुश्री द्वारा किया गया है।