राजनीति
अयोध्या और कश्मीर- क्यों 5 अगस्त भारतीय सेक्युलरिज़्म के लिए एक विजय दिवस है

आज के दिन ही भारत ने अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण तय किया था। आज के दिन ही भारत ने जम्मू-कश्मीर से ‘विशेष राज्य’ का दर्जा वापस ले लिया था। भारत के सेक्युलरिज़्म के इतिहास में दोनों ही घटनाओं का विशेष महत्त्व है।

पश्चिम के लिए सेक्युलरिज़्म का अर्थ चर्च और शासन के बीच सत्ता का विभाजन है। पश्चिम मुख्य रूप से ईसाई रहा है जहाँ प्रतिद्वंद्वी पंथ आपस में शासन के समर्थन के लिए लड़ते थे। शासन का समर्थन पाने के लिए दूसरे पंथ का क्रूर दमन किया जाता था।

जब पुनर्जागरण काल आया तो मजहबी प्राधिकरणों को दरकिनार करके नए विचारों और विश्व-दृष्टिकोणों को उभरने दिया गया। वास्तव में पश्चिम को कभी भी विविध मतों का सामना करना ही नहीं पड़ा। और इसलिए पाश्चात्य सेक्युलरिज़्म में वह आयाम नहीं है जिसमें विविध मतों के प्रबंधन का विचार हो।

पश्चिम का सेक्युलरिज़्म मात्र चर्च से दूरी बनाने तक ही सीमित है। सेक्युलर बनने की ओर बढ़ते हुए गैर-ईसाई समुदायों का मतांतरण पश्चिम के लिए एक मध्यवर्ती पड़ाव बना। एक गैर-एकेश्वरवादी संस्कृति और एक गैर-ईसाई एकाधिकारवादी संस्कृति में से पाश्चात्य सेक्युलरिज़्म गैर-ईसाई एकाधिकारवादी संस्कृति की ओर जाना चाहेगा।

स्वामी विवेकानंद, श्री अरबिंद और महात्मा गांधी जैसे हिंदू विद्वानों ने माना कि पश्चिम के सेक्युलर लोकतंत्र से बेहतर है हिंदू संस्कृति जो लोकतांत्रिक होने के साथ-साथ एक समग्र और प्राकृतिक सेक्युलरिज़्म का विचार रखती है।

अधिकांश हिंदू भी संस्कृति की इस विशेषता को मानते हैं लेकिन पाश्चात्य सेक्युलरिज़्म और लोकतंत्र की कमियों से कई लोग अपरिचित हैं। कई बार हिंदू पश्चिमी सामाजिक-विज्ञान के शैक्षिक, राजनीतिक वर्ग और मीडिया का द्वेषभाव देखकर चौंक जाते हैं।

लेकिन अयोध्या और कश्मीर के मामले में भारत के नेहरूवादी संभ्रांत-वर्ग का विश्व-दृष्टिकोण अधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्रासंगिक है। नेहरू एक भ्रमित, मध्यम स्तर के बौद्धिक थे जो स्वयं को भारत का ‘बौद्धिक’ मानते थे। अंग्रेज़ी भाषा पर अपनी पकड़ और सत्ता की शक्ति के सहारे वे अपनी इस मान्यता को प्रदर्शित भी कर सके।

हालाँकि, उनके विचारों में द्वंद्व था। अपनी राजनीतिक यात्रा के लिए उन्हें गांधी की आवश्यकता पड़ी। लेकिन उनके मूल्य गांधी के मूल्यों से अलग थे। ब्रिटिश की हर बात की सराहना करने के बावजूद उन्होंने एक ‘अर्ध-नग्न हिंदू फकीर’ की सहायता से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध किया।

मध्यम बुद्धि और पश्चिम के प्रति आकर्षण वाले अन्य लोगों की तरह मार्क्सवाद के प्रति उनका झुकाव हुआ। मार्क्सवाद एकाधिकारवादी मतों का ही एक प्रकार है और भारत में इस्लामवाद के साथ इसकी बनने लगी। मार्क्सवाद ने इस्लामवाद को बौद्धिक हथियार दिए, जबकि इस्लामवाद ने मार्क्सवाद को बाहुबल दिया।

भारत में मार्क्सवाद के संस्थापकों में से एक- एमएन रॉय ने आक्रमणकारी इस्लामी ताकतों के अत्याचारों और जबरन मतांतरण को प्राकृतिक एतिहासिक विकास बताया। उनके लिए यह बहु-ईश्वरवाद से एकेश्वरवाद की ओर एक मोक्षदायिनी यात्रा थी।

इसके समानांतर कार्ल मार्क्स का कथन है जिसमें वे भारत में ब्रिटिश शासन को वैध ठहराते हैं। मार्क्स का मानना है कि ब्रिटेन ने भारत में चाहे जो अपराध किए हों, लेकिन वह भारत में ऐतिहासिक परिवर्तन का वाहक था जो उन्नत और उन्मुक्त सभ्यता लेकर आया।

इसी प्रकार पश्चिमीकृत भारतीयों और पश्चिमी मीडिया के लिए अयोध्या में एक मंदिर को तोड़कर उसके स्थान पर मस्जिद बनाना मानव के विकास में एक प्राकृतिक कदम था। इस्लामवादियों के लिए यह पूर्वनिर्धारित मजहबी राह थी जिसकी इच्छा उनका अल्लाह रखता है।

जम्मू-कश्मीर के मामले में पश्चिमी सेक्युलरवादियों के लिए विशेष राज्य का दर्जा भारत के सेक्युलर संविधान के लागू होने से भी बेहतर था। ध्यान दें कि ‘कश्मीरियत’, यदि आप तालिबान-आईएसआईएस पद्धति के इस्लामवाद को कश्मीरियत नहीं मानते हैं तो, भारतीयता और भारत में व्याप्त हिंदुत्व का एक अभिन्न भाग है।

कश्यप महर्षि से ललेश्वरी तक जो कश्मीरियत देखी गई है, वह भारत में रची-बसी है। इसलिए कश्मीर की सांस्कृतिक विशिष्टता के आधार पर विशेष दर्जा निरर्थक है। उस विशेष दर्जे में ऐसा क्या पुनीत है जो महिलाओं, अनुसूचित समुदायों और लिंग अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करता हो?

क्यों नेहरूवादी सेक्युलर इस विशेष दर्जे के हटाए जाने से आहत हैं जो वास्तव में एक अलग कश्मीरियत के खोखले आधार पर खड़ा था? ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय सेक्युलरिज़्म और कश्मीर के ‘निज़ाम-ए-मुस्तफा’ बनने के बीच यह विशेष दर्जा एक मध्यस्थ पड़ाव था।

पूरे भारत में इस्लामवादी प्रभाव के हर क्षेत्र में कल विशेष दर्जे की माँग उठेगी। नेहरूवादियों के साथ द्रविड़वादी, मार्क्सवादी और उनके सहयोगी इस माँग का समर्थन करने के लिए खड़े हो जाएँगे। हो सकता है कि कश्मीर का विशेष दर्जा पूरे भारत में ‘निज़ाम-ए-मुस्तफा’ के प्रसार की ओर पहला कदम रहा हो।

अयोध्या में मंदिर का पुनर्निर्माण हावी हो चुके संभ्रांत नैरेटिव को बदल देता है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का उन्मूलन और जम्मू-कश्मीर-लद्दाख में रहने वाले हिंदुओं, सिखों तथा बौद्धों की ओर ध्यान भी हिंदू-बहुल भारत के सेक्युलर संविधान को एकाधिकारवादी मत से मिल रही चुनौती को रोकता है।

अयोध्या में मंदिर का पुनर्निर्माण और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख से विशेष दर्जे को हटाया जाना, दोनों ही एक प्रचीन देश व एक आधुनिक लोकतंत्र- भारतवर्ष की सभ्यता में बसे सेक्युलरिज़्म को एक मुखर समर्थन हैं। बर्लिन की दीवार को गिराने से बड़े ये कदम हैं जो विश्व भर के प्राचीन लोगों, ऑस्ट्रेलियाई अबोरिजीन्ज़ से मूल अमेरिकी समुदायों तक, को उनकी आध्यात्मिक पहचान स्थापित करने का अवसर देंगे।

अरविंदन लेखक एवं स्वराज्य स्तंभों में नियमित योगदान करने वाले संपादक हैं। वे @arvindneela के माध्यम से ट्वीट करते हैं। इस लेख का अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री ने किया है।