रक्षा
ऑकस और क्वाड साथ मिलकर कर सकते हैं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन का सामना

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की अमेरिकी यात्रा चार देशों के क्वाड सगंठन को मज़बूती प्रदान करने के साथ ही साथ भारत-अमेरिका के आपसी संबधों को भी आगे बढ़ाएगी। इसका नवीनतम उदाहरण है भारत एवं यूएसए के बीच औद्योगिक सुरक्षा समझौता (आईएसए) शिखर सम्मेलन जिसे 27 सितंबर से 1 अक्टूबर के बीच नई दिल्ली में आयोजित किया गया था।

शिखर सम्मेलन दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच वर्गीकृत सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए प्रोटोकॉल विकसित करने के लिए आयोजित किया गया था। इसके दौरान दोनों पक्ष औद्योगिक सुरक्षा संयुक्त कार्य समूह की स्थापना के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत हुए।

वहीं, हम क्वाड पर लौट आएँ तो यह वस्तुतः चार प्रमुख देशों- भारत, आस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के मध्य विस्तार और साझेदारी को बढ़ाने वाला सहयोग सगंठन है जिसका उद्देश्य कहीं-न -हीं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती मनमानी पर लगाम लगाना भी है।

वास्तव में हिंद-प्रशांत क्षेत्र एक उदारवादी, प्रगतिशील लोकतांत्रिक देशों की सहभागिता और सक्रियता वाला एक ऐसा महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र है जहाँ से विश्व के विभिन्न व्यापारिक समुद्री मार्ग गुज़रते हैं। यहाँ निर्बाध आवागमन वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था की मज़बूती के लिए परम् आवश्यक है।

इस बीच एकाएक अस्तित्व में आए ऑकस नामक संगठन- आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका- ने अवश्य ही कुछ चौंकाने का काम किया है। वस्तुतः क्वाड और ऑकस भले ही भिन्न हों लेकिन उनका मूल उद्देश्य एक ही है और वह है संपूर्ण विश्व, विशेषतया हिंद-प्रशांत क्षेत्र की तानाशाह चीन की आक्रामक-सैनिक दबंगई से रक्षा करना।

आज संपूर्ण विश्व देख रहा है कि चीन किस प्रकार से अपनी आर्थिक और सैन्य शक्तियों का बड़ी तीव्र गति से निरंतर विकास कर रहा है। इनसे न केवल हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बल्कि समूचे विश्व में भय का वातावरण फैला हुआ है। इस बीच अमेरिका का लक्ष्य है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दबंगई और उनसे उत्पन्न खतरे के प्रत्युत्तर में ‘महाशक्ति’ होने के नाते समूचे विश्व में वह अपने प्रति विश्वास बनाए रखे।

यद्यपि अमेरिका ने जल्दबाज़ी में ऑकस के गठन की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, जिससे फ्रांस नाराज़ हो गया है परंतु वॉशिंगटन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक से अधिक शक्तिशाली सैन्य संगठन की आवश्यकता को भली-भाँति समझ चुका है, यह भी इस संगठन से स्पष्ट हो जाता है।

अंर्तराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर हर्ष वी पंत का मानना है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद वॉशिंगटन के बारे में यही धारणा बनती दिख रही थी कि वह अपने साझेदारों को भी कभी भी अधर में छोड़ सकता है। ऐसे में इस धारणा को तोड़ने और अपने साथियों में विश्वास कायम रखने के लिए ही अमेरिका ने ऑकस की संकल्पना को जल्दी से साकार किया।

यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री बॉरिस जॉनसन के साथ यूएस राष्ट्रपति जो बाइडन (सितंबर 2021)

उधर ब्रेक्ज़िट के बाद से ब्रिटेन भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नए सिरे से सक्रियता बढ़ाने की तैयारी में था। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया और चीन के संबध कोरोना काल से ही बहुत खराब चल रहे हैं जिसके लिए कैनबरा को वॉशिंगटन के एक ठोस समर्थन की आवश्यकता थी। इसीलिए अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया को परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्र न होने के बावजूद परमाणु पनडुब्बियाँ देने का निर्णय किया है।

इधर आस्ट्रेलिया ने भी चीन को स्पष्ट संदेश दिया है कि वह भले ही कई मामलों में बीजिंग पर निर्भर है लेकिन वह उसकी आक्रामकता को कदापि बर्दाश्त नहीं करेगा। कुल मिलाकर ये तीनों लोकतांत्रिक देश पुराने सहयोगी और साझेदार हैं। अतः ऑकस उदारवादी एवं प्रजातांत्रिक भावना से ओत-प्रोत मित्र राष्ट्रों की सहभागिता का एक नया मंच ही है।

भारत के नज़रिए से देखें तो चीन पर दबाव बनाने वाली ऐसी कोई भी पहल उसके लिए उपयोगी ही कही जाएगी। गत वर्ष से चीन ने भारत-चीन अंर्तराष्ट्रीय सीमा एलएसी, जो मैकमाहन रेखा के नाम से जानी जाती है, पर भारतीय सीमा के उत्तरी एवं उत्तर-पूर्वी सीमा-क्षेत्र में निरंतर सैन्य गतिविधियाँ जारी रखीं हैं जिससे कोविड महामारी के बीच गंभीर सुरक्षा संकट पैदा हो गया।

चीन का ऐसा गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार विश्व की अन्य प्रमुख शक्तियों यथा दक्षिण कोरिया, जापान, रूस आदि के साथ भी इसी प्रकार चल रहा है। चीन ने अभी कुछ महीनों पूर्व सारी हद पार करते हुए रूस के प्रमुख नगर व्लादीवोस्तक के उपर भी अपना क्षेत्राधिकार प्रस्तुत करते हुए मॉस्को को चुनौती दी थी।

इसी के साथ बीजिंग ने हॉन्ग कॉन्ग तथा ताइवान के आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था में भी आक्रामक तरीके से हस्तक्षेप करते हुए ज्यादतीपूर्ण आचरण किया। कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के विषाणु की उत्पत्ति के संबध में भी वुहान वायरोलाजी संस्थान की संदेहास्पद भूमिका से संपूर्ण मानवता भली-भाँति अवगत ही है।

कोरोना महामारी की दो लहरों ने संपूर्ण संसार में पिछले दो वर्षों में जो तांडव मचाया उससे मानवता शायद ही कभी उबर पाएगी। इनके अतिरिक्त चीन के द्वारा प्रयोग में लाई जा रही उत्पीड़नकारी आर्थिक नीतियां भी पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है तथा अमेरिका जैसे अनेक देशों को गंभीर नुकसान उठाना पड़ रहा है।

निश्चय ही ऑकस की आलोचना करने की बजाय आज असुरक्षित तथा आंदोलित हिंद-महासागर क्षेत्र में इस संगठन से होने वाले लाभों पर ध्यान देना चाहिए। जैसा साफ दिख रहा है कि आकस के गठित होने से चीन बेहद चिंतित है और उसे पहली बार महसूस हो रहा है कि ऑस्ट्रेलिया जैसी गैर-परमाणु शक्ति संपन्न क्षेत्रीय शक्ति भी उसके विरुद्ध बुलंद आवाज़ उठा सकती कै।

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के साथ यूएस राष्ट्रपति जो बाइडन (सितंबर 2021)

वस्तुतः क्वाड वैश्विक महत्त्व के अहम बिंदुओं पर समग्रता में अपनी भूमिका निभाने के प्रति प्रतिबद्ध दिखता है। बीते दिनों क्वाड राष्ट्रप्रमुखों की बैठक में बनी सहमति के बिंदुओं से भी यह स्पष्ट दिखता है जिसमें आधारभूत संरचनाओं का विकास, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न भयावह स्थिति से लेकर निवेश जैसे बिंदुओं पर चर्चा की गई।

क्वाड यूरोपीय संघ के साथ वह संयोजकता के मसले पर सहयोग बढ़ाना चाहता है, वह दक्षिण कोरिया जैसे देश के साथ सेमीकंडक्टर उत्पादन में आगे बढ़ने की संभावनाएँ तलाश रहा है तो आसियान देशों को साथ लाकर व्यापारिक मोर्चे को मजबूत बनाना चाहता है, प्रो हर्ष वी पंत बताते हैं।

समग्र रूप में क्वाड जहाँ सहयोग एवं साझेदारी के विभिन्न आयामों की तलाश हिंद-प्रशांत क्षेत्र के विकास तथा सुरक्षा के लिए कर रहा है तो वहीं ऑकस स्पष्ट रूप से यहाँ चीन की बढ़ती दादागीरी को रोकने का पुरजोर उपाय करेगा। अतः ऑकस और क्वाड के समांतर संचालन में किसी समस्या के उत्पन्न होने की संभावना लगभग नहीं के बराबर है।

जहाँ क्वाड एक बढ़ते विस्तार और सहयोग-साझेदारी वाला संगठन है, वहीं आकस विशुद्ध रूप से सामरिक साझेदारी का मंच। लेकिन दोनों के निर्माण के पीछे चीन की बढ़ती दबंगई से उत्पन्न खतरे ही एक प्रभावशाली सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित कर रहे हैं।

निष्कर्षतः दोनों ही संगठन मिलकर अमेरिका की अगुआई में एक सैन्य गठबंधन निर्माण की दिशा में आगे बढ़ते प्रतीत हो रहे हैं क्योंकि अमेरिका और सभी साझेदार देश चीन की दबंगई को अब और बरदाश्त करना नहीं चाहते। निश्चय ही अमेरिका को अब यह भली प्रकार से समझ आ गया है कि चीन को यदि तत्काल रोका नहीं गया तो विश्व में उसका अपना ही सर्वोच्च दर्जा अर्थात् वैश्विक आधिपत्य सुरक्षित नहीं रह सकेगा।

सुधांशु त्रिपाठी उत्तर प्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज में आचार्य हैं।