संस्कृति
अरुंधति कैसे एक तपस्विनी से बनीं ऋषिपत्नी
मनु - 3rd October 2021

तीव्र पदगति से वे तपस्वी बढ़े जा रहे थे मानस पर्वत की तलहटी में। वल्कलमय बलिष्ठ शरीर, जटाओं से छूटकर कंधों पर लहराती कुंतल राशि, तेजस्वी मुख, हाथ में कमंडल, आकर्षक किंतु ओजपूर्ण व्यक्तित्व कि देखने वाले का सिर स्वयं आदर से झुक जाए। आँखें ऐसी भावपूर्ण मानो प्राण स्वयं देह धरकर मूर्तिमान हुआ हो। होता भी क्यों ना! उनके बारे में श्रुति थी कि उनका आविर्भाव सृष्टा के प्राण के अंश से हुआ है-

उत्सङ्गान्नारदो जज्ञे दक्षोऽङ्गुष्ठात्स्वयंभुवः।
प्राणाद्वसिष्ठःसञ्जातो भृगुस्त्वचि करात्क्रतुः।।
पुलहो नाभितो जज्ञे पुलस्तयः कर्णयोर्ऋषिः।
अङ्गिरा मुखतोऽक्ष्णोऽत्रिर्मरीचिमनसोऽभवति।।

उनकी तपश्चर्या और ब्रम्हचर्य की कीर्ति अमरावती से लेकर पाताल तक को सुवासित कर रही थी। देवताओं से लेकर प्रतापी मानव राजाओं तक हर कोई उत्सुक था उन्हें आचार्य रूप में पाने के लिए। किंतु वे इस प्रपंच में ना पड़कर योग, ध्यान और शोध को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान बैठे थे। अपने मानस पिता का गृहस्थाश्रम स्वीकार कर सृष्टि-रचना में योगदान देने के आदेश को भी टाल आए थे।

पर यह क्या? आज उन शांत, संयत, वीतरागी मुनि के वदन पर ये चिंता, विषाद और असमंजस की रेखाएँ किसके कारण उभर आई थीं? किसने उनके सागर से शांत मन में लहरें उठाकर उसे उद्वेलित कर दिया था? कर्तव्य पालन और पथ प्रदर्शन पहले तो कभी इतना कठिन ना रहा था, फिर आज क्यों?

यथेष्ट गुफा में पहुँचकर वे बैठ गए। संसार के ऊहापोह से दूर यह गुफा ही उनका आश्रयस्थल थी जहाँ बैठकर वे निर्विघ्न चिंतन कर सकते थे और ध्यान लगाकर अदृष्ट से अपनी शंकाओं का समाधान पूछ सकते थे। ध्यान में बैठकर आज चिर परिचित नीरवता के स्थान पर एक मोहक मूर्ति उभरी।

देवांगनाओं को लजाता सौंदर्य, नीलाब्ज सिंधु-सी शांत आँखें, सांध्य आकाश जैसी केशराशि, कपोलों पर घिरी लालिमा मानो अरुण ने अपने हाथ से केसर का लेप कर दिया हो। उस गोधूलि वेला में चंद्रभागा पर्वत की तलहटी में, वृहल्लोहित सरोवर के शतदल कमलों को निहारती उस कन्या के लावण्य से वे कमल लजाते हुए से प्रतीत हो रहे थे।

पर ऐसी अनुपम सुंदरी का उस निर्जन स्थान पर क्या प्रयोजन? किसकी प्रतीक्षा में वह मुख रविकिरणों से म्लान हुई कुमुदिनी-सा ढल गया था? पूछने पर मानो उसकी तंद्रा टूटी हो। चौंककर उठी, ऋषि को देखकर प्रणाम किया, फिर न जाने क्यों नेत्र झुके और कपोलों में एक चुटकी सिंदूर और घुल गया। ‘संध्या’ ही नाम था उसका, सृष्टी की अनुपम कृति।

ब्रह्मलोक देवलोक में स्वच्छंद विचरण हुए जब कंदर्प-रति के प्रभाव से उच्छशृंखल अनुगामियों की धृष्टताएँ बढ़ने लगीं, विवेक-बुद्धि का ह्रास होने लगा और मर्यादाओं तथा वर्जनाओं को छोड़कर लोलुप दृष्टियाँ जब हर किसी पर निपातित होने लगीं, तो उस वातावरण से मानो घृणा-सी हो आई थी उसे।

चली आई थी वहाँ से इस संकल्प के साथ कि जैसे भी हो इस मदनमर्दित जगत में वह मर्यादा की स्थापना करके रहेगी और कामांध दृष्टियों से अपवित्र शरीर संयम की अग्नि में दग्ध होगा। उस तन्वंगी का ऐसा दृढ़ संकल्प देखकर वे स्तंभित रह गए थे, फिर कर्त्तव्य का ध्यान कर बीजमंत्र व कठिन तपोविधि की दीक्षा देकर चले आए थे।

पर आज मन कदाचित वहीं अटक-सा गया था, कर्त्तव्य निर्वहन के पश्चात भी हृदय को शांति नहीं! सर्वदा विरागी चित्त में उस देवी के प्रति आकर्षण! वह भी वो, जो मन्मथमर्दन का संकल्प लेकर बैठी हो। कैसी विडम्बना! प्रायश्चित हेतु वे स्वयं भी उसी कठोर तप में लीन हो गए जिसकी दीक्षा देकर आए थे। आचार्य और शिष्या दोनों एक ही साधना में! देखें, नियति ने इनके लिए कैसा पटाक्षेप लिखा है?…..

(ऐसा प्रतीत होता है मानो) चार युग बीत चुके हैं। ब्रह्मा जी की सृष्टि उनकी संतानों के माध्यम से त्रिलोकी में फैल चुकी है। दक्षकन्याओं की उपेक्षा के कारण शापित चंद्रमा के उद्धार के लिए कर्त्ता ने उनके शाप को नदी के रूप में परिवर्तित कर प्रवाहित कर दिया है, जो अब चंद्रभागा नदी कहलाती है।।

~ उठो संध्या! अभीष्ट वर माँगो!

जिनका स्मरण वे चिरकाल से करती आईं थीं, वे परब्रह्म आज जब उनके सामने आए तो वे कुछ बोल ही नहीं पाईं। सदा लालिमा से स्पंदित रहने वाला शरीर अब पत्र-सा पीतवर्णी हो चुका है, आँखें गंभीरता का भाव लिए और गहरी हो गईं हैं तथा शरीर से निकलने वाली केसर सरीखी गंध उस पावन स्थल को सुवासित कर रही है।

~ हे प्रभु! इस कामासक्त विश्व में कुछ बंधन, कुछ विराम, कुछ मर्यादाएँ चाहिए, अन्यथा यह देवसृष्टि शीघ्र ही पतन के मार्ग पर जाएगी। यदि संपूर्ण ऊर्जा विलास में ही व्यर्थ हुई तो सृजन संकट की ओर अग्रसर होगा।

~ शुभे! कल्याणमयी शांतिदायिनी संध्या! तुमसे विश्वकल्याण की ही आशा थी मुझे। मैं तुम्हें तीन वर प्रदान करता हूँ-
पहला, कि कोई भी प्राणी जन्म से कामयुक्त नहीं होगा। जीवन की चार अवस्थाएँ होती हैं- बाल्य, कौमार, यौवन और वृद्धावस्था। तीसरी अवस्था या दूसरी अवस्था के अंत में ही लोगों में कामभावना का उदय होगा।
दूसरा, तुम्हारा पातिव्रत्य अखंड रहेगा। तुम्हारे पति भाग्यवान, तपस्वी, सुंदर और सात कल्प तक तुम्हारे साथ जीवित रहेंगे। उनके साथ तुम्हारा स्थान सदैव दृढ़ होगा।
तीसरा, पति के अतिरिक्त जो भी व्यक्ति तुम्हें सकाम दृष्टि से देखेगा वह तेजहीन हो नपुंसकता को प्राप्त होगा।

असीम संतोष उतर आया था उन नयनों में, संकल्पपूर्ति का, सांसारिक मर्यादा की रक्षा का। परंतु वचन!शरीर दग्ध करने का वचन! उसका क्या हो?

अंतर्यामी मुस्कुराए, ~ इतने समय से तुम वही तो कर रही थी, दहन! कलुषित विचारों का, अमर्यादा का और साथ ही साथ इस शरीर का भी तो! फिर भी, अब तक चंद्रभागा में असीम जलराशि प्रवाहित हो चुकी है तथा मर्यादा संस्थापना के लिए तुम्हें पिता, परिवार और शिक्षा की आवश्यकता होगी। इनकी स्थापना संध्या नहीं, संध्या का नवीन रूप ही कर सकता है।
जाओ पुत्री! ऋषि मेधातिथि के लोककल्याणकारी द्वादशवर्षीय ‘ज्योतिष्टोम’ यज्ञ की पवित्र अग्नि में शुद्ध हो नवीन रूप धारण करो!

~ जो आज्ञा!

उस कृशकाय शरीर से परमात्मा के करकमलों का स्पर्श होते ही वह पुरोडाशमय हो गया और उस पवित्र आत्मा के तेज से पुरोडाश की गंध संपूर्ण भू-भाग को महका गई। सूर्य ने उस दिव्य शरीर के दो भाग कर अपने रथ पर प्रतिष्ठित किया; प्राची के क्षितिज में अरुणोदय की लालिमा में झलकती प्रातःसंध्या देवताओं के लिए सुखदायी हैं और अस्ताचलगामी सूर्य की अनुकारिणी सायंसंध्या पितरों को तृप्त करती हैं।

यज्ञप्रसाद के रूप में सुवर्णसदृश शरीर वाली तनया को पाकर महर्षि मेधातिथि ने अपनी संपूर्ण तपस्या सफल मानी और अर्घ्यजल से स्नान कराकर उसे अंक में भर लिया। अनायास ही मुख से नाम फूटा- अरुंधति! अरुंधति, जो कभी भी धर्म को न रोके।

कन्या के नूपुर आश्रम को गुंजायमान रखने लगे, पाँच वर्ष यूँ ही बीत गए। पितामह ब्रह्मा ने ऋषि को कन्या की उचित शिक्षा-दीक्षा के लिए योग्य आचार्याओं देवी सावित्री एवं देवी बहुला के पास जाने की प्रेरणा दी। मानस पर्वत पर देवी सावित्री व देवी बहुला के साथ-साथ देवी गायत्री, सरस्वती और द्रुपदा का संरक्षण भी प्राप्त हुआ। सूर्यलोक से इंद्रलोक, उसकी चर्चा हर कहीं थी। जैसा सौंदर्य, वैसा ज्ञान, शील, गुण, संयम।

और एक दिन, जाने कैसे वह पहुँच गई वहाँ, जहाँ वे तपस्वी युगों से साधना में बैठे थे। एकटक देखती रह गई उन्हें, मानो पूर्वजन्म की कोई स्मृति-सी हो आई हो। इन्हीं का स्मरण करके तो यज्ञाग्नि में चरण रखा था उसने!

साधना में विघ्न न पड़े यह सोच चुपचाप लौट आई वहाँ से, पर हृदय मानो वहीं छूट गया था। यज्ञ, वार्ता, पाठ, मनन; कहीं भी तो मन नहीं लगता था बाला का। अंततः देवी बहुला ने पूछ ही लिया~ कहाँ ध्यान है अरु तेरा आजकल?

~ वो तपस्यारत योगी….. इतना बोलते-बोलते संयत हुई और अरुणिम रेखा खिंच आई चेहरे पर।

हँसीं बहुला, संपूर्ण वृतांत समझ में आ गया। वे दोनों के इतिहास को जानती थीं। अब अरु को उसके वर्षों से साधनारत वर से मिलाने का समय आ चुका था और परमात्मा के आशीर्वचनों के फलीभूत होने का भी।

पितामह का स्मरण किया गया। उन्होंने कन्या के पिता को बुलाने हेतु देवर्षि को भेजा। आज त्रिदेव स्वयं भावी वर को कन्या के विवाह का प्रस्ताव लेकर जा रहे हैं…..

~ उठो वसिष्ठ!

योगी की साधना रुकी, नेत्र खुले।~ वसिष्ठ!

~ अरे! आज बिना माँगे ऐसे अमूल्य दर्शन कैसे मिल रहे हैं?

~ तुम न भी माँगो तो तुम्हारा अभीष्ट हमें ज्ञात है। उठो, तुम्हारी चिरसंगिनी तुम्हारे साथ अपने अटल स्थान की प्रतीक्षा में है। तुम दोनों की ही साधना सफल हुई!

मानस पर्वत पर मानो संपूर्ण सृष्टि ही उमड़ आई थी उस अद्भुत विवाह का साक्षी बनने। वसिष्ठ के बंधु, अरुंधति की माँ समान शिक्षिकाएँ, परिजन, देव, मनुज, गंधर्व, सभी उपस्थित थे। पितामह स्वयं पुरोहित बने, महर्षि मेधातिथि ऐसे गुणी जामाता को अपनी सर्वगुणसंपन्ना कन्या सौंप कृतकृत्य हुए।

उपहारों की वर्षा हो उठी नवदंपति पर। माता अदिति ने अद्वितीय कुंडल दिए, देवराज ने रत्न, विधाता ने निर्बाध भ्रमण हेतु अद्भुत विमान। भगवान् रुद्र ने दंपति को सात कल्प तक आयु का वरदान दिया तो भगवान विष्णु ने पति के समान सप्तर्षिमंडल में अचल स्थान।

धर्म की मर्यादा देवी अरुंधति द्वारा पुनः स्थापित हुई। उनके विवाह में ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि द्वारा स्नान कराते समय जो जलधाराएँ गिरीं, वे ही गोमती, सरयू, महानदी, शिप्रा आदि पवित्र सप्तनदियों के नाम से विख्यात हुईं; जिनके दर्शन, स्पर्श, स्नान एवं पान से सारे संसार का कल्याण होता है।

दंपति ने अपने गुणों और कल्याणकारी वृतांतों से विश्व को सुरक्षित किया। सप्तर्षियों के प्रतीक रूप माने जाने वाले तारामंडल में अरुंधति एकमात्र ऋषिपत्नी हैं जिनका स्थान नियत है और उनको साथ लेकर ही सप्तऋषियों की पूजा होती है।

“अरुंधतिसहित सप्तऋषिभ्यो नमः।”
इस मंत्र के साथ सप्तऋषियों का पूजन किया जाता है।

“कश्यपोऽत्रिभरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च अरुन्धत्या सहाष्टकाः ।।
मूर्ति ब्रह्मण्यदेवर्षेर्ब्रह्मण्यं तेज उत्तमम्।
सूर्यकोटिप्रतीकाशमृषिवृन्दं विचिन्तयेत्।।”
(वर्षकृत्यदीपक)

सीता को अखंड सौभाग्य का वरदान देने वाली और पुत्रहंता विश्वामित्र को क्षमादान दिला ब्रह्मर्षि बनाने वाली देवी अरुंधति युगों-युगों तक संध्यासमान कल्याणकारी बनें। ॐ।

स्रोत- कल्याण विशेषांक- संक्षिप्त शिवपुराण, संक्षिप्त देवीपुराण, अवतार कथाङ्क

मनु विज्ञान में परा-स्नातक हैं। वे भारतीय इतिहास और धर्म पर अध्ययन एवं लेखन करती हैं।