विचार
ऐप्पल कैसे अपने बिग टेक प्रतिस्पर्धियों से टक्कर लेकर निजता को सुनिश्चित कर रहा है

प्रायः ऐप्पल इंक के ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर आईओएस का उपहास किया जाता है कि वह गूगल के एंड्रॉइड ओएस से पीछे है। वही डिज़ाइन और फीचर देने में वह कई बार वर्षों से पीछे हो जाता है।

लेकिन कई लोग यह नहीं मानते हैं कि लगभग हमेशा ऐप्पल उन्हीं चीज़ों को एंड्रॉइड से बेहतर कर पाता है क्योंकि न सिर्फ ऐप्पल उपकरणों में सॉफ्टवेयर व हार्डवेयर में बेहतर एकीकरण होता है, बल्कि आईओएस पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न उत्पाद भी एकीकृत होते हैं।

इसलिए हो सकता है कि किसीने सबसे पहले तार-रहित ईयरफोन बना दिए हों लेकिन ऐप्पल के एयरपोड से बेहतर (विशेषकर ऐप्पल उपकरणों के साथ जैसे वे निर्बाध काम करते हैं) कोई उत्पाद नहीं है।

ऐसा ही फाइल साझाकरण के साथ है। एयरड्रॉप से बेहतर कुछ नहीं। गूगल लेन्स का विचार था लाइव टेक्स्ट कैप्चर (लाइव छायाचित्रों में से टेक्स्ट कैप्चर करना) लेकिन ऐप्पल ने इसे और बेहतर कर दिया है।

आईओएस15 की नई विशेषता शेयर प्ले के साथ भी ऐसा ही है जो कुछ समय से किसी-न-किसी रूप में गूगल मीट, ज़ूम, माइक्रोसॉफ्ट टीम, आदि में है लेकिन कहीं भी यह उतने सुचारू रूप से काम नहीं करता है, जैसा ऐप्पल पारिस्थितिकी तंत्र में करता है।

ज़रा सोचें कि समन्वय कितना अच्छा है जब आप मैक के माउस से बगल में रखे आईपैड की फाइलों पर क्लिक करके उन्हें मैक पर ला सकते हैं! ऐसी ही अन्य विशेषताएँ हैं। ऐप्पल को सबसे पहले होने की नहीं, बल्कि सर्वश्रेष्ठ होने की चिंता है।

गूगल का दल बहुत नवोन्मेषी है क्योंकि दलों को अलग-अलग रखा जाता है और उनके ऊपर एक-दूसरे से हमेशा बात करने की बाध्यता नहीं होती है और वे कई बार अद्भुत और अतुलनीय नई विशेषताओं का आविष्कार कर देते हैं जो दूसरे से एकीकृत नहीं हो पाती, यूट्यूब के प्रसिद्ध टेक समीक्षक मार्कस ब्राउनली कहते हैं।

“भले ही ऐप्पल और गूगल के दलों के पास एक ही समय पर एक ही विचार हो, ऐप्पल के ऊपर बाध्यता है कि वह शेष पारिस्थितिकी तंत्र के साथ काम करे और जितनी वस्तुओं में संभव हो पाए, उस विशेषता को जोड़े।”, वे आगे कहते हैं।

इसमें आश्चर्य नहीं है कि फिर उत्पाद को बनने में समय लगता है परंतु परिणाम सदैव प्रतिस्पर्धी से बेहतर होता है। आईओएस और एंड्रॉइड में सरल तुलना करते समय ऐसी सूक्ष्मताओं को प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है।

एंड्रॉइड भले ही आगे बढ़ जाता है परंतु आईओएस को ऐसी वस्तु देने में महारत प्राप्त है जो उपभोक्ताओं के लिए मायने रखती हैं (साथ ही आज नहीं तो कल ऐप्पल एंड्रॉइड को सामयिक उत्पाद में भी पीछे छोड़ देगा)।

हाल के वर्षों में आईओएस स्वयं को जिस बात पर एंड्रॉइड से अलग दिखा रहा है, वह है निजता। तब से एंड्रॉइड परिश्रम कर रहा है। समस्या यह है कि ऐप्पल किसी का नुकसान नहीं करता है लेकिन फेसबुक, गूगल आदि जैसे इसके प्रतिस्पर्धी निजता पर निर्भर हैं।

ऐसा इसलिए क्योंकि ये कंपनियाँ प्रचार सामग्री दिखाने के लिए ग्राहक डाटा का उपयोग करती हैं। हालाँकि, गूगल निजता के प्रश्न को अनदेखा नहीं कर सकता है और उसे यह दर्शाना होगा कि एंड्रॉइड ओएस के माध्यम से वह निजता की रक्षा कर रहा है।

परंतु ऐसा करने से उसे और नकुसान होगा क्योंकि वैश्विक रूप से एंड्रॉइड के स्मार्टफोन का बड़ा बाज़ार है और सिर्फ धनवान लोग ही एंड्रॉइड नहीं रखते हैं, जैसा कि ऐप्पल के साथ है।

न सिर्फ ऐप्पल के कृत्यों के कारण गूगल का नुकसान होगा (क्योंकि वह आईओएस उपभोक्ताओं के डाटा से भी प्रचार राजस्व कमाता है), बल्कि इसे अधिक नुकसान तब होगा जब उसे स्वयं भी ऐसा करना पड़े, अन्यथा उसे निजता जैसे मुद्दे पर निर्दयी माना जाएगा।

2020 से पहले निजता की रक्षा के ऐप्पल के प्रयायों की प्रतिस्पर्धा में गूगल ने एंड्रॉइड 10 जारी करते हुए कुछ बड़े प्रयासों की घोषणा की थी और अनिवार्य किया था कि उपभोक्ता उनके डाटा के स्वामी होंगे और सरलता से उसे मिटा सकेंगे।

लेकिन इसमें दो त्रुटियाँ हैं- हटने से पहले गूगल के सर्वर में कम-से-कम तीन माहों के लिए वह डाटा रहता है और इतना समय पर्याप्त है कि गूगल उसमें से प्रचार-मूल्य की सामग्री निकाल सके, यहाँ तक कि एक माह का समय भी पर्याप्त होता है।

साथ ही, एंड्रॉइड 10 सिर्फ कुछ फोनों में उपलब्ध होगा, सभी में नहीं। इससे समझ सकते हैं कि निजता प्रयासों के नाम पर यह गूगल की औपचारिकता मात्र है, यह सिर्फ उस श्रेणी के उपभोक्ताओं को लक्ष्य कर रहा था जो एंड्रॉइड छोड़कर आईओएस अपना सकते हैं।

जिनके पास कम पैसे हैं, उन्हें धनवानों के समान निजता प्रयासों के योग्य नहीं माना गया।

लेकिन गूगल और अन्य बिग टेक कंपनियाँ जो अपने राजस्व के लिए प्रचार के लिए डाटा पर निर्भर रहती हैं, उन्हें एक और झटका लगा। 2020 में आईओएस14 व कुछ और अपडेट्स के विमोचन के साथ ऐप्पल ने अपने प्रतिस्पर्धियों की कठिनाइयाँ बढ़ा दीं।

अपने स्टोर पर उपलब्ध सभी ऐप्स के लिए ऐप्पल ने अनिवार्य किया कि वे घोषणा करें कि उपभोक्ताओं से किस तरह का डाटा वे एकत्रित कर रहे हैं- ग्राहक संबंधित डाटा जैसे उनकी संपर्क जानकारी और उनसे गैर-संबंधित डाटा जैसे सर्च हिस्टरी, आदि।

एक बार यह सब संकलित होने के बाद बिग टेक कंपनियों का पर्दाफाश हो गया क्योंकि अब उपभोक्ता देख सकते थे कि कौन उनकी किस प्रकार की जानकारी एकत्रित कर रहा है। यह आँख खोलने वाला था, विशेषकर वह तुलना कि ऐप्पल दूसरे खिलाड़ियों की तुलना में कितनी कम जानकारियाँ इकट्ठा कर रहा था।

लेकिन ऐप्पल सिर्फ अपने प्रतिस्पर्धियों की पोल खोलने तक नहीं रुका। आईओएस 14.5 में ऐप ट्रैकिंग ट्रान्सपेरेन्सी (एटीटी) के रूप में उसने उपभोक्ताओं को एक शस्त्र दिया कि वे इन ऐप्स को उन्हें ट्रैक करने से रोक सकें।

आईओएस स्टोर की हर ऐप को उपभोक्ताओं से एक स्वतंत्र स्वीकृति लेनी होती है। जब भी आप पहली बार किसी ऐप को खोलते हैं तो एक पॉप-अप आता है और उपभोक्ताओं के पास विकल्प होता है कि वे ऐप को उन्हें ट्रैक करने से रोक सकें व लोकेशन, आदि जैसी जानकारियों की अनुमति ऐप को न दें।

ऐप्पल का पॉप-अप

ऐप्पल को धन्यवाद कि अब एंड्रॉइड भी विवश हो गया है कि वह कुछ महत्त्वपूर्ण निजता विशेषताएँ दे जैसे फोन की स्क्रीन पर एक संकेत आएगा जब कोई ऐप आपके कैमरा या माइक्रोफोन का उपयोग कर रही है।

सटीक लोकेशन की बजाय अनुमानित लोकेशन की अनुमति ऐप को देने का विकल्प भी एंड्रॉइड उपभोक्ताओं को दे रहा है। पहले ऐप वे डाटा भी एकत्रित कर लेती थीं, जिनकी उन्हें आवश्यकता नहीं होती थी (जैसे ओला, उबर, स्विगी, ज़ोमैटो औपकी सटीक लोकेशन जानना चाहें तो तुक बनता है लेकिन कोई गेमिंग ऐप क्यों?)।

लेकिन फिर भी एंड्रॉइड में एटीटी की तरह की विशेषता देने से गूगल बच रहा है क्योंकि इसका प्रचार डाटा आधारित व्यापार मॉडल बुरी तरह प्रभावित होगा। उपभोक्ताओं को निजता देने में ऐप्पल से पीछे रहना गूगल के हित में है।

इसी बीच विश्व आगे बढ़ चुका है- द सोशल डिलेमा (इस नाम की नेटफ्लिक्स डॉक्यूमेन्ट्री में बताई गई समस्याओं) की समस्याओं का समाधान कर रहा है। नवीनतम सॉफ्टवेयर आईओएस15 में ऐप्पल ‘फोकस मोड’ लेकर आया है।

ऐप्पल का ‘फोकस मोड’

इसमें अपनी दिनचर्या के अनुसार उपभोक्ता नोटिफिकेशन सेटिंग कर सकते हैं। ‘वर्क मोड’ में उन्हें सिर्फ कार्य-संबंधित नोटिफिकेशन मिलेंगे जैसे कि कार्यालय के लोगों या कार्य में उपयोग होने वाली ऐपों के नोटिफिकेशन ही आएँगे।

‘स्लीप मोड’ में सभी नोटिफिकेशन को बाधित किया जा सकता है, ‘पर्सनल मोड’ में कार्य संबंधित नोटिफिकेशन बाधित होंगी, आदि। मुख्य रूप से इसका उद्देश्य है कि उपभोक्ताओं को उनका ध्यान भटकाने वाली नोटिफिकेशन्स से दूर रखा जाए जिसने उनकी उत्पादकता पर बुरा प्रभाव डाला है।

निस्संदेह ही अंततः सब इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है लेकिन उपभोक्ताओं का स्क्रीन टाइम कम करने का यह एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

द सोशल डिलेमा में रेखांकित किया गया एक और महत्त्वपूर्ण मुद्दा है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ कैसे निरंतर देखती हैं कि उपभोक्ता किस प्रकार की सामग्री देख रहे हैं और उन्हें जोड़े रखने के लिए वैसी ही सामग्रियाँ परोसती हैं और उस समय उन्हें अधिक से अधिक प्रचार सामग्री भी दिखाती हैं।

संभवतः आने वाले वर्षों में इन कंपनियों द्वारा तकनीक के इस खतरनाक उपयोग से निपटने का काम भी ऐप्पल कर सकता है। यह रोचक है कि ऐसी बिग टेक कंपनियों से निपटने में सबसे उपयुक्त ऐप्पल है जिनका अस्तित्व अधिक से अधिक लोगों को जोड़े रखने और स्क्रीन से चिपकाए रखने पर निर्भर करता है।

वहीं, ऐप्पल का व्यापार मॉडल अपने उत्पाद बेचने पर निर्भर है न कि उत्पादों के अधिक उपयोग पर (हालाँकि, कुछ हद तक अधिक उपयोग से अधिक बिक्री होती है- जैसे यदि मैं चाहता हूँ कि बिना अटके कोई फोन भारी गेम मुझे खेलने दे तो मैं आईफोन लूँगा)।

लेकिन यदि हम सिर्फ प्रतिस्पर्धा की बात करें तो ऐप्पल के कार्यों में सामर्थ्य है कि वह स्वयं खरोंच भर का नुकसान झेलकर अपने बिग टेक प्रतिस्पर्धियों को भारी नकुसान पहुँचा सके। लगता है कि नए युग के तकनीक की चुनौतियों से निपटने का समाधान सबसे बड़ी तकनीकी कंपनी निकाल रही है और यह देखना सुखद है।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @haryannvi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।