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महिलाओं की विवाह उम्र 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष करने हेतु संशोधन सभी धर्मों पर होगा लागू

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार (15 दिसंबर) को पुरुषों और महिलाओं की विवाह योग्य आयु में एकरूपता लाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी।

प्रस्ताव को क्रियान्वित करने हेतु केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक 2021 को संसद में प्रस्तुत करने की स्वीकृति दी, जो वर्तमान बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 (पीसीएमए) में संशोधन करेगा और पुरुषों एवं महिलाओं दोनों के लिए 21 वर्ष के बराबर विवाह की आयु का मार्ग खोलेगा।

सरकार के वरिष्ठ पदाधिकारियों के अनुसार, यह संशोधन भारत के संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (विशेषकर समानता का अधिकार और शोषण के विरुद्ध अधिकार) के अनुसार है, जो लैंगिक समानता का दायित्व लेता है।

सरकार की दृष्टि में प्रस्तावित संशोधन से महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और जीवन को बेहतर बनाने के और अधिक अवसर खुलेंगे।

सरकार के आकलन में विभिन्न कल्याणकारी पहलों के साथ विधायी हस्तक्षेप मातृ मृत्यु दर (एमएमआर), शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) को कम करने और पोषण स्तर में सुधार के साथ जन्म के समय लिंग अनुपात (एसआरबी) में वृद्धि को लेकर काम करेगा।

सरकार को यह भी अपेक्षा है कि इससे महिलाओं को विवाह से पूर्व मनोवैज्ञानिक परिपक्वता प्राप्त करने, बेहतर प्रजनन अधिकारों का प्रयोग करने और जीवन कौशल विकसित करने के अवसर प्रदान करने हेतु पर्याप्त समय मिलेगा।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक 2021 के परिणामस्वरूप विवाह की आयु से संबंधित कानूनों में परिणामी संशोधन होने की संभावना है, जैसे कि भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम 1872, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम 1936, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937, विशेष विवाह अधिनियम, 1954, हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और विदेशी विवाह अधिनियम 1969।

इसके अतिरिक्त, कानून जैसे कि हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम 1956 और हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम 1956 इस संदर्भ से संबंधित हैं।