विचार
भारतीय राजनीति क्या इतनी गिर गई है कि राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर बहस हो?

‘कच्चिद दारामनुष्याणम तवार्थे मृत्यमीयुषाम।
व्यसनम चाभ्यपुतेनाम विभर्षि भरतर्षभ।।’ 
देवऋषि नारद, महाभारत, सभा पर्व, पंचम अध्याय
‘भरतश्रेष्ठ ! जो लोग तुम्हारे हित के लिए सहर्ष मृत्यु का वरण कर लेते हैं, उनके परिवारजनों की तुम रक्षा करते हो न?’

स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने विगत 75 वर्षों में कोई छह बड़े युद्धों का सामना किया है। देश के नागरिक सैनिक-असैनिक समान रूप से इन संकटों का सामना करते रहे हैं। राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सेनानियों की सूची में राजनैतिक हत्याओं से लेकर अब राजनैतिक दृष्टि से लाभकारी प्रदर्शनकारियों के सांप्रदायिक प्रभुत्व प्रदर्शन के लिए या व्यक्तिगत संपन्नता में वृद्धि के लिए किए गए प्रदर्शनों के आस-पास होने वाली प्राकृतिक या आकस्मिक मृत्यु को जोड़े जाने की प्रवृत्ति ना सिर्फ राजनैतिक दलों के वैचारिक विक्षिप्तिकरण का मानक हो गया है, बल्कि उन वीरों का भी अपमान है जिनका परम् त्याग ना राजनैतिक लाभ की प्रक्रिया में हुआ और ना ही व्यक्तिगत स्वार्थ के उद्देश्य से हुआ।

जिन लोगों का सर्वोच्च त्याग राष्ट्र के सम्मान, स्वाधीनता और संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए हुआ हो, उन्हें उनके समकक्ष नहीं खड़ा किया जा सकता है जो राष्ट्र के लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यवस्था को झुकाने में, निहित स्वार्थों को प्राप्त करने और वर्चस्व की लड़ाई के मार्ग में जीवन से हाथ धो बैठे हों।

प्रशासनिक तथ्य यह है कि भारतीय संविधान शहीद की कोई परिभाषा नहीं ठहराता है, और ऐतिहासिक रूप से यह शब्द धर्म योद्धाओं के लिए प्रयुक्त होता था (राज्य सभा, 18 दिसंबर 2013, राज्यमंत्री-आंतरिक सुरक्षा, आरपीएन सिंह, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस)।

यदि राष्ट्रसेवा को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में धर्म का पर्याय मानें तो राष्ट्रसेवा में स्वयं को बलिदान करने वालों को ही शहीद माना जा सकता है, और इस शब्द को राजनैतिक लाभ के लिए हल्केपन से लेने का जो प्रयास किसान आंदोलन के संदर्भ में हो रहा है, उसका भरसक विरोध होना चाहिए।

राजनैतिक परिचर्चा के स्तर के पतन को ही हम प्रत्येक राजनैतिक आंदोलनकारी की मृत्यु को देशभक्त शहीदों की सूची में जोड़ने की विपक्ष की माँग में देखते हैं। राहुल गांधी के अनौपचारिक नेतृत्व में कांग्रेस भारतीय विवाहों में व्यंग्य का केंद्र बनने वाला फूफा हो गई है जिसे अपने अस्तित्व का एकमात्र उद्देश्य आलोचना एवं विरोध में ही दिखता है।

कल जब भारत के राष्ट्रीय शहीद स्मारक का उद्घाटन हुआ और अमर जवान ज्योति का विलय नए स्मारक की अक्षय ज्योति में किया गया, राहुल गांधी संस्कृति और स्मृति के नाम पर विरोध में खड़े हो गए। राहुल गांधी के साथ ही कुछ बुद्धिजीवी विचारक भी तुरंत उत्साहित हो उठे और नए स्मृति स्थल के विरोध में जुट गए।

वैसे तो मेरी समझ में इस नवजागृत सेना के प्रति सम्मान के नाम पर विपक्षी विलाप को राफेल के क्रय के कांग्रेस द्वारा विरोध, सीमावर्ती क्षेत्रों में ढाँचागत विकास का विरोध, दशकों तक बुलेटप्रूफ़ जैकेट जैसी मूलभूत सैनिक आवश्यकताओं की अनदेखी इत्यादि से जोड़कर देखना चाहिए, नेहरू से ले कर संदीप दीक्षित तक सेना के लिए उपयोग किए गए शब्दों से  परखना चाहिए, परंतु यदि हम इस स्मारक के तथ्यों को वस्तुनिष्ठ रूप से भी देखें तो इसकी नवीन सैन्य स्मारक की आवश्यकता स्पष्ट हो जाती है।

कल के कार्यक्रम में दो प्रमुख गतिविधियाँ हुई हैं। एक, अमर जवान ज्योति का नए स्मारक में प्रज्ज्वलित ज्योति मे विलय। दूसरा, ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम की मूर्ति के हटाए जाने से रिक्त हुई छतरी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा की स्थापना की घोषणा।

सन् 1930 में इंडिया गेट का उद्घाटन 1911 के दरबार में ब्रिटिश सम्राट द्वारा कोलकाता से दिल्ली औपनिवेशिक भारत की राजधानी के स्थानांतरण की घोषणा का संभवतः अंतिम चरण था। सत्ता के केंद्र के रूप में नई दिल्ली की स्थापना के मध्य विश्व पटल पर दूरगामी परिवर्तन हुए और प्रथम विश्वयुद्ध में जिस ब्रिटिश साम्राज्य के सूर्य नहीं डूबता था, उस पर बादल मँडराते देखे गए।

इस युद्ध में ब्रिटेन की विजय हुई और भारत के सैनिकों ने अंग्रेज़ों का एक भारतीय कर्तव्यबोध के साथ इस युद्ध में साथ दिया। भारत ने इस युद्ध में 8.77 लाख योद्धा और 5.63 लाख सहायक सैनिक दिए थे (इंडियन आर्मी ऑन वेस्टर्न फ़्रंट, जॉर्ज मोर्टेन)। आर्थिक सहायता के रूप में भारत ने अपनी समस्याओं के बाद भी लगभग 12.5 करोड़ पाउंड ऋण के रूप में ब्रिटिश सरकार को दिए थे।

युद्ध में लगभग 50,000 भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दी। युद्ध के पश्चात इंडिया गेट के सैन्य स्मारक का निर्माण 1917 में गठित इम्पीरीयल वॉर ग्रेव मेमोरीयल कमिशन के निर्देश पर लुट्यन्स के द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध एवं अफगान युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए शहीद हुए सैनिकों की स्मृति में हुआ था।

इन भारतीय सैनिकों ने भले ही अपने प्राण विदेशी सम्राट के साम्राज्य की रक्षा में दिए थे, यह सत्य है कि उनके बलिदान के पीछे लोभ या भय ना होकर स्वामिभक्ति, देशसेवा एवं वीरता के मूल भारतीय भाव थे। प्रथम विश्वयुद्ध में युद्ध भूमि से भेजे गए सैनिकों के पत्र बताते हैं कि वे धार्मिक कर्तव्य के निर्वहन के भाव से ही युद्ध में उतरे थे।

लुट्यन्स के प्रस्तावित प्रारूप के अनुसार प्रथम विश्वयुद्ध में और अफगान युद्ध में मृत भारतीय सैनिकों की स्मृति में इस स्मारक का निर्माण हुआ जिसपर उन सैनिकों के नाम भी अंकित हैं। परंतु यह भी सत्य है कि इस स्मारक के पीछे की भावना एक शासक के शासित की सहायता के प्रति कृतज्ञ होने तक ही सीमित थी।

इरविंग अपनी पुस्तक ‘इंडियन समर’ में लिखते हैं- “लुट्यन्स के लिए यह अखिल भारतीय युद्ध स्मारक कर्तव्य, अनुशासन, एकता, भ्रातृत्व, स्वामिभक्ति, सेवा एवं त्याग का प्रतीक है और यह स्थापित व्यवस्था के भीतर सहयोग के प्रोत्साहन के साथ ही भारत के ऊपर ब्रिटिश आधिपत्य के सत्य एवं सिद्धांत की स्वीकृति का समारोह है।”

इस स्मारक के उद्घाटन में ब्रिटिश भाषण जहाँ भारतीय सहयोग की सराहना करते दिखे, उन्होंने इसे अंग्रेज़ों के स्वामित्व के नैसर्गिक अधिकार की पुष्टि के रूप में ही रखा। लॉर्ड इर्विन ने अपने भाषण में कहा- “हम उन चार वर्षों को स्मरण करते हैं जिनमें अनेक राष्ट्र, लोग और नस्ल एक होकर एक सिंहासन के नीचे एक स्वामिभक्ति के भाव से बंधे आ गए और उन अधिकारों की रक्षा के लिए अंतिम श्वास तक लड़े जो उन्हें उस संप्रभु ब्रिटिश सम्राट ने सौंपे थे।”

1917 में स्थापित इम्पीरीयल वॉर ग्रेव मेमोरीयल कमिशन के मेजर जनरल फेबर वेर के भाषण में भी मिलते-जुलते ही विचार थे। ऐसे मनोभावों के साथ परतंत्र रहने की स्वीकार्यता के सूचक के रूप में भारतीय बलिदान को स्वीकारा गया और ब्रिटिश उपनिवेश की नैतिकता और निरंतरता के प्रमाण के रूप में स्थापित किया गया।

स्वतंत्रता के पश्चात भी भारत ने अपने एक वैभवशाली स्वतंत्र सामरिक इतिहास का निर्माण 1948, 1962, 1965, 1967, 1971 और बीसवीं सदी के अंत में कारगिल के साथ किया। एक ओर विस्तारवादी चीन और दूसरी ओर मजहबी उन्माद की भूमि से जन्म लेने वाले आत्मघाती पाकिस्तान ने भारत की प्रारंभिक दिनों की दिग्भ्रमित-सी राजनीति के साथ घालमेल करके भारत की संप्रभुता के लिए अनेक चुनौतियाँ खड़ी कीं और भारतीय सेनाओं ने 1948 में पाकिस्तानी कबायलियों से 2020 में चीनी घुसपैठियों तक उन्हें सशक्त उत्तर दिया।

ऐसी वीर और देशभक्त सेना का सम्मान होना ही चाहिए। यहाँ यह भी स्मरण रखने योग्य है कि एक समाज के नाते हमें अपने सैनिकों के बलिदानों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, और इस सम्मान को व्यवहार में उतारना चाहिए। इस सम्मान का जब हनन हो, हमें नेताओं से उसका उत्तर माँगना चाहिए, चाहे यह अपमान नीतिगत मुद्दों पर हो।

जैसे 1972 में अमर जवान ज्योति की स्थापना के तुरंत बाद जब इंदिरा गांधी की सरकार ने सैनिक पेन्शन को सरकारी वेतन व्यवस्था में घुसाकर कैसे उस वर्ग की प्रताड़ना का मार्ग खोल दिया था जिसे कम आयु में अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया जाता था और इस अन्याय के विरुद्ध तब तक सैनिकों की सुनवाई नहीं हुई जब तक केंद्र में मोदी सरकार सत्ता में नहीं आई, जैसे जब 20 वर्ष तक नए विमान नहीं आए और वायु सैनिक उन बूढ़े मिगों में उड़ने को बाध्य रहे जिन्हें उड़ता ताबूत भी कहा जाता था।

जब तक हमारा रोष उस राजनीति को उत्तरदायी नहीं बनाता है जो सेनाध्यक्ष को ‘सड़क का गुंडा’ कह देती है या मुंबई में नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी से सरे आम मार-पीट कर देती है, या मुंबई में सैनिक स्मारक के ध्वस्त करने के जघन्य कार्य या पंजाब में सैनिक की गुरुद्वारे में हत्या पर राजनैतिक कारणों से मौन रहती है, वह रोष एक दिखावे से अधिक नहीं है।

1960 में सेना द्वारा प्रस्तुत की गई सैन्य स्मारक की माँग को 2015 में मोदी सरकार के आने के पश्चात अनुमति मिलती है और 2022 में उसका उद्घाटन भी यदि राजनैतिक प्रतिक्रियाओं को आमंत्रित करता है तो हमें एक राष्ट्र के रूप में बहुत सोचने की आवश्यकता है।

राजनैतिक फूफाओं का ऐसा स्वार्थी विरोध उस सेना के उत्साह पर क्या प्रभाव डालेगा जो नेहरू काल में जीप स्कैम, उसके पश्चात साधनहीनता की विपरीत परिस्थितियों में 1962 के चीन युद्ध और बोफ़ोर्स से लेकर चीन के मिथ्या प्रचार से हाथ मिलाकर खड़े विपक्ष और विपक्ष-पोषित मीडिया को झेलते रहने के बावजूद विपरीत परिस्थितियों में कश्मीर से लेकर गलवान तक स्थितप्रज्ञ राष्ट्ररक्षा में तत्पर है, यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।

उस विचार का सार्वजनिक विमर्श में कोई स्थान नहीं होना चाहिए जो भारत की सेनाओं की विजयों को राजनैतिक खेमों में बाँट दे और कारगिल विजय दिवस को मनाने से मना कर दे। यह सर्वथा उचित ही है कि 13 अगस्त 1965 को संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के द्वारा ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम की मूर्ति पर हुए आक्रमण के बाद उसे हटाकर रिक्त हुए स्थान को भारत की प्रथम स्वतंत्र सेना के अध्यक्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति सम्मानित करे। इसके लिए दिवंगत जॉर्ज फ़र्नांडेस की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और वर्तमान सरकार को साधुवाद।

यह नया राष्ट्रीय सैन्य स्मारक भारतीय इतिहास के उस औपनिवेशिक युग का पटाक्षेप करता है जो ब्रिटिश सरकार के जाने के बाद भी वंशागत राजनीति के कारण भारत पर शासन करने वाले अंतिम इंग्लिशमैन जवाहरलाल नेहरू के मई 1964 में (आभार: जेके गाल्ब्रेथ, अमरीकी राजदूत, अ लाइफ़ इन आवर टाइम्ज़) जाने के बाद भी इतने दशकों तक निरंतर चलता रहा। यह सैन्य स्मारक एक उदीयमान, सक्षम और सशक्त भारत का प्रतीक होगा जिसने भविष्य की ओर उड़ान एक नए संकल्प के साथ ली है।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।

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