संस्कृति
महिरावण ने हनुमान को छलकर किया श्रीराम-लक्ष्मण का अपहरण (अकाल बोधन भाग- 1)

अकाल बोधन शब्द का सर्वप्रथम परिचय हमें कृत्तिवास रामायण में मिलता है जिसमें महाकवि कृतिवास ने इस अवधारणा का अविस्मरणीय रूप से उल्लेख किया है। यह उस काल की घटना है जब महिरावण पर विजय पश्चात राम तथा लक्ष्मण पाताल-लोक से पृथ्वी-लोक की ओर प्रस्थान करते हैं।

कृत्तिवास रामायण में महिरावण पाताल-लोक का स्वामी था। रावण का यह भ्राता भी अपने दूसरे अन्य भ्राताओं की भाँति ही अत्यंत शक्तिशाली, महामायावी तथा क्रूर था और शत्रुओं को भ्रमित करने का उसे विशेष कौशल प्राप्त था। अपने शत्रुओं का मतिभ्रम कर उनपर विजय प्राप्त करने में वह विशेषज्ञ माना जाता था।

यह कथा उस युद्धकाल की है जब रावण के महाशक्तिशाली तथा प्रतिभाशाली किंतु कुकर्मी पुत्र इंद्रजीत का लक्ष्मण द्वारा वध कर दिया जाता है। अपने महावीर पुत्र की युद्ध में वीरगति प्राप्ति के पश्चात रावण अत्यंत शोकपूर्ण अवस्था में घिर जाता है।

उसे यह प्रतीत होने लगता है कि अब उसे श्रीराम द्वारा पराजित होने में अधिक समय नहीं लगेगा किंतु वह अपने पुत्र की मृत्यु के प्रतिकार का एक अंतिम प्रयास करता है। रावण भ्राता महिरावण, जिसने युद्ध के आरंभ में श्रीराम के विरुद्ध युद्ध में भागी नहीं होने का निश्चय किया था, को पाताल-लोक से आमंत्रित करता है।

महिरावण देवी महामाया का भक्त था तथा महामाया की प्रसन्नता हेतु वह बहुधा, महामाया के सम्मुख, मनुष्यों की बलि का आयोजन करता था। रावण उसे इस प्रकार से आश्वासन दिलाता है कि यदि वह राम तथा लक्ष्मण को बंदी बना देवी के समक्ष बलिदान करने में सक्षम है, तो देवी अत्यंत प्रसन्न होंगी।

रावण यह भी आश्वस्त करता है कि ऐसा करने से महिरावण की शक्ति में चौगुनी वृद्धि होगी। अंततः रावण महिरावण को राम-लक्षमण के अपहरण हेतु सहमत कर लेता है तथा योजना के साधन रचने में जुट जाता है।

महिरावण के चातुर्य, युद्ध-कौशल से भली-भाँति परिचित विभीषण को जब उनकी योजना के बारे में अपने दूतों से ज्ञात होता है तो वे राम तथा लक्ष्मण को महिरावण के बारे में चेतावनी देते हैं। वे हनुमान से राम तथा लक्ष्मण पर दृष्टि रखने तथा उनकी रक्षा करने का भी अनुरोध करते हैं।

विभीषण उन सभी को महिरावण के मायाजाल, मतिभ्रम कौशल के बारे में मंत्रणा कर सावधान रहने के लिए कहते हैं। हनुमान उस कुटिया के चहुँ ओर, जहाँ राम तथा लक्ष्मण विश्राम में लीन थे, अपनी पूँछ द्वारा एक रक्षा-कवच बना, रक्षा हेतु तत्पर हो जाते हैं।

महिरावण योजनानुसार, विभिन्न भेषों में प्रकट हो राम तथा लक्ष्मण के अपहरण का प्रयास करता है। भ्राता भरत, माता कौशल्या, पिता दशरथ सभी रूपों में विफल रहने के पश्चात अंत में वह विभीषण का रूप धर प्रकट होता है।

वह हनुमान से निवेदन करता है कि राम तथा लक्ष्मण के सुरक्षा निरीक्षण हेतु वे उसे कुटिया में प्रवेश करने दें। अंततः इस प्रकार वह हनुमान को छलने में सफल हो जाता है। जैसे ही हनुमान उसे कुटिया में प्रवेश हेतु अनुमति देते हैं, महिरावण राम तथा लक्ष्मण का अपहरण कर, उनके साथ पाताल-लोक प्रस्थान कर जाता है।

प्रातःकाल सभी को यह संज्ञान होता है कि विभीषण के भेष में महिरावण ने राम तथा लक्ष्मण का अपहरण कर लिया है। कुपित हो हनुमान विभीषण को वचन देते हैं कि वह श्रीराम-लक्ष्मण के अपहरण का दंड महिरावण को अवश्य देंगे। महिरावण का वध कर वह शीघ्र ही श्रीराम-लक्ष्मण को सभी के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।

विभीषण हनुमान को महिरावण के राज्य पाताल-लोक से संबंधित सभी तथ्यों का बोध कराते हैं। किंवदंती के अनुसार, पाताल-लोक विपरीत प्रवाह का लोक था। यह एक ऐसा लोक था जहाँ प्रकृति के सभी नियम पृथ्वी लोक में स्थापित नियमों के सर्वदा विपरीत थे।

अग्नि का प्रयोग वहाँ वस्तुओं को शीतलता प्रदान करने हेतु किया जाता था। जल प्रवाह पृथ्वी से आकाश की ओर होता था क्योंकि गुरुत्वाकर्षण प्रतिकारक रूप में विद्यमान था। समय की प्रगति भी विपरीत तथा अतितीव्र थी।

हनुमान, अपने स्वामी को मुक्त करने तथा उन्हें दुष्ट महिरावण से बचाने के लिए अत्यधिक धैर्य तथा दृढ़ संकल्पित हो पाताल-लोक की यात्रा के लिए प्रस्थान करते हैं। हनुमान पाताल-लोक में महिरावण के सभी योद्धाओं से युद्ध में विजयी होते हुए अंत में महिरावण के प्रासाद समक्ष पधारते हैं। प्रासाद के सम्मुख “मकरध्वज” नामक अर्धवानर-अर्धसरीसृप को प्रासाद के संरक्षक रूप में देख विस्मित हो जाते हैं।

आगे की कथा अगले भाग में।