विचार
अफगानिस्तान में शांति लाने के लिए क्यों भारत को बातचीत में प्रतिभागी बनाना चाहिए

अफगानिस्तान से 95 प्रतिशत अमेरिकी सैनिक वापस जा चुके हैं और 31 अगस्त तक यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इस बीच तालिबान अपने पैर पसार रहा है। यूएस अधिकारी मार्क मिली ने बताया कि अफगानिस्तान के 419 जिला केंद्रों में से लगभग आधे पर तालिबान का कब्ज़ा है, वहीं तालिबान ने देश के 85 प्रतिशत भाग पर कब्ज़े का दावा किया है।

तालिबान के वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल ने जुलाई के दूसरे सप्ताह में मॉस्को का दौरा किया था। इस दौरे का लक्ष्य यह आश्वासन देना था कि अफगानिस्तान में तेज़ी से पैर पसार रहे तालिबान से रूस या मध्य एशिया में उसके सहयोगी देशों को कोई खतरा नहीं होगा।

इससे पहले मार्च महीने के पहले सप्ताह में अफगानिस्तान में शांति वार्ता को लेकर रूस ने एक कॉन्फ़्रेंस का आयोजन किया था। इसमें अमेरिका, पाकिस्तान और चीन को आमंत्रित किया गया, लेकिन भारत को नहीं बुलाया गया था। इस सम्मेलन में अफगानिस्तान की सरकार और तालिबान के प्रतिनिधि भी शामिल रहे।

इस वार्ता की शुरुआत दो वर्ष पहले ‘ट्रॉइका’ की पहल के ज़रिए हुई, जिसमें रूस, चीन और अमेरिका अलग-अलग पक्षों से बात कर रहे हैं। इसे लेकर विवाद होने पर भारत में रूसी दूतावास ने स्पष्टीकरण जारी किया और कहा कि अफगानिस्तान में भारत अहम भूमिका निभा रहा है और भारत इससे जुड़ी वार्ता में अहम भागीदार है।

बुधवार (21 जुलाई) को नई दिल्ली स्थित रूसी दूतावास के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से ट्वीट किया गया, ”रूसी विदेश मंत्री सर्गेइ लवरोफ़ ने हाल ही में ताशकंद में कहा था कि अफगानिस्तान पर जारी ट्रॉइका प्रारूप में भारत और ईरान को भी शामिल किया जा सकता है, ताकि इस वार्ता को और विस्तार दिया जा सके।”

इसके अलावा भारत में रूसी राजनयिक दिमित्री सोलोदोव ने अपने ट्वीट में लिखा, ”अफगानिस्तान में खराब होते हालात पर काबू पाने के लिए आवश्यक है कि क्षेत्रीय सहमति बने और वार्ता किसी समाधान तक पहुँचे। रूस और भारत अफगानिस्तान को लेकर कई तरह के मंचों पर गहराई से जुड़े हुए हैं।”

”इनमें एससीओ अफगानिस्तान कॉन्टैक्ट ग्रुप और द मॉस्को फॉर्मैट भी हैं। ये बहुत प्रभावी मंच हैं और नतीजे को लेकर प्रतिबद्ध हैं। रूस अफगान मुद्दे पर भारत के साथ सहयोग को लेकर काफी समर्पित है।”, आगे कहा गया।

21 जुलाई को इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में भी कहा गया कि रूस ने ईरान और भारत को पहली बार रूस-अमेरिका-चीन ट्रॉइका प्लस में बुलाया है। इस बैठक में वर्तमान ”सरकार और तालिबान के भविष्य पर बात हो रही है।

ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत को बुलाने का निर्णय पिछले सप्ताह ताशकंद में साउथ सेंट्रल एशिया कनेक्टिविटी समिट में हुआ था। पिछले सप्ताह डूशांबे में एससीओ की बैठक में जयशंकर ने कहा था कि तालिबान मॉस्को, दोहा और इस्तांबुल में हुई वार्ता के अनुसार रुख तय करे।

इससे पहले जयशंकर ने मॉस्को में ईरान, रूस और भारत की साझेदारी को लेकर बात की थी। बुधवार को जयशंकर ने ट्वीट किया है कि ईरानी विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ से उनकी बात हुई है जो आपसी संबंधों के लिए उत्पादक है।

भारत का यह मानना है कि वह एक अफगानिस्तान-नेतृत्व वाली, अफगानिस्तान-नियंत्रित और अफगानिस्तान के स्वामित्व वाली प्रणाली चाहता है, लेकिन अफगानिस्तान में ज़मीनी वास्तविकता कुछ ऐसी रही है कि यहाँ ऐसा हो नहीं सका है।

टोलो न्यूज़ में मार्च महीने में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश सचिव एंटनी ब्लिंकन ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और हाई काउंसिल फॉर नेशनल रिकंसिलिएशन के अध्यक्ष अब्दुल्ला को चिट्ठी भेज संयुक्त राष्ट्र के संरक्षण में एक क्षेत्रीय कॉन्फ्रेंस के गठन का प्रस्ताव दिया था जिसमें अमेरिका, भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान के विदेश मंत्री एक साथ मिलकर अफगानिस्तान में बेहतरी लाने का प्रयास करेंगे।

एंटनी ब्लिंकन (बाएँ), अशरफ गनी (दाएँ)

भारत की ओर से नवंबर 2020 में अफगानिस्‍तान को 8 करोड़ डॉलर की सहायता देने की घोषणा की गई थी। यह राशि कुल 150 परियोजनाओं के लिए जारी की गई थी। भारत इस समय अफगानिस्‍तान के 34 प्रांतों में विकास परियोजनाओं को पूरा करने में लगा हुआ है।

विदेश मंत्रालय की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार भारत और अफगानिस्‍तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2019-2020 में 150 करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 11,250 करोड़ रुपये) को पार कर गया था।

भारत की तरफ से अफगानिस्‍तान को होने वाला निर्यात 1 अरब डॉलर तक पहुँच गया, वहीं अफगानिस्‍तान से भारत में होने वाला आयात भी लगभग 53 करोड़ डॉलर तक पहुँच चुका है। भारत औेर अफगानिस्‍तान के बीच व्‍यापार के लिए जून 2017 में एक हवाई मालवाहक गलियारा शुरू किया गया था।

अब तक 500 से ज्‍यादा उड़ानें इस गलियारे पर संचालित हो चुकी हैं और 7,000 टन वजन तथा 20 करोड़ डॉलर से अधिक मूल्य के कार्गो लाए-ले जाए जा चुका है। इससे काबुल, कंधार, हेरात, नई दिल्‍ली, मुंबई और चेन्‍नई आपस में जुड़े हैं। इसके अलाचा चाबहार बंदरगाह भी अफगानिस्‍तान के साथ होने वाले व्यापार में बड़ा सहायक है।

विदेश मंत्रालय की मानें तो व्यापार में लगातार वृद्धि हो रही है और पिछले पाँच वर्षों में इसमें सुधार हुआ है। भारत की तरफ से अफगानिस्‍तान को होने वाला निर्यात वर्ष 2015-16 से 89 प्रतिशत अधिक हो गया। इसी तरह से भारत में अफगानिस्‍तान से होने वाले आयात में 72 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।

निर्यात मूल्य में वर्ष 2019-20 में 2018-19 की तुलना में 39 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई थी। इसी तरह से आयात भी 21 प्रतिशत से अधिक बढ़ा। इन संबंधों को देखते हुए भारत को बातचीत में प्रतिभागी बनाना चाहिए।

सुखदेव वशिष्ठ विद्या भारती के सदस्य हैं। वे @Sukhdev_1979 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।