संस्कृति
आदिगुरु शंकराचार्य के संदेश को अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना क्यों आवश्यक है

अद्वैतवाद के प्रणेता परमपूज्य भगवत्पाद आदिगुरु शंकराचार्य भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण के पुरोधा हैं। विराट भारतीय चेतना की अभिव्यक्ति हैं। भारतीय आध्यात्म के लाइट हाउस हैं। आचार्य शंकर शिवावतार हैं, हमारी दर्शन-परंपरा के ‘केदार’ हैं।

“शंकरो साक्षात् शंकर:”। आदिगुरु शंकराचार्य भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति के पुनर्स्थापक हैं। उन्होंने अपने शास्त्रार्थ के बल पर ही सभी हिंदू संत व साधु संप्रदायों में व्याप्त भेद-विभेद को समाप्त कर अद्वैतवाद के सिद्धांत को प्रतिपादित कर हिंदू संस्कृति को सनातन-अमर-अजर बना दिया।

आचार्य शंकर की प्रविधि-प्रयासों से ही हमारी सदाजीवा दर्शन-परंपरा तेजोमय है। आदिगुरु शंकराचार्य घोर निशा के अंधकारमय आकाश में चमकी आकाशीय बिजली की एक ऐसी कौंध हैं जिन्होंने सनातन धर्म-संस्कृति में प्राण फूँककर चिरकाल के लिए भारतीय चेतना की महान् धरा को प्रवाहपूर्ण बनाते हुए एक शाश्वत प्रकाश अमृत भारत को दिया।

आज ही के दिन समस्त विश्व ने उस विराट वैभव को, उस चेतना को फलीभूत होते, धरती पर अवतरित होते देखा जिसके महाप्रकाश से दिग्दिगंत उद्भासित होने थे। आज का यह दिन उन्हीं आदिगुरु शंकराचार्य जी के पुण्य स्मरण का है।

शंकराचार्य जी के ज्ञान और साधना के प्रतिफलस्वरूप प्रस्फुटित दैवीय चेतना को आत्मसात करने का है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण के शंखनाद का है। भारतीयता के पवित्र सनातनी मूल्यों के पुनर्स्थापन का है।

संस्कृति के गौरवशाली इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ पर, असंख्य युगों के वज्र कठोर हृदय पर आचार्य शंकर के पदचिह्न अंकित हैं। अनादि भूतकाल शंकराचार्य जी की दिव्य विभा से आलोकित है। जिन पर सनातनी शौर्य की कीर्ति पताका शान से लहरा रही है।

सर्गे प्राथमिके प्रयाति विरतिं मार्गे स्थिते दौर्गते स्वर्गे दुर्गमतामुपेयुषि भृशं दुर्गेऽपवर्गे सति।
वर्गे देहभृतां निसर्ग मलिने जातोपसर्गेऽखिले सर्गे विश्वसृजस्तदीयवपुषा भर्गोऽवतीर्णो भुवि।।

“सनातन संस्कृति के पुरोधा सनकादि महर्षियों का प्राथमिक सर्ग जब उपरति को प्राप्त हो गया, अभ्युदय तथा निःश्रेयसप्रद वैदिक सन्मार्ग की दुर्गति होने लगी, फलस्वरुप स्वर्ग दुर्गम होने लगा, अपवर्ग अगम हो गया, तब इस भूतल पर भगवान भर्ग (शिव) शंकर रूप से अवतीर्ण हुए।”

उन्होंने भारतीय धर्म-आध्यात्म-दर्शन-चेतना को नई ऊर्जा से भरने के लिए आज से 12 सदी पहले की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जब आवागमन दुष्कर था, संपूर्ण भारत की पदयात्रा कर देश के चार कोनों पर मठों की स्थापना से लेकर द्वादश ज्योतिर्लिंगों एवं वेदांत की रचना का ऐसा पुरुषार्थ किया जो समूची सनातन संस्कृति के वाहक बने।

वे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और भौगोलिक सभी स्तरों पर आधुनिक अर्थों में भारतीय एकता का सूत्रपात करने वाले पहले ऋषि थे। उनका अद्वैत वेदांत दर्शन का अमृत भारत की अनंत स्मृतियों में संचित है।

सनातन संस्कृति के धर्म, कर्म और भक्तिभाव का वह प्रबल प्रताप जिसने एक दिन जगत के बड़े-बड़े सन्मार्ग विरोधी भूधरों का दर्पदलन कर उन्हें रज में परिणत कर दिया था। शैव, वैष्णव, तांत्रिक, कापालिक विभिन्न संप्रदायों का वेदांत सम्मत भारतीयकरण कर भारतीय मनीषा के लिए आध्यात्मिक मार्ग के समस्त कंटक भ्रम दूर किए।

अध्यात्म और धर्म ही भारत की आंतरिक शक्ति रहा है। इसी विरासत की बदौलत सहस्रों युगों के आघातों से भारत बचा रह सका। तमाम अवरोधों, आक्रमणों, झंझावतों और संक्रमणों के मध्य भी भारत की सांस्कृतिक धारा कभी सूखी नहीं, क्योकि आचार्य शंकर का ज्ञान-अमृत हमारी जड़ों में प्रवाहमान है।

हर सनातनी के हृदय में जब तक आचार्य शंकर का वास, मस्तिष्क में उनका दर्शन और उपदेश, आचरण में उनके द्वारा निर्धारित मर्यादाएँ बनी रहेंगी, तब तक हमारी सनातनी संस्कृति का प्रवाह अविरल रहेगा।

हम राष्ट्रहित में एकमत से आचार्य शंकर के भाव को, उनके संदेश को आज और अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने के कर्तव्य का तत्परता से निर्वहित करें। शंकराचार्य जी के सिद्धांतों का लोकव्यापिकरण करने के लिए प्रतिबद्ध हों। फिर निश्चय ही विश्व के गगनमंडल पर हमारी सनातनी कलित कीर्ति के असंख्य दीप जलेंगे।